श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय २९ ] देवदारुवनका वृत्तान्त...संन्यासधर्मका वर्णन [ १३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तुष्टो रुद्रो जगन्नाथश्चेकितानो वृषध्वजः।<br>धूर्जटिः परमेशानो भगवानीललोहितः ॥ ६<br><br>प्रवृत्तिलक्षणं ज्ञानं ज्ञातुं दारुवनौकसाम्।<br>परीक्षार्थं जगन्नाथः श्रद्धया क्रीडया च सः ॥ ७<br><br>निवृत्तिलक्षणज्ञानप्रतिष्ठार्थं च शङ्करः।<br>देवदारुवनस्थानां प्रवृत्तिज्ञानचेतसाम् ॥ ८<br><br>विकृतं रूपमास्थाय दिग्वासा विषमेक्षणः।<br>मुग्धो द्विहस्तः कृष्णाङ्गो दिव्यं दारुवनं ययौ ॥ ९ | उनके तपसे प्रसन्न जगन्नाथ, चेकितान, वृषध्वज, धूर्जटि, परमेशान, नीललोहित भगवान् रुद्र दारुवनमें निवास करनेवाले उन मुनियोंके प्रवृत्ति-लक्षण तथा ज्ञानकी जानकारी करनेके लिये एवं उनमें श्रद्धाभावकी परीक्षा करनेके लिये और साथ ही प्रवृत्तिज्ञानसे युक्त चित्तवाले उन देवदारुवनवासी मुनियोंमें निवृत्ति-लक्षण तथा ज्ञान स्थापित करनेके निमित्त लीलापूर्वक विकृत रूप धारण करके अलौकिक दारुवनमें पहुँचे। उस समय शंकरजी कृष्ण वर्णवाले, दो भुजाओंवाले, तीन आँखोंवाले, दिगम्बर तथा मोहक स्वरूपवाले थे॥ ६—९॥ |
| मन्दस्मितं च भगवान् स्त्रीणां मनसिजोद्भवम्।<br>भ्रूविलासं च गानं च चकारातीव सुन्दरः ॥ १० | अत्यन्त सुन्दर रूपवाले भगवान् शिव मन्द मुसकान तथा भ्रूविलास करते हुए गीत गाकर स्त्रियोंमें कामभावना उत्पन्न कर रहे थे॥ १०॥ |
| सम्प्रेक्ष्य नारीवृन्दं वै मुहुर्मुहुरनङ्गहा।<br>अनङ्गवृद्धिमकरोदतीव मधुराकृतिः ॥ ११ | कामदेवका संहार करनेवाले तथा अत्यन्त मोहक आकृतिवाले भगवान् शिव वहाँ नारीसमूहको बार-बार देखकर उनके भीतर कामभावनाको बढ़ा रहे थे॥ ११॥ |
| वने तं पुरुषं दृष्ट्वा विकृतं नीललोहितम्।<br>स्त्रियः पतिव्रताश्चापि तमेवान्वयुरादरात् ॥ १२ | वनमें उस विकृत तथा नीललोहित वर्णवाले पुरुषको देखकर पतिव्रता स्त्रियाँ भी प्रेमपूर्वक उनके पीछे-पीछे चलने लगीं॥ १२॥ |
| वनोटजद्वारगताश्च नार्यो<br>विस्रस्तवस्त्राभरणा विचेष्टाः।<br>लब्ध्वा स्मितं तस्य मुखारविन्दाद्<br>द्रुमालयस्थास्तमथान्वयुस्ताः ॥ १३ | आरण्यक कुटीरोंके द्वारतक आयी हुई स्त्रियोंके वस्त्र एवं अलंकार शिथिल हो गये। वे मूर्च्छित-सी हो गयीं, उन लीलामय शिवके मुखारविन्दकी मोहक मुसकानको पाकर वृक्षोंके आश्रयमें रहनेवाली वे नारियाँ उनके पीछे-पीछे चल दीं॥ १३॥ |
| दृष्ट्वा काश्चिदुद्भवं नार्यो मदघूर्णितलोचनाः।<br>विलासबाह्यास्ताश्चापि भ्रूविलासं प्रचक्रिरे ॥ १४ | शिवजीको देखकर प्रौढ़ावस्थावाली होनेपर भी कुछ स्त्रियाँ मदमत्त होकर आँखें घुमाने लगीं तथा भौंहोंका संचालन करने लगीं॥ १४॥ |
| अथ दृष्ट्वा परा नार्यः किञ्चित्प्रहसिताननाः।<br>किञ्चिद्विस्रस्तवसनाः स्रस्तकाञ्चीगुणा जगुः ॥ १५ | तदनन्तर शिवको देखकर दूसरी स्त्रियाँ मुसकानयुक्त मुखवाली हो गयीं, उनके वस्त्र कुछ शिथिल-से हो गये, कांचीबन्धन भी ढीले हो गये; वे मिलकर गाने लगीं॥ १५॥ |
| काश्चित्तदा तं विपिने तु दृष्ट्वा<br>विप्राङ्गनाः स्रस्तनवांशुकं वा।<br>स्वान् स्वान् विचित्रान् वलयान् प्रविध्य<br>मदान्विता बन्धुजनांश्च जग्मुः ॥ १६ | उस समय शिवको विपिनमें देखकर कुछ ऋषिपत्नियों तो शिथिल नूतन वस्त्रों तथा अपने-अपने विचित्र वलयोंको फेंककर मदान्वित हो स्वजनोंके पास पहुँचीं॥ १६॥ |
| काचित्तदा तं न विवेद दृष्ट्वा<br>विवासना स्रस्तमहांशुका च। | उस समय शिथिल वस्त्रवाली कोई तो शिवको |