भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 979

चौथा अध्याय 4/135-144 ] एत शुनि' पुरी-गोसाञि परिचय दिल। क्षीर दिया पूजारी ताँरे दण्डवत् कैल॥ 135॥ अनुवाद—पुजारीकी पुकारको सुनकर श्रीपुरी गोसांईने उसको अपना परिचय दिया। पुजारीने उन्हें खीरका पात्र देकर दण्डवत् प्रणाम किया॥ 135॥ अनुभाष्य—'दण्डवत्'—दण्डकी भाँति प्रणत् अर्थात् चरणोंमें गिरकर॥ 135॥ पुजारीके मुखसे श्रीगोपीनाथकी चोरीकी बातको सुनकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीका प्रेम :- क्षीरेर वृत्तान्त ताँरे कहिल पूजारी। शुनि' प्रेमाविष्ट हैला श्रीमाधवपुरी॥ 136॥ पुजारीके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरीको श्रीकृष्णको वशीभूत करनेवाले भक्तके रूपमें अनुमान :- प्रेम देखि' सेवक कहे हइया विस्मित। 'कृष्ण से इँहार वश,—हय यथोचित॥' 137॥ अनुवाद—पुजारीने जब उन्हें खीरकी चोरीका पूरा वृत्तान्त सुनाया, तब उसे सुनकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रेममें आविष्ट हो गये। उनके श्रीकृष्णप्रेमको देखकर पुजारी आश्चर्यचकित हो गया। वह मनमें सोचने लगा,—'यह उपयुक्त ही है कि श्रीगोपीनाथ इनके वशीभूत हैं'॥136-137॥ अनुभाष्य—'यथोचित'—उपयुक्त अथवा योग्य॥ 137॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा खीर-प्रसादका सम्मान करना आत्मेन्द्रिय-तर्पण नहीं :- एत बलि' नमस्करि' करिला गमन। आवेशे करिला पुरी से क्षीर भक्षण॥ 138॥ पात्र प्रक्षालन करि' खण्ड खण्ड कैल। बहिर्वासे बान्धि' सेइ ठिकारि राखिल॥ 139॥ प्रतिदिन एकखानि करेन भक्षण। खाइले प्रेमावेश हय,—अद्भुत-कथन॥ 140॥ अनुवाद—यह कहकर पुजारी उनको प्रणाम करके अपने घर लौट गया। श्रीमाधवेन्द्रपुरीने प्रेमाविष्ट होकर उस खीर-प्रसादका सेवन किया। खीर खानेके बाद उन्होंने उस खीर प्रसादके कुल्हड़को धोकर उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर लिये। उन्होंने उन ठीकरोंको अपने बहिर्वासमें बाँधकर रख लिया। वहाँसे नीलाचल जाते हुए श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रतिदिन एक ठीकरेको खाते और उसे खानेके साथ-ही-साथ प्रेममें आविष्ट हो जाते,—यह कथा बहुत ही अद्भुत है॥138-140॥ अनुभाष्य—'ठिकारि'—बर्तनका टूटा हुआ टुकड़ा॥ 139॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीको प्रतिष्ठाका भय और पुरीधाम यात्रा :- 'ठाकुर आमाके क्षीर दिल'—लोक सब शुनि'। दिने लोक-भिड़ हबे मोर प्रतिष्ठा जानि'॥ 141॥ सेइ भये रात्रि शेषे चलिला श्रीपुरी। सेइखाने गोपीनाथे दण्डवत् करि'॥ 142॥ अनुवाद—'गोपीनाथजीने चोरी करके मुझे खीर दीं',—प्रातःकाल जब लोग ऐसा सुनेंगे, तो लोगोंकी भीड़ मेरे पास आयेगी और मुझे बड़ा भक्त मानकर बहुत सम्मान देंगे। इस प्रतिष्ठाके भयसे श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रातःकाल होनेसे पहले ही श्रीगोपीनाथको वहींसे दण्डवत् प्रणाम करके नीलाचलकी ओर चल दिये॥ 141-142॥ पुरी धाममें श्रीजगन्नाथके दर्शनसे प्रेममें विह्वल :- चलि' चलि' आइला पुरी श्रीनीलाचल। जगन्नाथ देखि' हैला प्रेमेते विह्वल॥ 143॥ प्रेमावेशे उठे, पड़े, हासे, नाचे, गाय। जगन्नाथ-दरशने महासुख पाय॥ 144॥ अनुवाद—वहाँसे चलते-चलते श्रीमाधवेन्द्रपुरी श्रीनीलाचलमें आ पहुँचे और श्रीजगन्नाथके दर्शनकर प्रेममें विह्वल हो गये। श्रीजगन्नाथजीके दर्शनसे उन्होंने महासुख प्राप्त किया, इसलिये प्रेमके आवेशमें वे कभी उठते और कभी गिर पड़ते। कभी वे हँसने लगते, तो कभी नाचने और कभी गाने लगते॥ 143-144॥ 129