भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २८ ] भगवान् महेश्वरके आभ्यन्तरपूजनका स्वरूप···जगतकी शिवरूपता [ १३३


श्लोकअर्थ
नमस्कारेण सततं गौरवात्परमेष्ठिनः।<br>सर्वं तु खल्विदं ब्रह्म सर्वो वै रुद्र ईश्वरः॥ २१सब कुछ रुद्र ही है॥ २०॥<br>परमेष्ठी शिवकी महिमाको समझकर उन्हें सतत नमस्कार करते हुए इस सम्पूर्ण जगत्को ब्रह्म अर्थात् शिवसे व्याप्त मानना चाहिये। उन्हीं शर्व, रुद्र, ईश्वर,
पुरुषो वै महादेवो महेशानः परः शिवः।<br>एवं विभुर्वनिर्दिष्टो ध्यानं तत्रैव चिन्तनम्॥ २२पुरुष, महादेव, महेशान, परात्पर, शिव तथा विभुको सर्वत्र विराजमान समझकर उन्हींका ध्यान एवं चिन्तन करना चाहिये॥ २१-२२॥
चतुर्व्यूहेन मार्गेण विचार्यालोक्य सुव्रत।<br>संसारहेतुः संसारो मोक्षहेतुश्च निर्वृतिः॥ २३हे सुव्रत! चतुर्व्यूहमार्गसे अर्थात् ध्येय, ध्यान, यजमान और प्रयोजनरूपसे विचार करके तथा देख करके जो परमेश्वरको जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है। संसारका हेतु ममत्व तथा मोक्षका हेतु विराग है।
चतुर्व्यूहः समाख्यातः चिन्तकस्येह योगिनः।<br>चिन्ता बहुविधा ख्याता सैकत्र परमेष्ठिना॥ २४चिन्तक योगीके लिये चतुर्व्यूहमार्ग मुक्तिका सर्वश्रेष्ठ साधन कहा गया है॥ २३ १/२॥<br>ब्रह्माजीने बुद्धिके लिये बहुत प्रकारकी चिन्ताएँ रचीं; किंतु रुद्रका चिन्तन सभी चिन्ताओंसे श्रेष्ठ कहा गया है; इसमें कोई संदेह नहीं है॥ २४ १/२॥
सुनिष्ठेत्यत्र कथिता रुद्रं रौद्री न संशयः।<br>ऐन्द्री चैन्द्रे तथा सौम्या सोमे नारायणे तथा॥ २५इन्द्रकी ऐन्द्री चिन्ता, सोमकी सौम्या नामक चिन्ता, नारायणकी चिन्ता, सूर्यकी चिन्ता तथा अग्निकी चिन्ता—इन सबकी चिन्ता वास्तवमें रुद्रकी ही चिन्ता है।
सूर्ये वह्नौ च सर्वेषां सर्वत्रैवं विचारतः।<br>सैवाहं सोऽहमित्येवं द्विधा संस्थाप्य भावतः॥ २६इस प्रकार विचार करके वह चिन्ता मैं ही हूँ तथा वह परमेश्वर भी मैं ही हूँ—जो भक्त इन दोनों बातोंको श्रद्धापूर्वक अपने मनमें स्थापित किये रहता है, वह परमेश्वरसे भिन्न नहीं है। अतः इस प्रकारकी चिन्ता (चिन्तन) ब्राह्मी चिन्ता कही गयी है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २५-२६ १/२॥
भक्तोऽसौ नास्ति यस्तस्माच्चिन्ता ब्राह्मी न संशयः।<br>एवं ब्रह्ममयं ध्यायेत्पूर्वं विप्र चराचरम्॥ २७हे विप्र! इस प्रकार पहले यह ध्यान करना चाहिये कि यह स्थावर-जंगमरूप जगत् ब्रह्ममय है; पुनः ब्रह्मात्मक शिवका स्मरण करते हुए चर-अचरका विभाग भी छोड़ देना चाहिये अर्थात् चराचरमें भिन्नताका भाव नहीं रखना चाहिये॥ २७ १/२॥
चराचरविभागं च त्यजेदभिमतं स्मरन्।<br>त्याज्यं ग्राह्यमलभ्यं च कृत्यं चाकृत्यमेव च॥ २८जिस पुरुषके लिये कुछ भी त्याज्य (त्यागनेयोग्य), ग्राह्य (लेनेयोग्य), अलभ्य (प्राप्त न होनेयोग्य), कृत्य (करनेयोग्य) तथा अकृत्य (न करनेयोग्य) नहीं रह जाता;
यस्य नास्ति सुतृप्तस्य तस्य ब्राह्मी न चान्यथा।<br>आभ्यन्तरं समाख्यातमेवमभ्यर्चनं क्रमात्॥ २९उस परम संतुष्ट पुरुषकी चिन्ता ब्राह्मी चिन्ता है; इसमें संदेह नहीं है॥ २८ १/२॥