श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 983, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय 4/47-177 ] अनुवाद-इस प्रकार वे चारों लोग प्रतिदिन चन्दन घिसकर देने लगे और श्रीगोपीनाथके सेवक उनके श्रीअङ्गोंमें बड़े आनन्दसे प्रतिदिन चन्दनका लेप करते ॥ 167 ॥ सम्पूर्ण ग्रीष्मकालमें चन्दन समाप्त होनेके तक श्रीमाधवेन्द्रपुरीका रेमुणामें ठहरना :- प्रत्यह चन्दन पराय, यावत् हैल अन्त। तथाय रहिल पुरी तावत् पर्यन्त ॥ 168 ॥ अनुवाद-प्रतिदिन श्रीगोपीनाथके अङ्गों पर चन्दनका लेप किया जाता रहा जब तक वह समाप्त नहीं हो गया। श्रीमाधवेन्द्रपुरी तब तक रेमुणामें ही रहे ॥ 168 ॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा नीलाचलमें चातुर्मास्य-पालन :- ग्रीष्मकाल-अन्ते पुनः नीलाचले गेला। नीलाचले चातुर्मास्य आनन्दे रहिला ॥ 169 ॥ अनुवाद-ग्रीष्मकालके अन्तमें श्रीमाधवेन्द्रपुरी पुनः नीलाचल चले गये और चातुर्मास्यमें वे आनन्दपूर्वक नीलाचलमें रहे ॥ 169 ॥ अनुभाष्य- 'चातुर्मास्य' - आषाढ़ मासके शुक्लपक्षमें शयन एकादशीसे आरम्भ करके कार्तिक शुक्लपक्षकी उत्थान-एकादशी तक चार चन्द्रमास; अथवा आषाढ़ी पूर्णिमासे कार्तिकी पूर्णिमा तक चार चन्द्रमास; अथवा श्रावणसे कार्तिक तक चार सौरमासका समय-चातुर्मास्य-वर्षाकाल है। इन चार मासोंका व्रत चारों आश्रमोंके सभी व्यक्तियोंके लिये पालनीय है। इसका उद्देश्य सभी प्रकारके भोगोंका त्याग है। श्रावणमें साग, भाद्रमें दही, आश्विनमें दूध और कार्तिकमें आमिष (और आमिष-जातीय वस्तुओं) का त्याग करना चाहिये। जड़-भोगयोग्य विषयोंका त्याग ही इस चातुर्मास्यकी शिक्षाका तात्पर्य है। श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिये श्रीमाधवेन्द्रपुरीने जो यत्न किये, वे कोई सांसारिक विषय भोग नहीं है ॥ 47-169 ॥ महाप्रभुको श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चरित्र-वर्णनमें आनन्द :- श्रीमुखे माधवपुरीर अमृत-चरित। भक्तगणे शुनाञा प्रभु करे आस्वादित ॥ 170 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीनिताइको श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रेमकी महिमाका वर्णन :- प्रभु कहे, - "नित्यानन्द, करह विचार। पुरी-सम भाग्यवान् जगते नाहि आर ॥ 171 ॥ दुग्धदान-छले कृष्ण याँरे देखा दिल। तिनबारे स्वप्ने आसि' याँरे आज्ञा कैल ॥ 172 ॥ याँर प्रेमे वश हञा प्रकट हइल। सेवा अङ्गीकार करि' जगत तारिल ॥ 173 ॥ याँर लागि' गोपीनाथ क्षीर कैल चुरि। अतएव नाम हैल 'क्षीरचोरा' करि' ॥ 174 ॥ अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु अपने श्रीमुखसे भक्तोंको श्रीमाधवेन्द्रपुरीका अमृतमय चरित सुना रहे थे और स्वयं भी उसका आस्वादन कर रहे थे। महाप्रभुने आगे कहा, - "नित्यानन्द ! विचार करो। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके समान भाग्यवान् जगत्में और कोई नहीं है। दूध देनेके छलसे श्रीकृष्णने जिन्हें साक्षात् दर्शन दिया। तीन बार स्वप्नमें आकर जिन्हें आदेश दिया। जिनके प्रेमके वशीभूत होकर श्रीगोपाल प्रकट हुए और जिनकी सेवा स्वीकार की तथा समस्त जगत्वासियोंका उद्धार किया। जिनके लिये श्रीगोपीनाथने खीरकी चोरी की, जिस कारण उनका नाम 'क्षीरचोरा' हो गया ॥ 170-174 ॥ कर्पूर चन्दन याँर अङ्गे चढ़ाइल। आनन्दे पुरी-गोसाञिर प्रेम उथलिल ॥ 175 ॥ श्रीगोपालके स्थानपर श्रीगोपीनाथको चन्दन लगवानेका तात्पर्य :- म्लेच्छदेशे कर्पूर-चन्दन आनिते जञ्जल। पुरी दुःख पाबे, इहा जानिया गोपाल ॥ 176 ॥ महा-दयामय प्रभु-भकतवत्सल। चन्दन परि' भक्तश्रम करिल सफल ॥ 177 ॥ । 133