श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 987, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय 4/197-203 ] अनुगत होकर जो श्रीकृष्णभजन किया जाता है, वही सर्वोत्तम है। इस रसके भक्त अपने आपको अत्यन्त दीन मानकर 'दीनदयार्द्रनाथको' इस भावसे पुकारेंगे। जीवके लिये श्रीकृष्णसे वियोगका भाव ही स्वाभाविक भजन है। श्रीकृष्ण मथुरा चले गये हैं, उनके दर्शनके बिना श्रीमती राधिकाका हृदय अत्यन्त कातर होकर उनके दर्शनके लालसासे कह रहा है, - "हे कान्त, तुम्हारे दर्शनके अभावमें मेरा हृदय अत्यन्त व्याकुल है; बताओ, मेरे क्या करनेसे तुम्हारे दर्शन प्राप्त होंगे? मुझे दीन समझकर तुम दयार्द्र होओ अर्थात् तुम्हारा हृदय द्रवित हो।" श्रीमाधवेन्द्रपुरीके इस भावके साथ श्रीमहाप्रभुमें प्रकाशित श्रीमती राधिकाके उद्धव-दर्शनसे जिस भाव वैचित्र्यका वर्णन (इस ग्रन्थमें) हुआ है, उसकी समानता अनायास ही दिखायी देती है। इसलिये महाजनोंने कहा है कि शृङ्गार-रसवृक्षके मूल श्रीमाधवेन्द्र पुरी हैं, श्रीईश्वरपुरी उसका अङ्कुर और महाप्रभु उसके मूल स्कन्ध हैं। महाप्रभुके अनुगत भक्तगण-उसकी शाखा-उपशाखा हैं॥ 197 ॥ चौथे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य- अयि (श्रीवृषभानुराजनन्दिन्याः स्वरमणं प्रति मधुरसम्बोधनं) हे दीनदयार्द्र (दीनानां कृष्णविरहकातराणां गोपीनां स्वजनानां सम्बन्धे या दया, तासां विप्रलम्भापनोदिनी साक्षाद्रूपगुणलीला- स्फूर्तिविधायिनी कृपा, तया आर्द्र, सरसहृदय, - उत्कटविरह- तापार्त्त-गोपीकृपापरकोमलचित्त) हे नाथ (मादृशगोपीजनैकवल्लभ) हे मथुरानाथ (माथुरजनेश्वर, चेत् गोपीजनवल्लभाभिमानस्तव वर्त्तते, तदा अस्मान् गोपीः विस्मृत्य कथम् ऐश्वर्यवासनया माथुर-साधारणी-कान्तामोदार्थं तत्रावस्थितिः, अतः, गोपीकृपारहित- कठिनहृदय) कदा त्वं [विरहकातरया गोप्या तद्भावाश्रितया मया] अवलोक्यसे? हे दयित (हे प्राणेभ्योऽपि प्रियतम) त्वदलोककातरं हृदयं (तव दर्शनाय कातरं व्याकुलं उद्घूर्णाचित्रजल्पादिमयं गोपीजनहृदयं) भ्रामयति (उन्मादयति) किं करोमि, [तत् कथय]। श्लोक भावानुवाद-वृषभानुनन्दिनी श्रीमती राधिका श्रीकृष्णके मथुरा चले जानेपर उनको गौरवरहित मधुर सम्बोधनके द्वारा कह रही हैं-अरे! (मदीय भावके कारण यह अति गूढ़ सम्बन्धका सूचक है)। हे कृष्ण! तुम विरहमें कातर हम दीन गोपियोंके विरह-तापको दूर करनेवाली साक्षात् रूप-गुण-लीला-स्फूर्तिरूपिणी कृपा करते हो, क्योंकि हमारे विरह तापसे तुम्हारा चित्त विगलित हो जाता है। तुम तो हम गोपियोंके एकमात्र नाथ अर्थात् प्राणवल्लभ हो। [किन्तु] हे मथुरानाथ! अर्थात् हम गोपियोंके वल्लभ होनेका अभिमान होनेपर भी अब मथुरावासियोंके नाथ बने हो? हम गोपियोंको भूलकर कैसे ऐश्वर्यभावयुक्त मथुराकी साधारणी कान्ताओंके आनन्दका विधान कर रहे हो (हम गोपियोंके द्वारा की जानेवाली सेवासे वञ्चित होनेके कारण तुम कठोर हृदय हो गये हो)। तुम्हारे विरहमें कातर मैं कब तुम्हारे दर्शन प्राप्त करूँगी? हे दयित (प्राणोंसे भी प्रियतम)! तुम्हारे दर्शनके लिये व्याकुल मेरा हृदय उद्घूर्णा-चित्रजल्पादि अनुभावोंके द्वारा उन्मादित हो रहा है, [तुम ही यह बतलाओ] ऐसी दशामें मैं क्या करूँ? ॥ 197 ॥ महाप्रभुकी मूर्च्छा और विप्रलम्भ-भावोन्माद :- एइ श्लोक पड़िते प्रभु हइला मूर्च्छिते। प्रेमेते विवश हञा पड़िल भूमिते ॥ 198 ॥ आस्ते व्यस्ते कोले करि' निल नित्यानन्द। क्रन्दन करिया तबे उठे गौरचन्द्र ॥ 199 ॥ प्रेमोन्माद हैल, उठि' इति-उति धाय। हुङ्कार करये, हासे, कान्दे, नाचे, गाय ॥ 200 ॥ 'अयि दीन', 'अयि दीन' बले बारबार। कण्ठे ना निःसरे वाणी, नेत्रे अश्रुधार ॥ 201 ॥ कम्प, स्वेद, पुलकाश्रु, स्तम्भ, वैवर्ण्य। निर्वेद, विषाद, जाड्य, गर्व, हर्ष, दैन्य ॥ 202 ॥ एइ श्लोके उघाड़िला प्रेमेर कपाट। गोपीनाथ-सेवक देखे प्रभुर प्रेमनाट ॥ 203 ॥ अनुवाद-इस श्लोकका उच्चारण करते ही प्रेममें । 137