श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 980, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 4/145-151 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला प्रतिष्ठाकी चाह न होनेपर भी श्रीमाधवेन्द्रपुरीको प्रतिष्ठाकी प्राप्ति :- 'माधवपुरी श्रीपाद आइल', - लोके हैल ख्याति। सब लोक आसि' ताँरे करे बहु भक्ति ॥ 145 ॥ अनुवाद - 'श्रीपाद माधवेन्द्रपुरी आये हैं'- श्रीजगन्नाथ पुरीमें यह बात विख्यात हो गयी। उनकी महिमाके विषयमें वे सुन चुके थे, इसलिये सब लोग आकर भक्तिपूर्वक उनका बहुत अधिक आदर-सम्मान करने लगे॥ 145 ॥ प्रतिष्ठार स्वभाव एइ जगते विदित। ये ना वाञ्छे, तार हय विधाता-निर्मित ॥ 146 ॥ प्रतिष्ठार भये पुरी रहे पलाञा। कृष्ण-प्रेमे प्रतिष्ठा चले सङ्गे गड़ाञा ॥ 147 ॥ अनुवाद- प्रतिष्ठाका यह स्वभाव जगत्में सब जानते हैं कि जो इसे नहीं चाहता, विधाताके द्वारा उसे ही प्रतिष्ठा मिलती है। श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रतिष्ठाके भयसे रेमुणासे भागकर आये थे, परन्तु श्रीकृष्णसे प्रेम होनेपर प्रतिष्ठा भक्तके साथ-साथ ही चलती है ॥ 146-147 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - जो प्रतिष्ठाकी इच्छा न रखकर सत्कार्य करते हैं, उनके लिये ही विधाताने प्रतिष्ठाका निर्माण किया है; अर्थात् जो प्रतिष्ठाकी आशासे सत्कर्म करते हैं, उनको प्रतिष्ठाकी प्राप्ति नहीं होती - यही प्रतिष्ठाका रहस्य है ॥ 146 ॥ अनुभाष्य - बद्धजीवोंमेंसे बहुतसे जीव ईर्ष्यालु होते हैं। जिनकी बहुत ख्याति होती है, उनके विरुद्ध आचरण करनेकी ईर्ष्यालु व्यक्तियोंमें स्वाभाविक रूपसे प्रवृत्ति होती है। इसलिये प्रतिष्ठाकामी व्यक्तिको ईर्ष्यालु व्यक्तियोंसे प्रतिष्ठाके बदले ईर्ष्या मिलना स्वाभाविक ही है। यद्यपि जो दीनतावश प्रतिष्ठाकी आकाङ्क्षा नहीं करते, उन्हें ईर्ष्यालु लोग बिल्कुल असमर्थ और दीन समझकर दया करके प्रतिष्ठा देकर उत्साह प्रदान करते हैं, तथापि वैष्णव लोग इस संसारमें वैसी प्रतिष्ठाके भिक्षुक नहीं है। बादमें लौकिक प्रतिष्ठा मिलेगी, इसलिये वैष्णवराज श्रीमाधवेन्द्रपुरीने लोगोंकी दृष्टिसे अपने भगवद्-प्रिय होनेकी घटनाको छिपानेका प्रयत्न किया था। किन्तु उनकी अन्यान्य श्रीकृष्णप्रेममयी चेष्टाओंको देखकर जगत्के सभी लोगोंने उनको श्रीभगवान्की अपने भक्तके निमित्त उत्कण्ठा और चेष्टाका प्रमाण माना। वास्तविक रूपमें श्रीमाधवेन्द्र पुरीको सर्वश्रेष्ठ प्रतिष्ठा ही स्वाभाविक रूपसे प्राप्त होने योग्य है। किन्तु जो लोग प्रतिष्ठा पानेके लिये उनका अनुकरण करके अपने हृदयमें छिपे हुए कपट दैन्यका सहारा लेकर अपने आपको प्रतिष्ठाकी लालसा-रहित कहकर छल करते हैं, उनके लिये वैष्णवोचित दैन्यतामें प्रतिष्ठित होना असम्भव है ॥ 146-147 ॥ अनिच्छा होनेपर भी प्रतिष्ठाके स्थानपर प्रभुकी सेवा हेतु अवस्थान :- यद्यपि उद्वेग हैल पलाइते मन। ठाकुरेर चन्दन-साधन हइल बन्धन ॥ 148 ॥ अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 148 ॥ अनुभाष्य - यद्यपि श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रतिष्ठाके चङ्गलसे मुक्त होनेके उद्देश्यसे पुरीसे भाग निकलनेके उपायका विचार करने लगे, तथापि श्रीगोपालके लिये चन्दन-संग्रहरूपी सेवाने उनको बाँधकर प्रतिष्ठासे भरे नीलाचलमें रहनेके लिये बाध्य किया ॥ 148 ॥ श्रीजगन्नाथके सेवकोंको गोपालकी इच्छा व्यक्त करना :- जगन्नाथेर सेवक यत, यतेक महान्त। सबाके कहिल सब गोपाल-वृत्तान्त ॥ 149 ॥ भक्तोंका अनेक प्रकारसे चन्दन संग्रह करनेका यत्न :- गोपाल चन्दन मागे, - शुनि' भक्तगण। आनन्दे चन्दन लागि' करिल यतन ॥ 150 ॥ राजपात्र-सने यार यार परिचय। तारे मागि' कर्पूर-चन्दन करिला सञ्चय ॥ 151 ॥ 130 ।