श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| १३८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सोऽपि सञ्चिन्त्य मनसा क्षणादेव पितामहः।<br>तेषां प्रवृत्तमखिलं पुण्ये दारुवने पुरा॥ ३९ | उन ब्रह्माजीने भी क्षणभरमें ही मनमें सोचकर पवित्र दारुवनमें उनका पूर्वघटित सम्पूर्ण वृत्तान्त जान लिया॥ ३९॥ |
| उत्थाय प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रणिपत्य भवाय च।<br>उवाच सत्वरं ब्रह्मा मुनीन् दारुवनालयान्॥ ४० | अपने आसनसे तत्काल उठकर और दोनों हाथ जोड़कर ब्रह्माजीने मन-ही-मन शिवजीको प्रणाम करके दारुवनमें रहनेवाले उन मुनियोंसे कहा—हे विप्रो! |
| धिग्युष्मान् प्राप्तनिधनान् महानिधिमनुत्तमम्।<br>वृथाकृतं यतो विप्रा युष्माभिर्भाग्यवर्जितैः॥ ४१ | विनाशको प्राप्त तुम सभीको धिक्कार है; क्योंकि सर्वोत्तम निधि प्राप्त करके भी तुम अभागोंने उसे गँवा दिया॥ ४०-४१॥ |
| यस्तु दारुवने तस्मिंल्लिङ्गी दृष्टोऽप्यलिङ्गिभिः।<br>युष्माभिर्विकृताकारः स एव परमेश्वरः॥ ४२ | तुम अलिंगियोंने उस दारुवनमें जिस विकृत आकारवाले पुरुषको देखा था; वे साक्षात् परमेश्वर शिव ही थे॥ ४२॥ |
| गृहस्थैश्च न निन्द्यास्तु सदा ह्यतिथयो द्विजाः।<br>विरूपाश्च सुरूपाश्च मलिनाश्चाप्यपण्डिताः॥ ४३ | हे विप्रो! गृहस्थोंको अतिथियोंकी निन्दा कभी नहीं करनी चाहिये; वे अतिथि विकृत रूपवाले, सुन्दर रूपवाले, मलिन तथा मूर्ख—चाहे जैसे भी हों॥ ४३॥ |
| सुदर्शनेन मुनिना कालमृत्युरपि स्वयम्।<br>पुरा भूमौ द्विजाग्र्येण जितो ह्यतिथिपूजया॥ ४४ | पूर्वकालमें पृथ्वीपर द्विजोंमें अग्रणी सुदर्शनमुनिने अतिथिपूजाके प्रभावसे साक्षात् कालमृत्युको भी जीत लिया था॥ ४४॥ |
| अन्यथा नास्ति सन्तर्तुं गृहस्थैश्च द्विजोत्तमैः।<br>त्यक्त्वा चातिथिपूजां तामात्मनो भुवि शोधनम्॥ ४५ | भवसागरसे पार होने तथा आत्मशुद्धिके लिये अतिथिपूजाको छोड़कर गृहस्थों एवं श्रेष्ठ द्विजोंके लिये लोकमें अन्य कोई भी उपाय नहीं है॥ ४५॥ |
| गृहस्थोऽपि पुरा जेतुं सुदर्शन इति श्रुतः।<br>प्रतिज्ञामकरोज्जायां भार्यामाह पतिव्रताम्॥ ४६ | पूर्वकालमें सुदर्शन नामसे विख्यात गृहस्थ मुनिने मृत्युपर विजय प्राप्त करनेकी प्रतिज्ञा की और अपनी संतानयुक्त पतिव्रता पत्नीसे कहा—हे सुव्रते! हे |
| सुव्रते सुभ्रु सुभगे शृणु सर्वं प्रयत्नतः।<br>त्वया वै नावमन्तव्या गृहे ह्यतिथयः सदा॥ ४७ | सुन्दर भौंहोंवाली! हे सौभाग्यवति! सुनो, तुम पूर्ण प्रयत्नके साथ अतिथियोंका सदा सत्कार करना और कभी भी उनका निरादर न करना॥ ४६-४७॥ |
| सर्व एव स्वयं साक्षादतिथिय॑त्पिनाकधृक्।<br>तस्मादतिथये दत्त्वा आत्मानमपि पूजय॥ ४८ | अतिथि साक्षात् पिनाकधारी शिवका ही स्वरूप होता है, अतएव सब कुछ अर्पित करके भी अतिथिकी पूजा करो। सुदर्शनने पुनः कहा—हे आर्ये! अतिथि साक्षात् शिव होता है; शिवस्वरूप अतिथिको सब कुछ प्रदान करना चाहिये। अतः सभी अतिथियोंकी सदा पूजा करनी चाहिये॥ ४८-५०१/२॥ |
| एवमुक्तवाथ सन्तप्ता विवशा सा पतिव्रता।<br>पतिमाह रुदन्ती च किमुक्तं भवता प्रभो॥ ४९ | |
| तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा पुनः प्राह सुदर्शनः।<br>देयं सर्वं शिवायायें शिव एवातिथिः स्वयम्॥ ५० | |
| तस्मात्सर्वे पूजनीयाः सर्वेऽप्यतिथयः सदा।<br>एवमुक्ता तदा भर्त्रा भार्या तस्य पतिव्रता॥ ५१ | |
| शेषामिवाज्ञामादाय मूर्ध्ना सा प्राचरत्तदा।<br>परीक्षितुं तथा श्रद्धां तयोः साक्षाद् द्विजोत्तमाः॥ ५२ | पतिके ऐसा कहनेपर वह पातिव्रतपरायण मुनिभार्या पतिकी आज्ञाको देवप्रतिमाके समक्ष अर्पित किये गये |
| अध्याय २९ ] | देवदारुवनका वृत्तान्त... संन्यासधर्मका वर्णन | १३९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुष्प आदिकी भाँति शिरोधार्य करके अतिथि-सत्कारमें प्रवृत्त हो गयी॥ ५१ १/२॥ | |
| धर्मो द्विजोत्तमो भूत्वा जगामाथ मुनेर्गृहम्।<br>तं दृष्ट्वा चार्चयामास सार्घाद्यैरनघा द्विजम्॥ ५३ | हे श्रेष्ठ द्विजो! उन दोनोंकी श्रद्धाकी परीक्षा करनेके लिये एक सुन्दर ब्राह्मणका रूप धारण करके साक्षात् धर्म मुनिके घर पधारे। उस ब्राह्मणको देखकर विशुद्ध हृदयवाली उस मुनिभार्याने अर्घ्य आदिसे उस ब्राह्मणका पूजन किया॥ ५२-५३॥ |
| सम्पूजितस्तया तां तु प्राह धर्मो द्विजः स्वयम्।<br>भद्रे कुतः पतिर्धीमांस्तव भर्ता सुदर्शनः॥ ५४<br>अन्नाद्यैरलमद्यार्यै स्वं दातुमिह चार्हसि।<br>सा च लज्जावृता नारी स्मरन्ती कथितं पुरा॥ ५५<br>भर्त्रा नमील्यनयने चचाल च पतिव्रता।<br>किं चैत्याह पुनस्तं वै धर्मे चक्रे च सा मतिम्॥ ५६ | उस स्त्रीके द्वारा भलीभाँति पूजित होकर ब्राह्मण-वेषधारी साक्षात् धर्मने उससे कहा—हे कल्याणि! तुम्हारे बुद्धिसम्पन्न पति सुदर्शन कहाँ हैं? तत्पश्चात् अपने पतिद्वारा कही गयी बातका स्मरण करती हुई उस स्त्रीने पतिकी आज्ञाको ध्यानमें रखकर धर्मरूप उस ब्राह्मणके लिये आतिथ्य-सेवा करनेका मनमें निश्चय किया॥ ५४-५६ १/२॥ |
