श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 978, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 4/123-134 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद - श्रीमाधवेन्द्रपुरी किसीसे कुछ नहीं माँगते थे। यदि अपने आप कोई कुछ खानेके लिये दे देता, तो उसीको खाते थे, नहीं तो उपवास करते थे। वे प्रेमामृतके पानमें ही तृप्त रहते थे, उन्हें कभी भी भूख-प्यास नहीं सताती थी। इसलिये जब उन्हें खीरको चखनेकी इच्छा हुई, तो उसे वे अपराध मानने लगे। वे मन्दिरसे बाहर आकर गाँवके एक निर्जन हाटमें बैठकर कीर्तन करने लगे। इधर पुजारीने श्रीगोपीनाथको शयन करा दिया ॥ 123-125॥ अनुभाष्य - श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रभुकी स्वाभाविकी परमहंसकी अवस्था थी, - उनकी श्रीकृष्णनाममें प्रीति थी और वे जड़ीय वस्तुओंके प्रति उदासीन थे। 'नाहि क्षुधा-तृष्णा बाधे'-वे भूख और प्याससे अतीत, विजित-षड्गुण अर्थात् जितेन्द्रिय थे॥ 123-124 ॥ पुजारीको स्वप्नमें श्रीगोपीनाथका आदेश :- निज-कृत्य करि' पूजारी करिल शयन। स्वप्नकाले ठाकुर आसि' बलिला वचन ॥ 126 ॥ “उठह पूजारी, कर द्वार विमोचन। क्षीर एक राखियाछि संन्यासि-कारण ॥ 127 ॥ धड़ार अञ्चले ढाका क्षीर एक हय। तोमरा ना जानिला ताहा, आमार मायाय ॥ 128 ॥ माधवपुरी संन्यासी आछे हाटेते बसिञा। ताहाके त' एइ क्षीर शीघ्र देह लञा ॥ " 129 ॥ अनुवाद - अपने सेवाकार्यको समाप्तकर पुजारी सो गया। अर्द्धरात्रिमें उसके स्वप्नमें आकर श्रीगोपीनाथ कहने लगे, - "पुजारी उठो! मन्दिरका द्वार खोलो। मैंने एक संन्यासीके लिये खीरका एक कुल्हड़ रखा है। उसे मैंने अपने वस्त्रकी ओटमें छिपा रखा है। मेरी मायाके कारण तुम्हें उसका पता नहीं चला। माधवेन्द्रपुरी नामक वह संन्यासी बाजारमें बैठा हुआ है, तुम यह खीर ले जाकर शीघ्र ही उसे दे आओ॥ "126-129 ॥ अनुभाष्य - 'कारण' - निमित्त। 'धड़ा' - वस्त्र । 'एक' - खीरसे भरा हुआ एक पात्र ॥ 127-128 ॥ पुजारीकी निद्रा-भङ्ग और श्रीगोपीनाथके द्वारा चोरी की गयी खीरकी प्राप्ति :- स्वप्न देखि' पूजारी उठि' करिला विचार। स्नान करि' कपाट खुलि' मुक्त कैल द्वार ॥ 130 ॥ धड़ार आँचलतले पाइल सेइ क्षीर। स्थान लेपि' क्षीर लञा हइल बाहिर ॥ 131 ॥ अनुवाद - स्वप्न देखकर पुजारीने उठकर श्रीगोपीनाथके आदेशपर विचार किया। तब उसने स्नान करके मन्दिरका द्वार खोला। पुजारीको श्रीगोपीनाथके वस्त्रके नीचे एक खीरका कुल्हड़ मिला। उस खीरके कुल्हड़को उठाकर उसने स्थानको लेपकर साफ कर दिया और वह खीर लेकर बाहर आ गया ॥ 130-131 ॥ खीरको हाथमें लेकर पुजारीके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी खोज :- द्वार दिया ग्रामे गेला सेइ क्षीर लञा। हाटे हाटे बुले माधवपुरीके चाहिञा ॥ 132 ॥ “क्षीर लह एइ, यार नाम 'माधवपुरी' । तोमा लागि' गोपीनाथ क्षीर कैल चुरि ॥ 133 ॥ क्षीर लञा सुखे तुमि करह भक्षणे। तोमा-सम भाग्यवान् नाहि त्रिभुवने ॥ " 134 ॥ अनुवाद - मन्दिरका द्वार बन्द करके पुजारी उस खीरको लेकर गाँवमें गया और हाट-हाटमें घूमते हुए श्रीमाधवेन्द्रपुरीको खोजते हुए पुकारने लगा, - " जिनका नाम 'माधवपुरी' है, वे कृपा करके इस खीरको ग्रहण करें। आपके लिये श्रीगोपीनाथने यह खीर चोरी की है। आप इस खीरको लेकर आनन्दसे खाओ। आपके समान भाग्यवान् तीनों लोकोंमें और कोई नहीं है॥" 132-134 ॥ अनुभाष्य - 'बुले'- घूमना-फिरना ॥ 132 ॥ 128