श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 960, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय 3/212-218 ] बाधा होगी, इस भयसे स्वजनोंके रोने आदिको सुनकर भी महाप्रभु निष्ठुरकी भाँति नीलाचलकी ओर चल दिये। यद्यपि उनके इस कार्यसे नास्तिक नीतिवादी लोग उन्हें 'अत्यन्त निष्ठुर' कहेंगे, तथापि जगद्गुरुके रूपमें उन्होंने जीवोंके लिये यह शिक्षा दी कि उनका जो सर्वोत्तम परमधर्म श्रीकृष्णसेवा-चेष्टा है, वही एकमात्र प्रयोजनीय कार्य है। असार नाशवान् भोगोंके फलस्वरूप संसारमें ही आसक्ति और बन्धन होनेसे श्रीकृष्णसेवा नहीं हो सकती। इसलिये जगत्की दृष्टिमें अत्यधिक प्रशंसित सुनीति भी यदि श्रीकृष्णसेवाकी विरोधी हो, तो यह पथ महाप्रभुके विचारोंके विरुद्ध है। “निरपेक्ष ना हइले धर्म रक्षणे ना याय” (अर्थात् निरपेक्ष नहीं होनेसे धर्मकी रक्षा नहीं हो सकती) - महाप्रभुके श्रीमुखसे निकली यह वाणी विचारणीय है ॥ 212 ॥ श्रीअद्वैताचार्यको सान्त्वना देकर उनकी विदायी :- कत दूर गिया प्रभु करि' जोड़-हात। आचार्ये प्रबोधि' किछु कहे मिष्ट बात ॥ 213 ॥ “जननी प्रबोध, कर भक्त-समाधान। तुमि व्यग्र हैले कारो ना रहिबे प्राण ॥” 214 ॥ एत बलि' प्रभु ताँरे करि' आलिङ्गन। निवृत्त करिया कैल स्वच्छन्द गमन ॥ 215 ॥ अनुवाद - कुछ दूर जानेपर महाप्रभुने हाथ जोड़कर श्रीअद्वैताचार्य प्रभुको सान्त्वना देते हुए कुछ मधुर वचन कहे, - “आप घर लौटकर शचीमाता तथा भक्तोंको सान्त्वना प्रदान करो। यदि आप ही इस प्रकार व्याकुल हो जायेंगे, तो कोई भी प्राण धारण नहीं कर सकेगा।” यह कहकर महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यका आलिङ्गनकर उन्हें अपने पीछे आनेसे रोककर स्वच्छन्द रूपसे नीलाचलके लिये गमन किया ॥ 213-215 ॥ छत्रभोगके मार्गसे महाप्रभुका पुरीगमन :- गङ्गातीरे-तीरे प्रभु चारिजन-साथे। नीलाद्रि चलिला प्रभु छत्रभोग-पथे ॥ 216 ॥ अनुवाद - महाप्रभु चारों भक्तोंके साथ गङ्गाके किनारे-किनारे छत्रभोगके रास्तेसे होते हुए नीलाचलकी ओर चले ॥ 216 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'छत्रभोग-पथे' - महाप्रभु छत्रभोगके रास्ते गङ्गाके साथ-साथ आटिसार, पाणिहाटी, वराहनगरसे होते हुए चलने लगे। उस समय गङ्गा कलिकाताके दक्षिणसे कालीघाट होकर वारुइपुर आदि स्थानोंसे होकर डायमण्ड-हारबार-सबडिवीजनसे 'मथुरापुर' नामक थानेसे होकर सैकड़ों धाराओंके रूपमें समुद्रमें मिलती थी। महाप्रभु उसी रास्तेसे ही मथुरापुर थानेके अन्तर्गत 'अम्बुलिङ्ग' स्थानसे छत्रभोगके रास्तेसे नीलाचल गये थे॥ 216 ॥ तृतीय अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य - 'छत्रभोग' - चौबीस परगना जिलेमें मगराहाट-स्टेशनसे पूर्व-दक्षिणकी ओर छह-सात कोस दूर जयनगरके दो-तीन कोस दक्षिणमें यह गाँव अवस्थित है। इस गाँवको कोई-कोई 'खाड़ि' कहते हैं। यहाँपर 'बैजुर्कानाथ' नामक शिवलिङ्ग हैं। वहाँ चैत्रमासमें शुक्ला प्रतिपदाके दिन 'नन्दा'- मेला होता है। अब यहाँपर गङ्गा नहीं है। 'आटिसारा' - यह वारुइपुर स्टेशनके निकट है, ऐसा सुना जाता है ॥ 216 ॥ चैतन्यभागवतमें विस्तृत रूपसे वर्णन :- 'चैतन्यमङ्गले' प्रभुर नीलाद्रि गमन । विस्तारि' वर्णियाछेन दास-वृन्दावन ॥ 217 ॥ अद्वैत-गृहे प्रभुर विलास शुने येइ जन । अचिरे मिलये ताँरे कृष्णप्रेम-धन ॥ 218 ॥ अनुवाद - श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने श्रीचैतन्य- मङ्गल (श्रीचैतन्यभागवत) नामक ग्रन्थमें महाप्रभुके श्रीजगन्नाथपुरी गमनकी लीलाका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। श्रीअद्वैताचार्यके घरमें किये गये महाप्रभुके लीला-विलासका यदि कोई श्रवण करता है, तो उसे शीघ्र ही श्रीकृष्णप्रेम-धनकी प्राप्ति होती है। 217-218॥ । 109