| निवेदितुं किलात्मानं तस्मै पत्युरिहाज्ञया।<br>एतस्मिन्नन्तरे भर्ता तस्या नार्याः सुदर्शनः॥ ५७<br>गृहद्वारं गतो धीमांस्तामुवाच महामुनिः।<br>एहोहि क्व गता भद्रे तमुवाचातिथिः स्वयम्॥ ५८<br>भार्यया त्वनया सार्धं मैथुनस्थोऽहमद्य वै।<br>सुदर्शन महाभाग किंकर्तव्यमिहोच्यताम्॥ ५९<br>सुरतान्तस्तु विप्रेन्द्र सन्तुष्टोऽहं द्विजोत्तम।<br>सुदर्शनस्ततः प्राह सुप्रहृष्टो द्विजोत्तमः॥ ६० | इसी बीच उस स्त्रीके पति प्रज्ञासम्पन्न सुदर्शन घरके द्वारपर आ गये। मुनिवर सुदर्शनने अपनी भार्याको आवाज दी—हे भद्रे! तुम कहाँ चली गयी हो? तब साक्षात् धर्मरूप अतिथि उनसे बोले—हे महाभाग सुदर्शन! मैं इस समय तुम्हारी इस भार्याके आतिथ्यसे परम सन्तुष्ट हूँ॥ ५७-६० १/२॥ |
| भुङ्क्ष्व चैनां यथाकामं गमिष्येऽहं द्विजोत्तम।<br>हृष्टोऽथ दर्शयामास स्वात्मानं धर्मराट् स्वयम्॥ ६१<br>प्रददौ चेप्सितं सर्वं तमाह च महाद्युतिः।<br>एषा न भुक्ता विप्रेन्द्र मनसापि सुशोभना॥ ६२<br>मया चैषा न सन्देहः श्रद्धां ज्ञातुमिहागतः।<br>जितो वै यस्त्वया मृत्युर्धर्मेणैकेन सुव्रत॥ ६३ | तदनन्तर धर्मराजने अपना वास्तविक रूप उन्हें दिखाया और मनोवांछित वर देकर महान् कान्तिवाले धर्मने उनसे कहा—हे विप्रेन्द्र! मैं यहाँ केवल तुम्हारी श्रद्धाकी परीक्षा करनेके निमित्त आया हूँ। हे सुव्रत! तुमने अपने एकमात्र अतिथिपूजारूप धर्मसे मृत्यूतकको जीत लिया है॥ ६१-६३॥ |
| अहोऽस्य तपसो वीर्यमित्युक्त्वा प्रययौ च सः।<br>तस्मात्तथा पूजनीयाः सर्वे ह्यतिथयः सदा॥ ६४<br>बहुनात्र किमुक्तेन भाग्यहीना द्विजोत्तमाः।<br>तमेव शरणं तूर्णं गन्तुमर्हथ शङ्करम्॥ ६५ | 'अहो, इस तपस्वीका ऐसा ओज'—इस प्रकार कहकर धर्म वहाँसे चले गये। [हे मुनियो!] इसलिये सभी अतिथियोंकी सदा पूजा करनी चाहिये। हे अभागे मुनीश्वरो! अब अधिक कहनेसे क्या लाभ? तुम लोग शीघ्र ही उन्हीं महादेवकी शरणमें जाओ॥ ६४-६५॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणो ब्राह्मणर्षभाः।<br>ब्रह्माणमभिवन्द्यार्ताः प्रोचुराकुलितेक्षणाः॥ ६६ | उन ब्रह्माजीका वह वचन सुनकर व्याकुल नेत्रोंवाले वे द्विजश्रेष्ठ दुःखित होकर ब्रह्माजीसे प्रार्थना करते हुए कहने लगे॥ ६६॥ |
| ब्राह्मणा ऊचुः<br>नापेक्षितं महाभाग जीवितं विकृताः स्त्रियः।<br>दृष्टोऽस्माभिर्महादेवो निन्दितो यस्त्वनिन्दितः॥ ६७ | विप्रगण बोले—हे महाभाग! स्त्रियाँ तो विकार-युक्त होती ही हैं, जिनके लिये हमलोगोंने अपना जीवन |
१४० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग ]
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| नष्ट कर डाला। जिन अनिन्द्य महादेवने कृपा करके हमलोगोंको दर्शन दिया था, उन्हींका हमलोगोंने अनादर किया ॥ ६७ ॥ | |
| शप्तश्च सर्वगः शूली पिनाकी नीललोहितः।<br>अज्ञानाच्छापजा शक्तिः कुण्ठितास्य निरीक्षणात् ॥ ६८ | हमने उन सर्वव्यापी, शूलधारी, पिनाकी तथा नीललोहित वर्णवाले शिवजीको अज्ञानतासे शाप दे दिया; किंतु उनके देखनेमात्रसे हमारे शापकी शक्ति कुण्ठित हो गयी ॥ ६८ ॥ |
| वक्तुमर्हसि देवेश संन्यासं वै क्रमेण तु।<br>द्रष्टुं वै देवदेवेशमुग्रं भीमं कपर्दिनम् ॥ ६९ | हे देवेश! अब आप कृपा करके हमें संन्यास-धर्मके विषयमें क्रमसे बताइये; जिससे हमलोग उन देवाधिदेव, उग्र, भीम तथा कपर्दी शिवका दर्शन करनेमें समर्थ हो सकें ॥ ६९ ॥ |
| पितामह उवाच<br>आदौ वेदानधीत्यैव श्रद्धया च गुरोः सदा।<br>विचार्यार्थं मुनेर्धर्मान् प्रतिज्ञाय द्विजोत्तमाः ॥ ७० | पितामह बोले—हे श्रेष्ठ मुनियो! सर्वप्रथम श्रद्धापूर्वक गुरुसे निरन्तर वेदका अध्ययन करे, उसका अर्थ समझे और धर्मोंका ज्ञान करे ॥ ७० ॥ |
| ग्रहणान्तं हि वा विद्वानथ द्वादशवार्षिकम्।<br>स्नात्वाहृत्य च दारान् वै पुत्रानुत्पाद्य सुव्रतान् ॥ ७१<br><br>वृत्तिभिश्चानुरूपाभिस्तान् विभज्य सुतान् मुनिः।<br>अग्निष्टोमादिभिश्चेष्ट्वा यज्ञैर्यज्ञेश्वरं विभुम् ॥ ७२ | इस प्रकार विद्वान्को चाहिये कि बारह वर्षोतक वेदाध्ययन करनेके अनन्तर वेदव्रत नामक स्नानसे संस्कारित होकर विवाह करके पुनः सदाचारी पुत्र उत्पन्न करके उन पुत्रोंके अनुकूल वृत्तिका उपाय करके उनमें धनादिका विभाजन कर दे। तत्पश्चात् अग्निष्टोम आदि यज्ञोंसे यज्ञेश्वर विभुका यजन करके मुनिको वनमें आकर अग्निमें परमेश्वरकी पूजा करनी चाहिये ॥ ७१-७२ १/२ ॥ |
| पूजयेत्परमात्मानं प्राप्यारण्यं विभावसौ।<br>मुनिर्द्वादशवर्षं वा वर्षमात्रमथापि वा ॥ ७३<br><br>पक्षद्वादशकं वापि दिनद्वादशकं तु वा।<br>क्षीरभुक् संयतः शान्तः सर्वान् सम्पूजयेत्सुरान् ॥ ७४ | वनमें रहते हुए मुनिको बारह वर्षतक या एक वर्ष (बारह माह)-तक या बारह पक्ष (छः माह)-तक अथवा बारह दिनतक दुग्धका सेवन करते हुए शान्ति तथा संयमपूर्वक सभी देवताओंकी पूजा करनी चाहिये ॥ ७३-७४ ॥ |
| इष्ट्वैवं जुहुयादग्नौ यज्ञपात्राणि मन्त्रतः।<br>अप्सु वै पार्थिवं न्यस्य गुरवे तैजसानि तु ॥ ७५<br><br>स्वधनं सकलं चैव ब्राह्मणेभ्यो विशङ्कया।<br>प्रणिपत्य गुरुं भूमौ विरक्तः संन्यसेद्यतिः ॥ ७६ | इस प्रकार यजन-पूजनके अनन्तर यज्ञसम्बन्धी काष्ठपात्र मन्त्रपूर्वक अग्निमें हवन कर दे, मिट्टीके पात्र जलमें छोड़ दे तथा धातुके पात्र गुरुको अर्पित कर दे और निष्कपट भावसे अपना सम्पूर्ण धन ब्राह्मणोंको देकर गुरुको दण्डवत् प्रणाम करके विरक्त यति संन्यासधर्मका आचरण करे ॥ ७५-७६ ॥ |
| निकृत्य केशान् सशिखानुपवीतं विसृज्य च।<br>पञ्चभिर्जुहुयादप्सु भूः स्वाहेति विचक्षणः ॥ ७७ | शिखासहित बालोंको कटवाकर तथा यज्ञोपवीत त्यागकर विद्वान् यतिको 'भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे जलमें |
