भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 138
१३६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शाखाविचित्रान् विटपान् प्रसिद्धान्<br>मदान्विता बन्धुजनांस्तथान्याः ॥ १७देखकर विशिष्ट वासनायुक्त हो गयी तथा अन्य स्त्रियाँ मतवाली-सी होकर विचित्र शाखावाले प्रसिद्ध वृक्षोंको एवं घनिष्ठ बन्धुजनोंतकको नहीं पहचानती थीं ॥ १७ ॥
काश्चिज्जगुस्तं ननृतुर्निपेतुश्च धरातले।<br>निषेदुर्गजवच्चान्या प्रोवाच द्विजपुङ्गवाः ॥ १८हे द्विजश्रेष्ठो ! कुछ स्त्रियाँ उनके पास जाकर नाचने लगीं और जमीनपर गिर पड़ीं। कुछ स्त्रियाँ हाथीकी भाँति बैठ गयीं। कोई दूसरी स्त्री कुछ बोलने लगी ॥ १८ ॥
अन्योन्यं सस्मितं प्रेक्ष्य चालिलिङ्गुः समन्ततः।<br>निरुध्य मार्गं रुद्रस्य नैपुणानि प्रचक्रिरे ॥ १९मुसकराते हुए एक-दूसरेको देखकर वे परस्पर आलिंगन करने लगीं। वे सभी ओरसे शिवजीका मार्ग रोककर अनेक प्रकारके हाव-भाव दर्शाने लगीं ॥ १९ ॥
को भवानिति चाहुस्तं आस्यतामिति चापराः।<br>कुत्रेत्यथ प्रसीदेति जजल्पुः प्रीतमानसाः ॥ २०कुछ स्त्रियाँ उनसे कहने लगीं कि 'आप कौन हैं? बैठिये। अन्य स्त्रियाँ भी प्रसन्नचित्त होकर कहने लगीं—आप कहाँ जा रहे हैं? आप हम सबपर प्रसन्न होइये' ॥ २० ॥
विपरीता निपेतुर्वै विस्रस्तांशुकमूर्धजाः।<br>पतिव्रताः पतीनां तु सन्निधौ भवमायया ॥ २१भगवान् शंकरकी मायाके प्रभावसे अपने पतियोंके सम्मुख ही पतिव्रता स्त्रियोंके वस्त्रपरिधान, केश आदि अस्त-व्यस्त हो गये और वे कामुक स्त्रियोंकी भाँति स्वेच्छाचारितापूर्ण व्यवहार प्रदर्शित करने लगीं ॥ २१ ॥
दृष्ट्वा श्रुत्वा भवस्तासां चेष्टावाक्यानि चाव्ययः।<br>शुभं वाप्यशुभं वापि नोक्तवान् परमेश्वरः ॥ २२उन स्त्रियोंके हाव-भाव देखकर तथा उनके वचन सुनकर निर्विकार परमेश्वर शिव शुभ अथवा अशुभ कुछ भी नहीं बोले ॥ २२ ॥
दृष्ट्वा नारीकुलं विप्रास्तथाभूतं च शङ्करम्।<br>अतीव परुषं वाक्यं जजल्पुस्ते मुनीश्वराः ॥ २३<br><br>तपांसि तेषां सर्वेषां प्रत्याहन्यन्त शङ्करे।<br>यथादित्यप्रकाशेन तारका नभसि स्थिताः ॥ २४उस प्रकारकी चेष्टावाली नारियोंके समूहको देखकर वे विप्र मुनीश्वर दिगम्बरवेशधारी शिवको उस अवस्थामें देखकर [शंकरजीके प्रति] अत्यन्त कठोर वचन कहने लगे। किंतु उनकी सभी तपस्याएँ शंकरजीके सम्मुख उसी प्रकार निष्फल सिद्ध हुईं, जिस प्रकार सूर्यके प्रकाशसे आकाश-मण्डलमें स्थित तारागण निस्तेज हो जाते हैं ॥ २३-२४ ॥
श्रूयते ऋषिशापेन ब्रह्मणस्तु महात्मनः।<br>समृद्धश्रेयसां योनिर्यज्ञो वै नाशमाप्तवान् ॥ २५ऐसा सुना जाता है कि महात्मा ब्रह्माका सभी समृद्धियों तथा कल्याणोंका उत्पत्तिस्थलस्वरूप यज्ञ ऋषिके शापसे विनष्ट हो गया था ॥ २५ ॥
भृगोरपि च शापेन विष्णुः परमवीर्यवान्।<br>प्रादुर्भावान् दश प्राप्तो दुःखितश्च सदा कृतः ॥ २६भृगुमुनिके शापसे परम ऐश्वर्यशाली विष्णुको भी दस अवतार लेने पड़े तथा अनेक दुःख सहने पड़े ॥ २६ ॥
इन्द्रस्यापि च धर्मज्ञ छिन्नं सवृषणं पुरा।<br>ऋषिणा गौतमेनोर्व्यां क्रुद्धेन विनिपातितम् ॥ २७हे धर्मज्ञ सनत्कुमार ! क्रुद्ध ऋषि गौतमने शापसे इन्द्रका अण्डकोषसहित गुह्यांग काटकर पृथ्वीपर गिरा