श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 984, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 4/175-182 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीने कर्पूर-चन्दन श्रीगोपीनाथके श्रीअङ्गोंमें लगवाया और आनन्दसे उनके हृदयमें प्रेमकी लहरें उठने लगीं। म्लेच्छोंके देशोंसे होकर कर्पूर-चन्दनको वृन्दावन लाना बड़ा जञ्जाल था। श्रीमाधवेन्द्रपुरीको इससे बहुत कष्ट होगा—यह जानकर परम दयालु भक्तवत्सल प्रभुने श्रीगोपीनाथके रूपमें ही चन्दन सेवाको ग्रहणकर अपने भक्तके परिश्रमको सफल किया॥ 175-177॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'म्लेच्छ देश'—मेदिनीपुर जिलाके अनेक अंशों तक उत्कल राजाका राज्य था; वह हिन्दु राजाका देश था। उसके बाद प्रायः सभी देश ही म्लेच्छ राजाओंके अधीन थे। स्थान-स्थानपर म्लेच्छ राजाके अनुचर पथिकोंके सामानसे अच्छी-अच्छी वस्तुओंको निकालकर अपने पास रख लेते थे। गौड़देशमें कर्पूर और चन्दन दुर्लभ थे। इसलिये कोई जञ्जाल खड़ा हो जायेगा, इस आशङ्कासे ही कि पुरी गोसाईंको वृन्दावन तक जाते हुए बहुत कष्ट उठाना पड़ेगा और उस कष्टको दूर करनेके लिये ही श्रीगोपालने पुरी गोस्वामीको रेमुणामें विराजमान श्रीगोपीनाथको चन्दन अर्पण करनेकी आज्ञा प्रदान की थी॥ 176-177॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रेम और चरित्रकी महिमा :- पुरीर प्रेम-पराकाष्ठा करह विचार। अलौकिक प्रेमे चित्ते लागे चमत्कार ॥ 178 ॥ परम-विरक्त, मौनी, सर्वत्र उदासीन। ग्राम्यवार्त्ता-भये द्वितीय-सङ्ग-हीन ॥ 179 ॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रेमकी पराकाष्ठापर विचार करो। उनके अलौकिक प्रेमसे तुम्हारे चित्तमें चमत्कार होगा। वे परम-विरक्त, मौनी (अर्थात् श्रीकृष्ण कथाको छोड़कर और कुछ भी नहीं बोलते थे) और जड़ीय विषयोंके प्रति सदैव उदासीन रहते थे। ग्राम्यवार्त्ताके भयसे वे किसीका सङ्ग नहीं करते थे॥ 178-179 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णविरह अर्थात् चिद्-विप्रलम्भ ही जीवोंके भजनका एकमात्र साधन है। जड़-विरह अर्थात् सांसारिक भोग प्राप्त न होनेपर उनसे उत्पन्न निर्वेद जड़की ही आसक्तिको प्रकाशित करता है। किन्तु श्रीकृष्णविरहसे उत्पन्न सांसारिक-भोगोंसे वैराग्य श्रीकृष्णेन्द्रिय-प्रीतिकी कामनाका श्रेष्ठ प्रदर्शन है। यहाँपर मूल-महाजन श्रीपाद माधवेन्द्रपुरीकी अपूर्व श्रीकृष्णेन्द्रिय- प्रीतिकी कामना श्रीकृष्णसेवा-अभिलाषी जीवोंका एकमात्र आदर्श और विशेषरूपसे लक्ष्य करने योग्य विषय है—यही श्रीमन्महाप्रभुने और उनकी अन्तरङ्ग शक्तियोंने (अन्तरङ्ग परिकरोंने) बादमें आचरण करके दिखाया है। 'ग्राम्यवार्त्ता'—स्त्री-पुरुषमें होनेवाली बात, ग्राम सम्बन्धीय सब प्रकारकी बातें। ग्राम—(भाः 11/25/25) श्लोकमें— "ग्रामो राजस उच्यते"; (भाः 11/25/28 और 29) श्लोकमें— "राजसञ्चेन्द्रियप्रेष्ठम्", "विषयोत्थन्तु राजसम्"— अपनी इन्द्रियोंकी तृप्ति करनेवाला अथवा विषयभोगोंको उत्पन्न करनेवाला अर्थात् जागतिक कामोद्दीपक कार्यमात्र ही राजस अर्थात् ग्राम्य है ॥ 178-179 ॥ सेव्यकी आज्ञा पालनमें असहाय पुरीका अपूर्व उद्यम :- हेन-जन गोपालेर आज्ञामृत पाञा। सहस्र क्रोश आसि' बुले चन्दन मागिञा ॥ 180 ॥ भोके रहे, तबु अन्न मागिञा ना खाय। हेन-जन चन्दन-भार बहि' लञा जाय ॥ 181 ॥ अनुवाद—वे ऐसे व्यक्ति थे जो श्रीगोपालके आज्ञामृतको पाकर हजार कोस चलकर चन्दनकी भिक्षा माँगने गये थे। जो भूखे रहकर भी किसीसे अन्न माँगकर नहीं खाते थे, ऐसे व्यक्ति माँगकर चन्दनका भार उठाकर ले जा रहे थे॥ 180-181 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'भोके रहे'—भूखे रहकर ॥ 181 ॥ स्वयं बहुत दुःख सहन करनेपर भी प्रभुकी सेवासे ही श्रीमाधवेन्द्रपुरीको आनन्द :- 'मणेक चन्दन, तोला-बिशेक कर्पूर। गोपाले पराइब',—एइ आनन्द प्रचुर ॥ 182 ॥ 134 ।