३०- शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान
अध्याय ३० ] शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान १४१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततश्चोर्ध्वं चरेदेवं यतिः शिवविमुक्तये।<br>व्रतेनानशनेनापि तोयवृत्त्यापि वा पुनः॥ ७८<br><br>पर्णवृत्त्या पयोवृत्त्या फलवृत्त्यापि वा यतिः।<br>एवं जीवनमृतो नो चेत्षण्मासाद्द्वत्सरात्तु वा॥ ७९<br><br>प्रस्थानादिकमायासं स्वदेहस्य चरेद्यतिः।<br>शिवसायुज्यमाप्नोति कर्मणाप्येवमाचरन्॥ ८०<br><br>सद्योऽपि लभते मुक्तिं भक्तियुक्तो दृढव्रतः॥ ८१<br><br>त्यागेन वा किं विधिनाप्यनेन<br>भक्तस्य रुद्रस्य शुभैर्व्रतैश्च।<br>यज्ञैश्च दानैर्विविधैश्च होमै-<br>र्लब्धैश्च शास्त्रैर्विविधैश्च वेदैः॥ ८२<br><br>श्वेतेनैवं जितो मृत्युर्भवभक्त्या महात्मना।<br>वोऽस्तु भक्तिर्महादेवे शङ्करे परमात्मनि॥ ८३ | पाँच आहुति देनी चाहिये॥ ७७॥<br><br>इसके पश्चात् यतिको शिवसायुज्यरूपी विमुक्तिके लिये आगेकी भी साधना करनी चाहिये। इसके लिये छः माह अथवा वर्षपर्यन्त यति अनशन करे अथवा जल पीकर या पत्ते खाकर या दूध पीकर या फल खाकर जीवन-निर्वाह करे। ऐसा करनेपर यदि मृत्यु नहीं हुई और वह जीवित रहता है, तो उसे अपने देहके प्रस्थान आदि अर्थात् स्थूल शरीरके त्यागका प्रयास करना चाहिये। ऐसा आचरण करते हुए वह यति अपने कर्मसे भी शिवसायुज्य प्राप्त कर लेता है॥ ७८–८०॥<br><br>परंतु हे दृढव्रती मुनियो! शिवजीमें भक्ति रखनेवाला प्राणी शीघ्र ही मुक्ति प्राप्त कर लेता है। महादेवजीके भक्तको त्याग, विधि, महान् व्रतों, यज्ञों, विविध प्रकारके दानों, होमों, विविध शास्त्रों तथा वेदोंसे क्या प्रयोजन! महान् आत्मावाले श्वेतमुनिने महादेवकी भक्तिसे ही मृत्यूतकको जीत लिया था। अतएव परमेश्वर महादेव शिवजीके प्रति आपलोग भी भक्तिपरायण हों॥ ८१–८३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवदारुवनवृत्तान्तवर्णनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'देवदारुवनवृत्तान्तवर्णन' नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २९ ॥
तीसवाँ अध्याय
शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शैलादिरुवाच<br>एवमुक्तास्तदा तेन ब्रह्मणा ब्राह्मणर्षभाः।<br>श्वेतस्य च कथां पुण्यामपृच्छन् परमर्षयः॥ १<br><br>पितामह उवाच<br>श्वेतो नाम मुनिः श्रीमान् गतायुर्गिरिगह्वरे।<br>सक्तो ह्याभ्यर्च्य यद्भक्त्या तुष्टाव च महेश्वरम्॥ २<br>रुद्राध्यायेन पुण्येन नमस्तेत्यादिना द्विजाः।<br>ततः कालो महातेजाः कालप्राप्तं द्विजोत्तमम्॥ ३<br>नेतुं सञ्चिन्त्य विप्रेन्द्राः सान्निध्यमकरोन्मुनेः।<br>श्वेतोऽपि दृष्ट्वा तं कालं कालप्राप्तोऽपि शङ्करम्॥ ४ | नन्दिकेश्वर बोले— तत्पश्चात् उन ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर द्विजश्रेष्ठ महर्षियोंने उनसे श्वेतमुनिकी पुण्यप्रद कथा पूछी—॥ १॥<br><br>पितामह बोले— समाप्त आयुवाले श्वेत नामक एक श्रीयुक्त मुनि गिरिकी गुफामें शिवाराधनमें रत थे। हे द्विजो! 'नमस्ते रुद्र मन्यवे' इत्यादि रुद्राध्यायसे भक्तिपूर्वक महेश्वरकी आराधना करके श्वेतमुनिने उन्हें प्रसन्न कर लिया॥ २ ½ ॥<br><br>हे विप्रेन्द्रो! तदनन्तर द्विजोंमें श्रेष्ठ श्वेतमुनिको समाप्त आयुवाला जानकर उन्हें ले जानेके लिये महातेजस्वी काल मुनिके पास पहुँचा॥ ३ ½ ॥ |
| १४२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पूजयामास पुण्यात्मा त्रियम्बकमनुस्मरन्।<br>त्रियम्बकं यजेदेवं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्॥ ५<br><br>किं करिष्यति मे मृत्युर्मृत्योर्मृत्युरहं यतः।<br>तं दृष्ट्वा सस्मितं प्राह श्वेतं लोकभयङ्करः॥ ६ | सन्निकट मृत्युवाले पुण्यात्मा श्वेतमुनि भी उस कालको देखकर त्रिनेत्र शिवका स्मरण करते हुए उनकी आराधना करने लगे। वे ऐसा कहते हुए ध्यानपरायण थे कि जब मैं सुखकर सम्बन्धवाले तथा जगत्का पोषण करनेवाले त्रिनेत्र शिवका यजन कर रहा हूँ, तो मृत्यु मेरा क्या कर लेगी; क्योंकि मैं तो कालका भी काल हूँ॥ ४-५ १/२ ॥ |
| एह्येहि श्वेत चानेन विधिना किं फलं तव।<br>रुद्रो वा भगवान् विष्णुर्ब्रह्मा वा जगदीश्वरः॥ ७<br><br>कः समर्थः परित्रातुं मया ग्रस्तं द्विजोत्तम।<br>अनेन मम किं विप्र रौद्रेण विधिना प्रभोः॥ ८<br><br>नेतुं यस्योत्थितश्चाहं यमलोकं क्षणेन वै।<br>यस्माद् गतायुस्त्वं तस्मान्मुने नेतुमिहोद्यतः॥ ९ | उन श्वेतमुनिको देखकर लोकोंको भयभीत करनेवाला वह काल मुसकराकर उनसे बोला—हे श्वेत! अब तुम मेरी ओर आओ; इस पूजा-पाठ आदिसे तुम्हें क्या लाभ! हे द्विजवर! भगवान् विष्णु, ब्रह्मा अथवा जगदीश्वर रुद्र—इनमें भला कौन मेरे द्वारा ग्रास बनाये गये जीवको बचा सकनेमें समर्थ है? हे विप्र! यह रुद्रपूजा मुझ शक्तिमान्का क्या कर सकती है? जिस किसीको भी ले जानेके लिये मैं उठ खड़ा होता हूँ, उसे क्षणभरमें यमलोक पहुँचा देता हूँ। हे मुने! क्योंकि तुम समाप्त आयुवाले हो चुके हो, अतः तुम्हें ले जानेहेतु मैं यहाँ आया हूँ॥ ६—९॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भैरवं धर्ममिश्रितम्।<br>हा रुद्र रुद्र रुद्रेति ललाप मुनिपुङ्गवः॥ १०<br><br>तं प्राह च महादेवं कालं सम्प्रेक्ष्य वै दृशा।<br>नेत्रेण बाष्पमिश्रेण सम्भ्रान्तेन समाकुलः॥ ११ | उस कालका वह धर्ममिश्रित भयावह वचन सुनकर मुनिवर श्वेत 'हा रुद्र! हा रुद्र! हा रुद्र!' कहकर विलाप करने लगे और अश्रुपूरित तथा व्याकुल नेत्रोंसे एवं कातर दृष्टिसे शिवलिङ्गको निहारते हुए अत्यन्त व्यग्रचित्त होकर उस कालसे कहने लगे—॥ १०-११॥ |
