श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १३४. | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| आभ्यन्तरार्चकाः पूज्या नमस्कारादिभिस्तथा।<br>विरूपा विकृताश्चापि न निन्द्या ब्रह्मवादिनः॥ ३०<br><br>आभ्यन्तरार्चकाः सर्वे न परीक्ष्या विजानता।<br>निन्दका एव दुःखार्ता भविष्यन्त्यल्पचेतसः॥ ३१<br><br>यथा दारुवने रुद्रं विनिन्द्य मुनयः पुरा।<br>तस्मात्सेव्या नमस्कार्याः सदा ब्रह्मविदस्तथा॥ ३२<br><br>वर्णाश्रमविनिर्मुक्ता वर्णाश्रमपरायणैः॥ ३३ | इस प्रकार मैंने क्रमसे आभ्यन्तर पूजनका वर्णन कर दिया। आभ्यन्तर अर्चन करनेवाले पुरुष नमस्कार आदिके द्वारा सदा पूजनीय हैं। ऐसे ब्रह्मवादी पूजक विरूप तथा विकृत हों; तो भी उनकी निन्दा नहीं करनी चाहिये॥ २९-३०॥<br><br>विद्वान् पुरुषको जान-बूझकर किन्हीं भी आभ्यन्तर पूजककी परीक्षा नहीं लेनी चाहिये। अल्प बुद्धिवाले ऐसे निन्दक उसी प्रकार दुःखसे पीड़ित होंगे, जैसे प्राचीन कालमें दारुवनमें रुद्रकी निन्दा करके मुनियोंने कष्ट प्राप्त किया था। अतएव वर्णाश्रममें रहनेवाले पुरुषोंको चाहिये कि वे वर्णाश्रमसे अतीत ब्रह्मवेत्ताओंकी सदा सेवा करें तथा उन्हें नमस्कार करें॥ ३१-३३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवार्चनतत्त्वसंख्यादिवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवार्चनतत्त्वसंख्यादिवर्णन' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २८॥
उनतीसवाँ अध्याय
देवदारुवनका वृत्तान्त, अतिथिमाहात्म्यमें सुदर्शनमुनिका आख्यान तथा संन्यासधर्मका वर्णन
| सनत्कुमार उवाच | सनत्कुमारजी बोले— |
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| इदानीं श्रोतुमिच्छामि पुरा दारुवने विभो।<br>प्रवृत्तं तद्वनस्थानां तपसा भावितात्मनाम्॥ १<br><br>कथं दारुवनं प्राप्तो भगवान्नीललोहितः।<br>विकृतं रूपमास्थाय चोर्ध्वरेता दिगम्बरः॥ २<br><br>किं प्रवृत्तं वने तस्मिन् रुद्रस्य परमात्मनः।<br>वक्तुमर्हसि तत्त्वेन देवदेवस्य चेष्टितम्॥ ३ | हे विभो! प्राचीनकालमें दारुवनमें तपस्यासे भावित आत्मावाले उन वनवासी मुनियोंके साथ जो भी घटित हुआ, उसे मैं इस समय सुनना चाहता हूँ॥ १॥<br><br>ऊर्ध्वरेता दिगम्बर भगवान् शिव विकृत रूप धारण करके दारुवनमें क्यों गये? उस वनमें परमात्मा रुद्रके साथ क्या हुआ? उन देवाधिदेव शिवके क्रिया-कलापोंका भी यथार्थ रूपसे वर्णन करनेकी कृपा कीजिये॥ २-३॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा श्रुतिसारविदां वरः।<br>शिलादसूनुर्भगवान् प्राह किञ्चिद्द्रवं हसन्॥ ४ | [हे ऋषिगण!] उन सनत्कुमारका यह वचन सुनकर श्रुतिसारविदोंमें वरिष्ठ शिलादपुत्र भगवान् नन्दिकेश्वर कुछ-कुछ हँसते हुए उनसे कहने लगे॥ ४॥ |
| शैलादिरुवाच | शैलादि बोले— |
| मुनयो दारुगहने तपस्तेपुः सुदारुणम्।<br>तुष्ट्यर्थं देवदेवस्य सदारतनयाग्नयः॥ ५ | एक बार घने देवदारुवनमें देवाधिदेव रुद्रकी प्रसन्नताके लिये अपने स्त्री-पुत्रादिसहित पंचाग्निका सेवन करते हुए मुनिगण कठोर तप कर रहे थे॥ ५॥ |