श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय २९ ] देवदारुवनका वृत्तान्त...संन्यासधर्मका वर्णन १३७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दिया था॥ २७॥ | |
| गर्भवासो वसूनां च शापेन विहितस्तथा।<br>ऋषीणां चैव शापेन नहुषः सर्पतां गतः॥ २८ | मुनि वसिष्ठके शापसे वसुओंको गर्भमें वास करना पड़ा, अगस्त्य आदि ऋषियोंके शापसे राजा नहुषको सर्प होना पड़ा था॥ २८॥ |
| क्षीरोदश्च समुद्रोऽसौ निवासः सर्वदा हरेः।<br>द्वितीयश्चामृताधारो ह्यपेयो ब्राह्मणैः कृतः॥ २९ | भगवान् विष्णुका निवासस्थान तथा अमृतका आधारस्वरूप वह क्षीरसागर ब्राह्मणोंके द्वारा सदाके लिये दूसरे अपेय जलवाले समुद्रके रूपमें कर दिया गया था॥ २९॥ |
| अविमुक्तेश्वरं प्राप्य वाराणस्यां जनार्दनः।<br>क्षीरेण चाभिषिच्येशं देवदेवं त्रियम्बकम्॥ ३०<br>श्रद्धया परया युक्तो देहाश्लेषामृतेन वै।<br>निषिक्तेन स्वयं देवः क्षीरेण मधुसूदनः॥ ३१<br>सेचयित्वाथ भगवान् ब्रह्मणा मुनिभिः समम्।<br>क्षीरोदं पूर्ववच्चक्रे निवासं चात्मनः प्रभुः॥ ३२ | जनार्दन भगवान् विष्णुने वाराणसीपुरीमें पहुँचकर अविमुक्तेश्वर देवाधिदेव त्र्यम्बकेश्वरका दूधसे अभिषेक करके परम श्रद्धासे युक्त होकर देहसंस्पर्शजन्य अमृतस्वरूप क्षीरद्वारा स्वयं उन मधुसूदनने ब्रह्माजी एवं मुनियोंके साथ भगवान् शिवको अभिषिक्त करके पूर्ववत् क्षीरसागरको अपना निवासस्थान बनाया॥ ३०—३२॥ |
| धर्मश्चैव तथा शप्तो माण्डव्येन महात्मना।<br>वृष्णयश्चैव कृष्णेन दुर्वासाद्यैर्महात्मभिः॥ ३३ | महात्मा माण्डव्यने धर्मको शापित किया तथा श्रीकृष्णकी प्रेरणासे दुर्वासा आदि महात्माओंके द्वारा वृष्णिवंशी शापित हुए थे॥ ३३॥ |
| राघवः सानुजश्चापि दुर्वासेन महात्मना।<br>श्रीवत्सश्च मुनेः पादपतनात्तस्य धीमतः॥ ३४ | महान् आत्मावाले दुर्वासामुनिने लक्ष्मणसहित श्रीरामको शाप दे दिया और श्रीवत्स (श्रीयुक्त वक्षःस्थलवाले) विष्णुको भृगुमुनिका चरण-प्रहार सहना पड़ा॥ ३४॥ |
| एते चान्ये च बहवो विप्राणां वशमागताः।<br>वर्जयित्वा विरूपाक्षं देवदेवमुमापतिम्॥ ३५ | देवाधिदेव विरूपाक्ष उमापति शिवको छोड़कर ये तथा अन्य बहुत-से लोग भी विप्रों (ब्राह्मणों)-के वशवर्ती हुए हैं॥ ३५॥ |
| एवं हि मोहितास्तेन नावबुध्यन्त शङ्करम्।<br>अत्युग्रवचनं प्रोचुश्चोग्रोऽप्यन्तरधीयत॥ ३६ | उन्हीं शिवकी मायासे मोहित होनेके कारण वे मुनिगण शंकरको नहीं जान पाये और अत्यन्त कठोर वचन बोलने लगे, फिर भगवान् शिव भी अन्तर्धान हो गये॥ ३६॥ |
| तेऽपि दारुवनात्तस्मात्प्रातः संविग्नमानसाः।<br>पितामहं महात्मानमासीनं परमासने॥ ३७<br>गत्वा विज्ञापयामासुः प्रवृत्तमखिलं विभोः।<br>शुभे दारुवने तस्मिन् मुनयः क्षीणचेतसः॥ ३८ | तत्पश्चात् व्याकुल चित्तवाले वे मुनिगण प्रातःकाल होते ही उस दारुवनसे ब्रह्माजीके पास पहुँचे। वहाँ श्रेष्ठ आसनपर विराजमान महात्मा ब्रह्मासे उस सुन्दर दारुवनमें रहनेवाले क्षीण चेतनावाले मुनियोंने शंकरका सारा वृत्तान्त कह सुनाया॥ ३७-३८॥ |