| श्वेत उवाच<br>त्वया किं काल नो नाथश्चास्ति चेद्दि वृषध्वजः।<br>लिङ्गेऽस्मिन् शङ्करो रुद्रः सर्वदेवभवोद्भवः॥ १२ | श्वेतमुनि बोले—हे काल! तुम मेरा क्या बिगाड़ सकते हो; क्योंकि सभी देवताओंको उत्पन्न करनेवाले हमारे स्वामी वृषभध्वज शंकर रुद्र इस लिङ्गमें विराजमान हैं॥ १२॥ |
| अतीव भवभक्तानां मद्विधानां महात्मनाम्।<br>विधिना किं महाबाहो गच्छ गच्छ यथागतम्॥ १३ | विधिके विधान शिवजीके प्रति अतिशय भक्ति रखनेवाले मुझसदृश महात्माओंका क्या कर सकता है? अतएव हे महाबाहो! आप जिस प्रकार आये थे, उसी प्रकार चले जाइये॥ १३॥ |
| ततो निशम्य कुपितस्तीक्ष्णदंष्ट्रो भयङ्करः।<br>श्रुत्वा श्वेतस्य तद्वाक्यं पाशहस्तो भयावहः॥ १४<br><br>सिंहनादं महत्कृत्वा चास्फोट्य च मुहुर्मुहुः।<br>बबन्ध च मुनिं कालः कालप्राप्तं तमाह च॥ १५ | तदनन्तर श्वेतमुनिका वैसा वचन सुनकर हाथमें पाश धारण किये, तीक्ष्ण दाढ़ोंवाले भयंकर कालने कुपित होकर सिंहके सदृश घोर गर्जना करते हुए तथा |
| अध्याय ३० ] | शिवाराधनाके माहात्म्यमें श्वेतमुनिका आख्यान | १४३ |
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| मया बद्धोऽसि विप्रर्षे श्वेतं नेतुं यमालयम्।<br>अद्य वै देवदेवेन तव रुद्रेण किं कृतम्॥ १६<br><br>क्व शर्वस्तव भक्तिश्च क्व पूजा पूजया फलम्।<br>क्व चाहं क्व च मे भीतिः श्वेत बद्धोऽसि वै मया॥ १७<br><br>लिङ्गेऽस्मिन् संस्थितः श्वेत तव रुद्रो महेश्वरः।<br>निश्चेष्टोऽसौ महादेवः कथं पूज्यो महेश्वरः॥ १८ | पाशको बार-बार फटकारते हुए काल-प्राप्त मुनिको बाँध दिया और पुनः उनसे कहा— ॥ १४-१५॥<br>हे विप्रर्षे! तुम श्वेतको यमलोक ले जानेके निमित्त मैंने बाँध दिया है; किंतु तुम्हारे देवाधिदेव रुद्रने इस समय तुम्हारी क्या सहायता की? कहाँ शिव, कहाँ तुम्हारी भक्ति तथा पूजा, कहाँ पूजाका फल और कहाँ मैं एवं मेरा भय! हे श्वेत! अब तुम मेरे द्वारा बाँध दिये गये हो। हे श्वेत! तुम्हारा महेश्वर रुद्र जो इस लिङ्गमें स्थित है, वह महादेव तो निश्चेष्ट है; तो फिर तुम उस महेश्वरकी पूजा क्यों करते हो? ॥ १६-१८॥ | | ततः सदाशिवः स्वयं द्विजं निहन्तुमागतम्।<br>निहन्तुमन्तकं स्मयन् स्मरारि यज्ञहा हरः॥ १९<br><br>त्वरन् विनिर्गतः परः शिवः स्वयं त्रिलोचनः।<br>त्रियम्बकोऽम्बया समं सनन्दिना गणेश्वरैः॥ २० | तत्पश्चात् मुनिका प्राण हरनेके निमित्त आये हुए कालका संहार करनेके लिये कामदेवके शत्रु, दक्ष-यज्ञके विध्वंसक तथा त्रिनेत्र सदाशिव महादेव शंकर अपने नन्दी, गणेश्वरों और पार्वतीसहित मुसकराते हुए शीघ्रतापूर्वक शिवलिङ्गसे साक्षात् प्रकट हुए॥ १९-२०॥ | | ससर्ज जीवितं क्षणाद्द्रवं निरीक्ष्य वै भयात्।<br>पपात चाशु वै बली मुनेस्तु सन्निधौ द्विजाः॥ २१<br><br>ननाद चोर्ध्वमुच्चधीर्निरीक्ष्य चान्तकान्तकम्।<br>निरीक्षणेन वै मृतं भवस्य विप्रपुङ्गवाः॥ २२ | हे द्विजो! शिवजीको देखते ही उसी क्षण भयके कारण वह बलवान् काल श्वेतमुनिके पास शीघ्र ही गिर पड़ा और कालका भी अन्त करनेवाले शिवजीको देखकर जोरसे चिल्लाया। हे उत्तम विप्रो! मृतप्राय उस कालको शिवजीने अपने कृपावलोकनसे जीवन प्रदान कर दिया॥ २१-२२॥ | | विनेदुरुच्चमीश्वराः सुरेश्वरा महेश्वरम्।<br>प्रणेमुरम्बिकामुमां मुनीश्वरास्तु हर्षिताः॥ २३<br><br>ससर्जुरस्य मूर्ध्नि वै मुनेर्भवस्य खेचराः।<br>सुशोभनं सुशीतलं सुपुष्पवर्षमम्बरात्॥ २४ | सभी महान् देवतागण तथा मुनिवृन्द महेश्वर एवं माता पार्वतीको प्रणाम करने लगे और हर्षित होकर उच्च स्वरमें ‘जय हो-जय हो’ ऐसा बोलने लगे। नभोमण्डलमें स्थित देवसमुदाय इन श्वेतमुनि तथा शंकरजीके सिरपर आकाशसे अत्यन्त सुन्दर, शीतल तथा सुगन्धित पुष्पोंकी वर्षा करने लगे॥ २३-२४॥ | | अहो निरीक्ष्य चान्तकं मृतं तदा सुविस्मितः।<br>शिलाशनात्मजोऽव्ययं शिवं प्रणम्य शङ्करम्॥ २५<br><br>उवाच बालधीर्मृतः प्रसीद चेति वै मुने।<br>महेश्वरं महेश्वरस्य चानुगो गणेश्वरः॥ २६ | तत्पश्चात् शिलादके पुत्र तथा शिवजीके अनुचर गणेश्वर नन्दीजी कालको मरा हुआ देखकर अत्यन्त विस्मित हुए और उन्होंने अविनाशी महेश्वर शिवको प्रणामकर उनसे कहा कि यह अल्पबुद्धि काल मर चुका है; अब आप इस काल और मुनि—दोनोंपर अनुग्रह कीजिये॥ २५-२६॥ | | ततो विवेश भगवाननुगृह्य द्विजोत्तमम्।<br>क्षणाद् गूढशरीरं हि ध्वस्तं दृष्ट्वान्तकं क्षणात्॥ २७ | तत्पश्चात् क्षणभरमें ही मृत होकर पृथ्वीपर गिरे कालको देखकर उसके तथा द्विजश्रेष्ठ श्वेत—दोनोंके |
| १४४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| ऊपर अनुग्रह करके भगवान् शंकर तत्काल गुप्त शरीरमें समाविष्ट हो गये॥ २७॥ | |
|---|---|
| तस्मान्मृत्युञ्जयं चैव भक्त्या सम्पूजयेद् द्विजाः।<br>मुक्तिदं भुक्तिदं चैव सर्वेषामपि शङ्करम्॥ २८ | अतएव हे द्विजो! सभीको मोक्ष तथा भोग प्रदान करनेवाले मृत्युंजय महादेवकी भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये॥ २८॥ |
