श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| १३८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सोऽपि सञ्चिन्त्य मनसा क्षणादेव पितामहः।<br>तेषां प्रवृत्तमखिलं पुण्ये दारुवने पुरा॥ ३९ | उन ब्रह्माजीने भी क्षणभरमें ही मनमें सोचकर पवित्र दारुवनमें उनका पूर्वघटित सम्पूर्ण वृत्तान्त जान लिया॥ ३९॥ |
| उत्थाय प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रणिपत्य भवाय च।<br>उवाच सत्वरं ब्रह्मा मुनीन् दारुवनालयान्॥ ४० | अपने आसनसे तत्काल उठकर और दोनों हाथ जोड़कर ब्रह्माजीने मन-ही-मन शिवजीको प्रणाम करके दारुवनमें रहनेवाले उन मुनियोंसे कहा—हे विप्रो! |
| धिग्युष्मान् प्राप्तनिधनान् महानिधिमनुत्तमम्।<br>वृथाकृतं यतो विप्रा युष्माभिर्भाग्यवर्जितैः॥ ४१ | विनाशको प्राप्त तुम सभीको धिक्कार है; क्योंकि सर्वोत्तम निधि प्राप्त करके भी तुम अभागोंने उसे गँवा दिया॥ ४०-४१॥ |
| यस्तु दारुवने तस्मिंल्लिङ्गी दृष्टोऽप्यलिङ्गिभिः।<br>युष्माभिर्विकृताकारः स एव परमेश्वरः॥ ४२ | तुम अलिंगियोंने उस दारुवनमें जिस विकृत आकारवाले पुरुषको देखा था; वे साक्षात् परमेश्वर शिव ही थे॥ ४२॥ |
| गृहस्थैश्च न निन्द्यास्तु सदा ह्यतिथयो द्विजाः।<br>विरूपाश्च सुरूपाश्च मलिनाश्चाप्यपण्डिताः॥ ४३ | हे विप्रो! गृहस्थोंको अतिथियोंकी निन्दा कभी नहीं करनी चाहिये; वे अतिथि विकृत रूपवाले, सुन्दर रूपवाले, मलिन तथा मूर्ख—चाहे जैसे भी हों॥ ४३॥ |
| सुदर्शनेन मुनिना कालमृत्युरपि स्वयम्।<br>पुरा भूमौ द्विजाग्र्येण जितो ह्यतिथिपूजया॥ ४४ | पूर्वकालमें पृथ्वीपर द्विजोंमें अग्रणी सुदर्शनमुनिने अतिथिपूजाके प्रभावसे साक्षात् कालमृत्युको भी जीत लिया था॥ ४४॥ |
| अन्यथा नास्ति सन्तर्तुं गृहस्थैश्च द्विजोत्तमैः।<br>त्यक्त्वा चातिथिपूजां तामात्मनो भुवि शोधनम्॥ ४५ | भवसागरसे पार होने तथा आत्मशुद्धिके लिये अतिथिपूजाको छोड़कर गृहस्थों एवं श्रेष्ठ द्विजोंके लिये लोकमें अन्य कोई भी उपाय नहीं है॥ ४५॥ |
| गृहस्थोऽपि पुरा जेतुं सुदर्शन इति श्रुतः।<br>प्रतिज्ञामकरोज्जायां भार्यामाह पतिव्रताम्॥ ४६ | पूर्वकालमें सुदर्शन नामसे विख्यात गृहस्थ मुनिने मृत्युपर विजय प्राप्त करनेकी प्रतिज्ञा की और अपनी संतानयुक्त पतिव्रता पत्नीसे कहा—हे सुव्रते! हे |
| सुव्रते सुभ्रु सुभगे शृणु सर्वं प्रयत्नतः।<br>त्वया वै नावमन्तव्या गृहे ह्यतिथयः सदा॥ ४७ | सुन्दर भौंहोंवाली! हे सौभाग्यवति! सुनो, तुम पूर्ण प्रयत्नके साथ अतिथियोंका सदा सत्कार करना और कभी भी उनका निरादर न करना॥ ४६-४७॥ |
| सर्व एव स्वयं साक्षादतिथिय॑त्पिनाकधृक्।<br>तस्मादतिथये दत्त्वा आत्मानमपि पूजय॥ ४८ | अतिथि साक्षात् पिनाकधारी शिवका ही स्वरूप होता है, अतएव सब कुछ अर्पित करके भी अतिथिकी पूजा करो। सुदर्शनने पुनः कहा—हे आर्ये! अतिथि साक्षात् शिव होता है; शिवस्वरूप अतिथिको सब कुछ प्रदान करना चाहिये। अतः सभी अतिथियोंकी सदा पूजा करनी चाहिये॥ ४८-५०१/२॥ |
| एवमुक्तवाथ सन्तप्ता विवशा सा पतिव्रता।<br>पतिमाह रुदन्ती च किमुक्तं भवता प्रभो॥ ४९ | |
| तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा पुनः प्राह सुदर्शनः।<br>देयं सर्वं शिवायायें शिव एवातिथिः स्वयम्॥ ५० | |
| तस्मात्सर्वे पूजनीयाः सर्वेऽप्यतिथयः सदा।<br>एवमुक्ता तदा भर्त्रा भार्या तस्य पतिव्रता॥ ५१ | |
| शेषामिवाज्ञामादाय मूर्ध्ना सा प्राचरत्तदा।<br>परीक्षितुं तथा श्रद्धां तयोः साक्षाद् द्विजोत्तमाः॥ ५२ | पतिके ऐसा कहनेपर वह पातिव्रतपरायण मुनिभार्या पतिकी आज्ञाको देवप्रतिमाके समक्ष अर्पित किये गये |