भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 985, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 985

चौथा अध्याय 4/182-190 ] उत्कलेर दानी राखे चन्दन देखिञा। ताँहा एड़ाइल राजपत्र देखाञा॥183॥ म्लेच्छदेशे दूर पथ, जगाति अपार। केमते चन्दन निब—नाहि ए विचार॥184॥ सङ्गे एक वट नाहि घाटीदान दिते। तथापि उत्साह बड़, चन्दन लञा याइते॥185॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरी यही विचार करते हुए परम आनन्दित होकर एक मन चन्दन और बीस तोला कर्पूर लेकर जा रहे थे कि इनका लेपन श्रीगोपालके अङ्गोंपर करके उनका ताप दूर करूँगा। उत्कल प्रदेशके कर-अधिकारीने चन्दनको देखकर उसे रोक लिया, किन्तु श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उन्हें राजपत्र दिखाकर उनसे छुड़ा लिया। (उत्कल देशके राजा तो हिन्दु हैं और उनका अनुमति पत्र भी साथ है), परन्तु म्लेच्छोंके देशोंसे होते हुए बहुत दूर चन्दनको ले जाना है, मार्गमें उनके अनेक पहरेदार हैं और कैसे वहाँसे चन्दन ले जाऊँगा—श्रीमाधवेन्द्रपुरीने इन सबका कुछ भी विचार नहीं किया। यद्यपि उनके पास पथ-कर देनेके लिये एक कौड़ी भी नहीं थी, तथापि श्रीगोपालके लिये चन्दन लेकर जानेका उनमें प्रबल उत्साह था॥182-185॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'जगाति'—प्रहरीके छलसे मार्गमें कर लेनेके बहाने लूटनेवाले। 'वट'—कौड़ी॥184-185॥ अनुभाष्य—'राखे'—रोका था॥183॥ श्रीकृष्णके प्रेमीके लक्षण :— प्रगाढ़-प्रेमेर एइ स्वभाव-आचार। निज-दुःख-विघ्नादिर ना करे विचार॥186॥ अनुवाद—श्रीकृष्णमें प्रगाढ़ प्रेमवालोंका स्वाभाविक आचरण ही ऐसा है कि वे अपने दुःख-विघ्नादिका कोई विचार नहीं करते॥186॥ अनुभाष्य—प्रगाढ़ प्रेम करनेवालोंके स्वाभाविक आचरणमें ऐसा ही देखा जाता है कि अपनी कामनाकी पूर्तिके विपरीत-भाव दुःख-विघ्नादि उन्हें कोई बाधा नहीं देते; अपितु लाखों विघ्न और निरन्तर दुःखोंके बीच ही वे पूर्णमात्रामें अपनी प्रीतिका परिचय देते हैं। “तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्ष्यमाणः” यह भागवतीय श्लोक इस जड़ जगत्की बद्धानुभूति और द्वितीयाभिनिवेशसे मुक्त होनेकी योग्य पात्रताके विचारका उदाहरण है। भगवान्से प्रगाढ़ प्रेम करनेवाले इस जगत्के किसी अभाव, विघ्न और दुःख आदिका विचार नहीं करते। “यत देख वैष्णवेर व्यवहार-दुःख। निश्चय जानिह सेइ परानन्दसुख॥” अर्थात् श्रीकृष्णसेवामें जब वैष्णवको बाहरसे दुःख प्राप्त होता हुआ दिखायी दे, तो भी निश्चित जानो कि उसके हृदयमें परमानन्द अनुभव हो रहा है। श्रीमन्महाप्रभुके “आश्लिष्य वा पादरतां” (श्रीशिक्षाष्टक आठवाँ श्लोक) वचनमें इसी चरम शिक्षाको ही हम लक्ष्य करते हैं॥186॥ श्रीकृष्णके द्वारा अपने भक्तकी महिमाका प्रदर्शन :— एइ तार गाढ़ प्रेमा लोके देखाइते। गोपाल ताँरे आज्ञा दिल चन्दन आनिते॥187॥ बहु परिश्रमे चन्दन रेमुणा आनिल। आनन्द बाड़िल मने, दुःख ना गणिल॥188॥ अनुवाद—उनके इस प्रगाढ़ प्रेमको जगत्वासियोंको दिखानेके लिये ही श्रीगोपालने उन्हें चन्दन लानेकी आज्ञा दी थी। श्रीमाधवेन्द्रपुरी बहुत परिश्रमसे चन्दनको लेकर नीलाचलसे रेमुणा तक पहुँचे, परन्तु उन्होंने इसमें कोई कष्ट अनुभव नहीं किया, अपितु उनके हृदयमें आनन्द ही वर्धित होता रहा॥187-188॥ भक्तकी परीक्षा और भक्तका परीक्षामें उत्तीर्ण होना :— परीक्षा करिते गोपाल कैल आज्ञा दान। परीक्षा करिया शेषे हैल दयावान्॥189॥ भक्त और भगवान्—परस्पर अलौकिकी रति :— एइ भक्ति, भक्तप्रिय-कृष्ण-व्यवहार। बुझितेओ आमा-सबार नाहि अधिकार॥”190॥ । 135

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