| बहुना किं प्रलापेन संन्यस्याभ्यर्च्य वै भवम्।<br>भक्त्या चापरया तस्मिन् विशोका वै भविष्यथ॥ २९ | [हे मुनियो!] अधिक क्या कहूँ; संन्यासधर्मका पालन करते हुए परम श्रद्धाके साथ उन महादेवकी आराधना करनेसे तुम सब सन्तापरहित हो जाओगे॥ २९॥ |
| शैलादिरुवाच<br>एवमुक्तास्तदा तेन ब्रह्मणा ब्रह्मवादिनः।<br>प्रसीद भक्तिर्देवेशे भवेद्रुद्रे पिनाकिनि॥ ३०<br><br>केन वा तपसा देव यज्ञेनाप्यथ केन वा।<br>व्रतैर्वा भगवद्भक्ता भविष्यन्ति द्विजातयः॥ ३१ | नन्दीश्वर बोले—[हे सनत्कुमारजी!] तत्पश्चात् उन ब्रह्माके इस प्रकार कहनेपर ब्रह्मवेत्ता मुनिगण बोले—हे देव! आप प्रसन्न हों और हमें बतायें कि किस तपस्या, किस यज्ञ अथवा किन व्रतोंसे पिनाकधारी देवेश्वर रुद्रके प्रति हमलोगोंमें भक्ति उत्पन्न होगी तथा हम द्विजगण शिवभक्त हो सकेंगे?॥ ३०-३१॥ |
| पितामह उवाच<br>न दानेन मुनिश्रेष्ठास्तपसा च न विद्यया।<br>यज्ञैर्होमैर्व्रतैर्वेदैर्योगशास्त्रैर्निरोधनैः ॥ ३२<br><br>प्रसादेनैव सा भक्तिः शिवे परमकारणे। | ब्रह्माजी बोले—हे मुनिवरो! दान, तप, विद्या, यज्ञ, होम, व्रत, वेदाध्ययन, शास्त्रपारायण, योगसाधन तथा इन्द्रिय-नियन्त्रण आदि उपायोंसे शिव-भक्ति सम्भव नहीं है। केवल उनकी कृपासे ही जगत्के परम कारण महादेवके प्रति वह भक्ति उत्पन्न होती है॥ ३२ १/२॥ |
| अथ तस्य वचः श्रुत्वा सर्वे ते परमर्षयः॥ ३३<br><br>सदारतनयाः श्रान्ताः प्रणेमुश्च पितामहम्। | इसके बाद उन ब्रह्माका वचन सुनकर परिश्रान्त हुए उन सभी श्रेष्ठ ऋषियोंने स्त्री तथा पुत्रोंसहित ब्रह्माजीको प्रणाम किया॥ ३३ १/२॥ |
| तस्मात्पाशुपती भक्तिर्धर्मकामार्थसिद्धिदा॥ ३४<br><br>मुनेर्विजयदा चैव सर्वमृत्युजयप्रदा।<br>दधीचस्तु पुरा भक्त्या हरिं जित्वामरैर्विभुम्॥ ३५<br><br>क्षुपं जघान पादेन वज्रास्थित्वं च लब्धवान्।<br>मयापि निर्जितो मृत्युर्महादेवस्य कीर्तनात्॥ ३६<br><br>श्वेतेनापि गतेनास्यं मृत्योर्मुनिवरेण तु।<br>महादेवप्रसादेन जितो मृत्युर्यथा मया॥ ३७ | अतएव [हे सनत्कुमार!] यह शैवी भक्ति धर्म, काम, अर्थ तथा सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाली है और सभी प्रकारकी मृत्युसे विजय दिलानेवाली है। यह शिव-भक्ति मुनि दधीचके लिये विजयदायिनी सिद्ध हुई थी। पूर्व कालमें दधीचमुनिने शिवकी भक्तिसे ही देवताओंसहित सर्वशक्तिमान् विष्णुको जीतकर अपने चरणसे राजा क्षुपपर प्रहार किया और अपनी हड्डियोंमें वज्रत्व प्राप्त कर लिया था। महादेवकी आराधनासे मैंने भी मृत्युपर विजय प्राप्त कर ली है और जिस प्रकार मैंने मृत्युको जीता है, उसी प्रकार मृत्युके मुखमें गये हुए मुनिवर श्वेतने भी शिवजीकी कृपासे मृत्युको जीत लिया था॥ ३४—३७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवाराधनमहिमवर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवाराधनमहिमवर्णन' नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३०॥
३१- देवदारुवननिवासी मुनिगणोंद्वारा शिवाराधना
| अध्याय ३१ ] | देवदारुवननिवासी मुनिगणोंद्वारा शिवाराधना | १४५ |
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इकतीसवाँ अध्याय
देवदारुवननिवासी मुनिगणोंद्वारा शिवाराधना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमार उवाच<br>कथं भवप्रसादेन देवदारुवनौकसः।<br>प्रपन्नाः शरणं देवं वक्तुमर्हसि मे प्रभो॥ १ | सनत्कुमार बोले— हे प्रभो! देवदारुवनके निवासी [तपस्वीगण] भगवान् शिवके अनुग्रहसे किस प्रकार उन महादेवके शरणको प्राप्त हुए? कृपा करके मुझे बतायें॥ १॥ |
| शैलादिरुवाच<br>तानुवाच महाभागान् भगवानात्मभूः स्वयम्।<br>देवदारुवनस्थांस्तु तपसा पावकप्रभान्॥ २ | शैलादि बोले— स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माने देवदारुवनमें निवास करनेवाले तथा अपनी तपस्यासे अग्नितुल्य प्रभाववाले उन महाभाग मुनियोंसे कहा॥ २॥ |
| पितामह उवाच<br>एष देवो महादेवो विज्ञेयस्तु महेश्वरः।<br>न तस्मात्परमं किञ्चित्पदं समधिगम्यते॥ ३ | पितामह बोले— इन भगवान् महादेव महेश्वरको अवश्य जानना चाहिये; क्योंकि उनसे बढ़कर कोई भी ऐसा पद नहीं है, जो प्राप्त करनेयोग्य हो॥ ३॥ |
| देवानां च ऋषीणां च पितॄणां चैव स प्रभुः।<br>सहस्रयुगपर्यन्ते प्रलये सर्वदेहिनः॥ ४<br><br>संहरत्येष भगवान् कालो भूत्वा महेश्वरः।<br>एष चैव प्रजाः सर्वाः सृजत्येकः स्वतेजसा॥ ५ | वे ही समस्त देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंके प्रभु हैं। हजार युगोंके अन्तमें प्रलयकाल आनेपर वे ही भगवान् शिव काल बनकर सभी देहधारियोंका संहार करते हैं और एकमात्र ये भगवान् शिव ही अपने तेजसे सभी प्रजाओंका सृजन करते हैं॥ ४-५॥ |
| एष चक्री च वज्री च श्रीवत्सकृतलक्षणः।<br>योगी कृतयुगे चैव त्रेतायां क्रतुरुच्यते॥ ६<br><br>द्वापरे चैव कालाग्निर्धर्मकेतुः कलौ स्मृतः।<br>रुद्रस्य मूर्तयस्त्वेता येऽभिध्यायन्ति पण्डिताः॥ ७ | अपने वक्षःस्थलपर ‘श्री’ चिह्न धारण करनेवाले चक्रधारी विष्णु तथा वज्रधारी इन्द्र आदिके रूपमें ये शिव ही विराजमान हैं। ये सत्ययुगमें योगी, त्रेतामें यज्ञस्वरूप, द्वापरमें कालाग्नि एवं कलियुगमें धर्मकेतु नामसे कहे जाते हैं। भगवान् रुद्रकी ये ही मूर्तियाँ हैं, जिनका पण्डितजन ध्यान करते हैं॥ ६-७॥ |
