भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 982

[ 4/157-167 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कर्पूर-सहित घषि' एसब चन्दन। गोपीनाथेर अङ्गे सब करह लेपन॥159॥ गोपीनाथ आमार से एकइ अङ्ग हय। इँहाके चन्दन दिले, आमार ताप-क्षय॥160॥ द्विधा ना भाविह, ना करिह किछु मने। विश्वास करि' चन्दन देह आमार वचने॥"161॥ प्रभुर आज्ञा हैल,–"एइ कर्पूर-चन्दन। गोपीनाथेर अङ्गे नित्य करह लेपन॥163॥ इँहाके चन्दन दिले, गोपाल हइबेन शीतल। स्वतन्त्र ईश्वर,-ताँर आज्ञा से प्रबल॥164॥ ग्रीष्मकाले गोपीनाथ परिबे चन्दन।" शुनि' आनन्दित हैल सेवकेर मन॥165॥ अनुवाद-उस रात श्रीमाधवेन्द्रपुरीने श्रीगोपीनाथजीके मन्दिरमें ही शयन किया और रातके अन्तमें उन्होंने एक स्वप्न देखा। श्रीगोपालने स्वप्नमें आकर उनसे कहा,-"सुनो माधवेन्द्र ! मैंने यह सब कर्पूर-चन्दन प्राप्त कर लिया है। अब तुम कर्पूरके साथ इस सब चन्दनको घिसकर गोपीनाथके सभी अङ्गोंपर नित्य लेप करो जब तक वह पूरा समाप्त न हो जाय। मेरा और गोपीनाथका एक ही शरीर है। इनको चन्दन लेप करनेसे मेरे अङ्गोंका ताप दूर हो जायेगा। किसी दुविधामें नहीं पड़ो और मनमें कुछ भी संशय मत रखो, मेरी बातपर विश्वास करके गोपीनाथके अङ्गोंमें चन्दनका लेपन कर दो॥"157-161॥ अनुभाष्य-श्रीगोपालको न लगाकर श्रीगोपीनाथको चन्दन लगानेका तात्पर्य यह है, - श्रीगोपालकी भूमि वृन्दावन है, जो रेमुणासे बहुत योजन दूरीपर है। विशेषतः वहाँ जानेके लिये विधर्मी म्लेच्छोंके द्वारा शासित प्रदेशको पार करके जाना होता है; उसमें बहुत विघ्न-बाधाएँ हैं। इसलिये प्रियतम भक्तश्रेष्ठ पुरी गोस्वामीको कष्ट होगा, ऐसा जानकर भक्तवत्सल भक्तप्रेमके वशीभूत श्रीगोपालने अपनेसे अभिन्न-विग्रह श्रीगोपीनाथके श्रीअङ्गोंमें ही चन्दनका लेपन करनेके लिये कहकर भक्तके श्रमको सफल और कम किया। परवर्ती 176-177 संख्या देखें॥159-160॥ सेवकोंको श्रीगोपालकी आज्ञा बताना :- एत बलि' गोपाल गेल, गोसाञि जागिला। गोपीनाथेर सेवकगणे डाकिया आनिला॥162॥ अनुवाद-इतना कहकर श्रीगोपाल अन्तर्धान हो गये। श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उठकर श्रीगोपीनाथके सेवकोंको बुलाया और कहा कि श्रीगोपालकी आज्ञा हुई है,-"इस कर्पूर-चन्दनको घिसकर श्रीगोपीनाथजीके श्रीअङ्गोंपर नित्य लेपन करो। इनको चन्दन लगानेसे श्रीगोपालके अङ्ग स्वतः ही शीतल हो जायेंगे। वे स्वतन्त्र ईश्वर हैं, उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं करना चाहिये। ग्रीष्मकालमें श्रीगोपीनाथके श्रीअङ्गोंपर चन्दन लगेगा।" यह सुनकर सभी सेवकोंके मनमें आनन्द हो गया॥162-165॥ अनुभाष्य-'स्वतन्त्र'-स्वेच्छामय॥164॥ साथमें आये दोनों सेवकोंको चन्दन-घिसनेमें लगाना :- पुरी कहे,-"एइ दुइ घषिबे चन्दन। आर जना-दुइ देह, दिब ये वेतन॥"166॥ अनुवाद-श्रीमाधवेन्द्रपुरीने कहा,–“(मेरे साथ नीलाचलसे आये) ये दोनों व्यक्ति चन्दन घिसेंगे। आप चन्दन घिसनेके लिये मुझे दो लोग और दे दीजिये, उनका वेतन मैं दूँगा॥”166॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'एइ दुइ'-पुरी गोस्वामीके साथ जो दो लोग आये हैं॥166॥ श्रीमाधवेन्द्रपुरीके वचन अनुसार सेवकोंके द्वारा आनन्दित होकर चन्दन लगाना :- एइ मत चन्दन देय प्रत्यह घषिया। पराय सेवक सब आनन्द करिया॥167॥ 132 ।