भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 986, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 986

[ 4/189-197 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—अपने भक्तकी परीक्षा लेनेके लिये ही श्रीगोपालने उन्हें ऐसा आदेश दिया था। परीक्षामें उत्तीर्ण होनेपर अन्तमें श्रीगोपालने उनपर पूर्ण दया की। श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी ऐसी भक्ति और भक्तोंके प्रियतम श्रीकृष्णके व्यवहारको समझनेमें हम सबका अधिकार नहीं है॥”189-190॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीमाधवेन्द्रपुरी रचित अतुलनीय महिमायुक्त श्लोकका वर्णन :— एत बलि' पड़े प्रभु ताँर कृत श्लोक। येइ श्लोक-चन्द्रे जगत् करेछे आलोक ॥ 191 ॥ घषिते घषिते यैछे मलयज-सार। गन्ध बाड़े, तैछे एइ श्लोकेर विचार ॥ 192 ॥ रत्नगण-मध्ये यैछे कौस्तुभमणि। रसकाव्य-मध्ये तैछे एइ श्लोक मणि ॥ 193 ॥ एइ श्लोक कहियाछेन राधा-ठाकुराणी। ताँर कृपाय स्फुरियाछे माधवेन्द्र-वाणी ॥ 194 ॥ अनुवाद—यह कहकर महाप्रभुने श्रीमाधवेन्द्रपुरीके द्वारा रचित वह श्लोक पढ़ा जो चन्द्रमाकी भाँति जगत्को प्रकाश प्रदान करनेवाला है। घिसते-घिसते जैसे मलय-चन्दनकी सुगन्धि बढ़ती है, वैसे ही इस श्लोकका जितना विचार किया जाय, उतना ही इसका रसास्वादन होता है। रत्नोंमें जैसे कौस्तुभमणि सर्वश्रेष्ठ है, वैसे ही समस्त रसकाव्योंमें इस श्लोकको जानो। श्रीराधा ठाकुराणीने ही यह श्लोक कहा है और उन्हींकी कृपासे ही यह श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी वाणीमें स्फुरित हुआ॥ 191-194॥ श्रीराधा, श्रीमाधवेन्द्रपुरी और श्रीगौर—केवल इन तीनोंकी ही इस श्लोकको आस्वादन करनेकी योग्यता :— किंवा गौरचन्द्र इहा करे आस्वादन। इहा आस्वादिते आर नाहि चौठजन ॥ 195 ॥ शेषकाले एइ श्लोक पठिते पठिते। सिद्धिप्राप्त हैल पुरीर श्लोकेर सहिते ॥ 196 ॥ अनुवाद—[श्रीमती राधिका, श्रीमाधवेन्द्रपुरी और] श्रीगौरचन्द्र—इन तीनोंने ही इस श्लोकका आस्वादन किया। इनके अतिरिक्त इस श्लोकका आस्वादन करने योग्य कोई चौथा व्यक्ति है ही नहीं। अपने प्रकटकालके अन्तिम समयमें श्रीमाधवेन्द्रपुरीने इस श्लोकको पढ़ते-पढ़ते ही सिद्धि प्राप्त की थी॥ 195-196॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'चौठजन'—चौथा व्यक्ति; अर्थात् श्रीराधा ठाकुराणी, श्रीमाधवेन्द्रपुरी और महाप्रभु,—इन तीनोंने ही इस श्लोकका आस्वादन किया है; अन्य कोई चौथा व्यक्ति इसको आस्वादन करने योग्य नहीं था॥195॥ पद्यावलीमें चतुःशताङ्क-उद्धृत श्रीमाधवेन्द्रपुरीके वचन :— अयि दीनदयार्द्रनाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्यसे। हृदयं त्वदलोककातरं दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम् ॥ 197 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 197॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ओहे दीनदयार्द्रनाथ! ओहे मथुरानाथ! कब तुम्हारे दर्शन करूँगी? तुम्हारे दर्शनके अभावमें मेरा कातर हृदय अस्थिर हो गया है। हे दयित (प्रियतम)! अब मैं क्या करूँ? तात्पर्य,—शुद्धभक्तिवादी वेदान्तमूलक वैष्णवगण चार सम्प्रदायोंमें विभक्त हैं; उनमें श्रीमध्वाचार्य-सम्प्रदायको स्वीकार करके श्रीमाधवेन्द्रपुरीने वैष्णव-संन्यास ग्रहण किया था। श्रीमध्वाचार्यसे श्रीमाधवेन्द्रपुरीके गुरु श्रीलक्ष्मीपति तक इस सम्प्रदायमें शृङ्गार-रसमयी भक्ति नहीं थी। उनकी जैसी भक्ति थी, वह महाप्रभुके दक्षिण देशमें भ्रमणके समय तत्त्ववादियोंके साथ हुए विचारसे जानी जाती है। श्रीमाधवेन्द्रपुरीने इस अपूर्व श्लोक-रचनाके द्वारा शृङ्गार-रसमयी भक्तिके बीजको बोया। इसमें भाव यह है,—मथुरा गये हुए श्रीकृष्णके वियोगमें श्रीमती राधिकाके महाप्रेमका जो उच्छ्वास हुआ था अर्थात् उनका जो भावोद्गार प्रकट हुआ था, उन्हीं भावोंके 136 ।

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