| चतुरस्रं बहिश्चान्तरष्टास्रं पिण्डिकाश्रये।<br>वृत्तं सुदर्शनं योग्यमेवं लिङ्गं प्रपूजयेत्॥ ८ | बाहरसे चौकोर एवं भीतरसे अष्टकोणवाले पिण्डिका-स्थानमें वृत्ताकार, दर्शनीय तथा श्रेष्ठ लिङ्गकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥ ८॥ |
| तमो ह्यग्नी रजो ब्रह्मा सत्त्वं विष्णुः प्रकाशकम्।<br>मूर्तिरेका स्थिता चास्य मूर्तयः परिकीर्तिताः॥ ९ | तमोगुणरूप अग्नि, रजोगुणरूप ब्रह्मा तथा प्रकाशक सत्त्वगुणरूप विष्णु आदिकी मूर्तियाँ एकमात्र इन्हीं शिवकी मूर्तिमें स्थित कही जाती हैं॥ ९॥ |
| यत्र तिष्ठति तद् ब्रह्म योगेन तु समन्वितम्।<br>तस्माद्विद्ध देवदेवेशमीशानं प्रभुमव्ययम्॥ १०<br><br>आराधयन्ति विप्रेन्द्रा जितक्रोधा जितेन्द्रियाः।<br>लिङ्गं कृत्वा यथान्यायं सर्वलक्षणसंयुतम्॥ ११ | जीवके भीतर समाधियोगसे स्थित जो शिवरूप है, वही ब्रह्म है। अतएव क्रोधको जीत लेनेवाले तथा इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले उत्तम विप्रगण विधानके अनुसार सभी लक्षणोंसे युक्त लिङ्ग बनाकर अविनाशी, देवाधिदेव, ईशान एवं सबके स्वामी शिवकी आराधना करते हैं॥ १०-११॥ |
| १४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अङ्गुष्ठमात्रं सुशुभं सुवृत्तं सर्वसम्मतम्।<br>समनाभं तथाष्टास्रं षोडशास्रमथापि वा॥ १२<br><br>सुवृत्तं मण्डलं दिव्यं सर्वकामफलप्रदम्।<br>वेदिका द्विगुणा तस्य समा वा सर्वसम्मता॥ १३ | वह लिङ्ग अंगुष्ठ परिमाणके बराबर, अत्यन्त सुन्दर, वर्तुलाकार तथा शास्त्रसम्मत हो। उसका मण्डल समान नाभिवाला, अष्ट अथवा षोडश कोणोंवाला पूर्णतः गोलाकार तथा दिव्य होना चाहिये; वह सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला होता है॥ १२१/२॥ |
| गोमुखी च त्रिभागैका वेद्या लक्षणसंयुता।<br>पट्टिका च समन्ताद्वै यवमात्रा द्विजोत्तमाः॥ १४<br><br>सौवर्णं राजतं शैलं कृत्वा ताम्रमयं तथा।<br>वेदिकायाश्च विस्तारं त्रिगुणं वै समन्ततः॥ १५<br><br>वर्तुलं चतुरस्रं वा षडस्रं वा त्रिस्रकम्।<br>समन्तान्निर्व्रणं शुभ्रं लक्षणैस्तत्सुलक्षितम्॥ १६<br><br>प्रतिष्ठाप्य यथान्यायं पूजालक्षणसंयुक्तम्।<br>कलशं स्थापयेत्तस्य वेदिमध्ये तथा द्विजाः॥ १७<br><br>सहिरण्यं सबीजं च ब्रह्मभिश्चाभिमन्त्रितम्।<br>सेचयेच्च ततो लिङ्गं पवित्रैः पञ्चभिः शुभैः॥ १८<br><br>पूजयेच्च यथालाभं ततः सिद्धिमवाप्स्यथ।<br>समाहिताः पूजयध्वं सपुत्रा सह बन्धुभिः॥ १९<br><br>सर्वे प्राञ्जलयो भूत्वा शूलपाणिं प्रपद्यत।<br>ततो द्रक्ष्यथ देवेशं दुर्दर्शमकृतात्मभिः॥ २०<br><br>यं दृष्ट्वा सर्वमज्ञानमधर्मश्च प्रणश्यति।<br>ततः प्रदक्षिणं कृत्वा ब्रह्माणममितौजसम्॥ २१ | लिङ्गकी वेदिका उसकी दुगुनी, समान तथा शास्त्रसम्मत हो। गोमुखीको उसकी एक तिहाई एवं समस्त लक्षणोंसे युक्त जानना चाहिये। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! उसके चारों ओर जौके परिमाणके बराबर पट्टिका होनी चाहिये। वेदिकाका विस्तार चारों ओर तिगुना, वर्तुलाकार, त्रिकोण, चौकोर अथवा षट्कोण होना चाहिये। सोनेका, चाँदीका, ताँबेका अथवा पाषाणका लिङ्ग बनाना चाहिये। हे द्विजो! इस प्रकार सभी ओरसे छिद्र आदिसे रहित, सुन्दर तथा सभी लक्षणोंसे युक्त लिङ्गको विधिपूर्वक प्रतिष्ठित करके उसकी वेदीके मध्यमें पूजालक्षणोंसे समन्वित, स्वर्णसहित, पंचाक्षरमन्त्र एवं सद्योजात आदि पाँच मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित कलशकी स्थापना करनी चाहिये। तत्पश्चात् उन्हीं पाँच शुभ तथा पवित्र मन्त्रोंसे लिङ्गका अभिषेक करना चाहिये एवं यथोपलब्ध उपचारोंसे पूजन करना चाहिये। ऐसा करनेसे तुमलोग सिद्धि प्राप्त कर लोगे। [हे मुनियो!] तुम लोग अपने पुत्रों तथा बन्धु-बान्धवोंसहित एकाग्रचित्त होकर महादेवजीका पूजन करो और हाथ जोड़कर शूलपाणिकी शरणमें जाओ। तत्पश्चात् तुमलोग असंयत आत्मावाले लोगोंके लिये दुर्लभ दर्शनवाले देवेश शिवका दर्शन प्राप्त कर सकोगे; जिन्हें देखते ही समस्त अज्ञान तथा अधर्म नष्ट हो जाता है॥ १३-२०१/२॥ |
| सम्प्रस्थिता वनौकास्ते देवदारुवनं ततः।<br>आराधयितुमारेभा ब्रह्मणा कथितं यथा॥ २२ | तत्पश्चात् अमित तेजवाले ब्रह्माजीकी प्रदक्षिणा करके वे वनवासी मुनि देवदारु वनके लिये प्रस्थित हुए और जैसा ब्रह्माजीने कहा था, तदनुसार वे महादेवकी आराधना करने लगे॥ २१-२२॥ |
| स्थण्डिलेषु विचित्रेषु पर्वतानां गुहासु च।<br>नदीनां च विविक्तेषु पुलिनेषु शुभेषु च॥ २३<br><br>शैवालशोभनाः केचित्केचिद्दन्तर्जलेशयाः।<br>केचिद् दर्भावकाशास्तु पादाङ्गुष्ठाग्रधिष्ठिताः॥ २४ | कुछ मुनि विचित्र प्रकारके स्थण्डिलोंपर, पर्वतोंकी गुफाओंमें, नदियोंके पवित्र तथा एकान्त तटोंपर, कुछ मुनि शैवालपर विराजमान होकर, कुछ मुनि जलके भीतर बैठकर, कोई दर्भ-शय्या बिछाकर, कोई अपने |
अध्याय ३१ ] देवदारुवननिवासी मुनिगणोंद्वारा शिवाराधना १४७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दन्तोलूखलिनस्त्वन्ये अश्मकुट्टास्तथापरे।<br>स्थानवीरासनास्त्वन्ये मृगचर्यारताः परे॥ २५ | पैरके अँगुठेके अग्रभागपर स्थित होकर, कोई दाँतोंको ही उलूखल बनाकर उनसे पिसे अन्नको खाकर, कुछ पाषाणपर पिसे अन्नको ही खाकर, कुछ वीरासनमें बैठकर, कुछ मृगचर्यापरायण होकर—इस प्रकार तपस्या तथा पूजनके द्वारा उन महाबुद्धिमान् मुनियोंने समय व्यतीत किया॥ २३—२५ १/२॥ |
| कालं नयन्ति तपसा पूजया च महाधियः।<br>एवं संवत्सरे पूर्णे वसन्ते समुपस्थिते॥ २६<br><br>ततस्तेषां प्रसादार्थं भक्तानामनुकम्पया।<br>देवः कृतयुगे तस्मिन् गिरौ हिमवतः शुभे॥ २७ | इस प्रकार उन मुनियोंको तप करते हुए एक वर्ष पूर्ण होनेपर वसन्त ऋतु आनेपर परमेश्वर शिव अपनी दयासे उन भक्तोंपर अनुग्रह करनेके निमित्त कृतयुगमें हिमालयके उस पर्वतपर स्थित देवदारुवनमें प्रसन्नतापूर्वक आये॥ २६-२७ १/२॥ |
| देवदारुवनं प्राप्तः प्रसन्नः परमेश्वरः।<br>भस्मपांसूपदिग्धाङ्गो नग्नो विकृतलक्षणः॥ २८<br><br>उल्मुकव्यग्रहस्तश्च रक्तपिङ्गललोचनः।<br>क्वचिच्च हसते रौद्रं क्वचिद् गायति विस्मितः॥ २९<br><br>क्वचिन्नृत्यति शृङ्गारं क्वचिद्रौति मुहुर्मुहुः।<br>आश्रमे ह्यटते भैक्ष्यं याचते च पुनः पुनः॥ ३०<br><br>मायां कृत्वा तथारूपां देवस्तद्वनमागतः। | उस समय वे भस्म-धूलिसे भूषित शरीरवाले, दिगम्बर वेशवाले, विकृत स्वरूपवाले, उल्मुक (जलता हुआ काष्ठ) धारण किये हुए, व्यग्रहस्तवाले तथा रक्त-पिंगल नेत्रोंवाले थे। वे कभी रौद्ररूपमें हँसते थे, कभी विस्मित होकर गाते थे, कभी शृङ्गार-नृत्य करते थे तथा कभी रोते थे—इस रूपमें वे आश्रमोंमें बार-बार भिक्षा माँगते हुए इधर-उधर घूमने-फिरने लगे। इस प्रकारकी माया रचकर महादेवजी उस वनमें आये हुए थे॥ २८—३० १/२॥ |
| ततस्ते मुनयः सर्वे तुष्टुवुश्च समाहिताः॥ ३१<br><br>अद्भिर्विविधमाल्यैश्च धूपैर्गन्धैस्तथैव च।<br>सपत्नीका महाभागाः सपुत्राः सपरिच्छदाः॥ ३२ | तदनन्तर वे सभी महाभाग मुनिगण अपनी स्त्रियों, पुत्रों तथा बन्धु-बान्धवोंसहित शुद्ध जल, विविध पुष्प-मालाओं, धूप, गन्ध आदि उपचारोंसे महादेवजीका एकाग्रचित्त होकर पूजन करके उनकी स्तुति करने लगे॥ ३१-३२॥ |
| मुनयस्ते तथा वाग्भिरीश्वरं चेदमब्रुवन्।<br>अज्ञानाद्देवदेवेश यदस्माभिरनुष्ठितम्॥ ३३ | पुनः वे सभी मुनि मधुर वाणीमें भगवान् शिवसे बोले—हे देवदेवेश! हम लोगोंने मन, वचन तथा कर्मसे जो भी आपके प्रति किया है, वह सब अज्ञानतावश किया है; अतएव आप सभी अपराधोंको क्षमा कीजिये॥ ३३ १/२॥ |
| कर्मणा मनसा वाचा तत्सर्वं क्षन्तुमर्हसि।<br>चरितानि विचित्राणि गुह्यानि गहनानि च॥ ३४ | हे हर! आपके चरित्र अत्यन्त अद्भुत, गूढ़ तथा कठिन हैं। वे चरित्र ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी दुर्ज्ञेय हैं॥ ३४ १/२॥ |
| ब्रह्मादीनां च देवानां दुर्विज्ञेयानि ते हर।<br>अगर्तिं ते न जानीमो गतिं नैव च नैव च॥ ३५ | हम आपकी अगति तथा गति कुछ भी नहीं जानते हैं और जान पाना सम्भव भी नहीं है। हे |
| १४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विश्वेश्वर महादेव योऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते।<br>स्तुवन्ति त्वां महात्मानो देवदेवं महेश्वरम्॥ ३६ | विश्वेश्वर! हे महादेव! आप जो कोई भी हों, आपको नमस्कार है। हम मुनिगण आप देवदेव महेश्वरकी स्तुति करते हैं॥ ३५-३६॥ |
| नमो भवाय भव्याय भावनायोद्भवाय च।<br>अनन्तबलवीर्याय भूतानां पतये नमः॥ ३७ | भव, भव्य, भावन तथा उद्भवको नमस्कार है। अनन्त बल एवं वीर्यवाले और भूतोंके पतिको नमस्कार है॥ ३७॥ |
| संहर्त्रे च पिशङ्गाय अव्ययाय व्ययाय च।<br>गङ्गासलिलधाराय आधाराय गुणात्मने॥ ३८<br><br>त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिशूलवरधारिणे।<br>कन्दर्पाय हुताशाय नमोऽस्तु परमात्मने॥ ३९ | जगत्के संहारकर्ता, पिशंग वर्णवाले, अव्यय, व्यय, गंगाजलकी धारा धारण करनेवाले, जगत्के आधार, गुणात्मा, त्र्यम्बक, त्रिनेत्र, उत्तम त्रिशूल धारण करनेवाले, कन्दर्पस्वरूप तथा अग्निरूप परमात्मा शिवको नमस्कार है॥ ३८-३९॥ |
| शङ्कराय वृषाङ्काय गणानां पतये नमः।<br>दण्डहस्ताय कालाय पाशहस्ताय वै नमः॥ ४० | हाथमें दण्ड तथा पाश धारण करनेवाले, कालरूप, गणोंके पति एवं वृषभध्वज शंकरको नमस्कार है॥ ४०॥ |
| वेदमन्त्रप्रधानाय शतजिह्वाय वै नमः।<br>भूतं भव्यं भविष्यं च स्थावरं जङ्गमं च यत्॥ ४१<br><br>तव देहात्समुत्पन्नं देव सर्वमिदं जगत्।<br>पासि हंसि च भद्रं ते प्रसीद भगवंस्ततः॥ ४२<br><br>अज्ञानाद्यदि विज्ञानाद्यत्किञ्चित्कुरुते नरः।<br>तत्सर्वं भगवानेव कुरुते योगमायया॥ ४३ | वेदमन्त्रोंमें प्रधान रूपसे निरूपित तथा शत जिह्वावाले आप शिवको नमस्कार है। हे देव! भूत, भविष्य तथा वर्तमान जो कुछ भी है एवं स्थावर-जंगममय यह सम्पूर्ण जगत् आपकी ही देहसे उत्पन्न हुआ है। आप ही जगत्का पालन तथा संहार करते हैं। अतएव हे भगवन्! आपका मंगल हो और आप हमपर प्रसन्न हों। ज्ञान अथवा अज्ञानमें मनुष्य जो कुछ भी करता है, वह सब स्वयं आप परमेश्वर ही अपनी योगमायासे सम्पन्न करते हैं॥ ४१-४३॥ |
| एवं स्तुत्वा तु मुनयः प्रहृष्टैरन्तरात्मभिः।<br>याचन्त तपसा युक्ताः पश्यामस्त्वां यथा पुरा॥ ४४ | इस प्रकार तपस्यासे युक्त वे मुनिगण पुलकित अन्तरात्मासे शिवजीका स्तवन करके उनसे याचना करने लगे कि हे भगवन्! हम लोगोंने आपको पहले जिस रूपमें देखा था, उसी रूपमें आपका दर्शन करना चाहते हैं॥ ४४॥ |
| ततो देवः प्रसन्नात्मा स्वमेवास्थाय शङ्करः।<br>रूपं त्र्यक्षं च सन्द्रष्टुं दिव्यं चक्षुरदात्प्रभुः॥ ४५ | तब उनकी स्तुतिसे प्रसन्न मनवाले प्रभु शिवने अपना त्रिनेत्र-रूप दिखानेके लिये उन्हें दिव्य-दृष्टि प्रदान की॥ ४५॥ |
| लब्धदृष्ट्या तया दृष्ट्वा देवदेवं त्रियम्बकम्।<br>पुनस्तुष्टुवुरीशानं देवदारुवनौकसः॥ ४६ | देवदारुवनमें निवास करनेवाले उन मुनियोंने उस प्राप्त दिव्य दृष्टिसे तीन नेत्रवाले देवाधिदेव शिवका दर्शन करके पुनः उनकी स्तुति की॥ ४६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मुनिकृतं शिवस्तोत्रवर्णनं नामैकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मुनिकृतशिवस्तोत्रवर्णन' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३१॥
३२- मुनियोंद्वारा की गयी शिवस्तुति
अध्याय ३२ ] मुनियोंद्वारा की गयी शिवस्तुति १४९
बत्तीसवाँ अध्याय
मुनियोंद्वारा की गयी शिवस्तुति
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| नमो दिग्वाससे नित्यं कृतान्ताय त्रिशूलिने।<br>विकटाय करालाय करालवदनाय च॥ १ | —दिशाओंको वस्त्ररूपमें धारण करनेवाले, शाश्वत, प्रलयके कारण, त्रिशूलधारी, विकट रूपवाले, कराल (संसाररूपी वृक्षके लिये कुठार स्वरूप) तथा भीषण वदनवाले शिवको नमस्कार है॥ १॥ |
| अरूपाय सुरूपाय विश्वरूपाय ते नमः।<br>कटङ्कटाय रुद्राय स्वाहाकाराय वै नमः॥ २ | बिना रूपवाले, सुन्दर रूपवाले, विश्वरूप आपको नमस्कार है। गजाननरूप, स्वाहा करनेवाले यजमानरूप रुद्रको नमस्कार है॥ २॥ |
| सर्वप्रणतदेहाय स्वयं च प्रणतात्मने।<br>नित्यं नीलशिखण्डाय श्रीकण्ठाय नमो नमः॥ ३<br><br>नीलकण्ठाय देवाय चिताभस्माङ्गधारिणे।<br>त्वं ब्रह्मा सर्वदेवानां रुद्राणां नीललोहितः॥ ४ | सभी लोगोंसे नमस्कृत देहवाले, स्वयं विनीत आत्मावाले, निरन्तर नील जटाजूट धारण करनेवाले, अपने शरीरमें चिताकी भस्मको धारण करनेवाले, श्रीकण्ठ, नीलकण्ठ शिवको बार-बार नमस्कार है। हे प्रभो! आप सभी देवताओंमें ब्रह्मा हैं तथा रुद्रोंमें नीललोहित हैं॥ ३-४॥ |
| आत्मा च सर्वभूतानां सांख्यैः पुरुष उच्यते।<br>पर्वतानां महामेरुर्नक्षत्राणां च चन्द्रमाः॥ ५ | आप समस्त भूतोंकी आत्मा हैं। सांख्यविद् आपको पुरुष कहते हैं। आप पर्वतोंमें विशाल मेरु पर्वत तथा नक्षत्रोंमें चन्द्रमा हैं॥ ५॥ |
| ऋषीणां च वसिष्ठस्त्वं देवानां वासवस्तथा।<br>ॐकारः सर्ववेदानां श्रेष्ठं साम च सामसु॥ ६ | ऋषियोंमें आप वसिष्ठ हैं तथा देवताओंमें देवराज इन्द्र हैं, सभी वेदोंमें साररूपसे आप ओंकार हैं एवं सभी गेयस्वरोंमें आप सामगान हैं॥ ६॥ |
| आरण्यानां पशूनां च सिंहस्त्वं परमेश्वरः।<br>ग्राम्याणामृषभश्चासि भगवान् लोकपूजितः॥ ७ | आप परमेश्वर वन्य पशुओंमें सिंह हैं और ग्राम्य पशुओंमें आप ऐश्वर्यसम्पन्न तथा लोकपूज्य वृषभ हैं॥ ७॥ |
| सर्वथा वर्तमानोऽपि यो यो भावो भविष्यति।<br>त्वामेव तत्र पश्यामो ब्रह्मणा कथितं तथा॥ ८ | हे प्रभो! आप वैसा कीजिये कि आपका जो भी विद्यमान स्वरूप हो, उसमें हम ब्रह्माद्वारा कथित आपके सर्वस्वरूपका दर्शन कर सकें॥ ८॥ |
| कामः क्रोधश्च लोभश्च विषादो मद एव च।<br>एतदिच्छामहे बोद्धुं प्रसीद परमेश्वर॥ ९ | हे परमेश्वर! आप प्रसन्न होइये। हम यह जानना चाहते हैं कि काम, क्रोध, लोभ, विषाद तथा मद—ये पाँचों विकार सभीको दग्ध क्यों करते हैं?॥ ९॥ |
| महासंहरणे प्राप्ते त्वया देव कृतात्मना।<br>करं ललाटे संविध्य वह्निरुत्पादितस्त्वया॥ १० | हे देव! महासंहार उपस्थित होनेपर शुद्ध चित्तवाले आप परमेश्वरने ललाटपर हाथ घर्षितकर अग्नि उत्पन्न की थी॥ १०॥ |
| तेनाग्निना तदा लोका अर्चिर्भिः सर्वतो वृताः।<br>तस्मादग्निसमा ह्येते बहवो विकृतानग्नयः॥ ११ | तब उसी अग्निकी ज्वालाओंसे समस्त लोक |
३३- मुनियोंको शिवभक्तिका उपदेश
${\Hugeश्रीलिङ्गमहापुराण}$ १५० | [ पूर्वभाग
| कामः क्रोधश्च लोभश्च मोहो दम्भ उपद्रवः।<br>यानि चान्यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च॥ १२<br><br>दह्यन्ते प्राणिनस्ते तु त्वत्समुत्थेन वह्निना।<br>अस्माकं दह्यमानानां त्राता भव सुरेश्वर॥ १३ | सभी ओरसे आच्छादित हो गये। इसीलिये ये काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ आदि विक्षोभात्मक विकृत अग्नियाँ अग्नितुल्य ही हैं। इस जगत्में जो भी स्थावर-जंगम जीव एवं पदार्थ हैं, वे सब आपद्वारा उत्पादित अग्निसे दग्ध हो रहे हैं। अतएव हे सुरेश्वर! उस अग्निसे दग्ध हो रहे हम सभीकी आप रक्षा कीजिये॥ ११-१३॥ |
| त्वं च लोकहितार्थाय भूतानि परिषिञ्चसि।<br>महेश्वर महाभाग प्रभो शुभनिरीक्षक॥ १४<br><br>आज्ञापय वयं नाथ कर्तारो वचनं तव।<br>भूतकोटिसहस्रेषु रूपकोटिशतेषु च॥ १५<br><br>अनन्तं गन्तुं न शक्ताः स्म देवदेव नमोऽस्तु ते॥ १६ | हे महेश्वर! हे महाभाग! हे प्रभो! हे शुभ निरीक्षक! आप लोक-कल्याणके लिये जीवोंको अमृतरूपी जलसे सींचते हैं। हे नाथ! आज्ञा दीजिये; हमलोग आपके वचनोंका पालन करनेके लिये तत्पर हैं। अनन्त पदार्थों एवं उनके नाम-रूपोंके मध्य आप व्याप्त हैं, आपका पार हम पा नहीं सके हैं। हे देवाधिदेव! आपको नमस्कार है॥ १४-१६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे 'शिवस्तुतिवर्णनं' नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः॥ ३२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवस्तुतिवर्णन' नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३२॥
तैंतीसवाँ अध्याय
मुनियोंको शिवभक्तिका उपदेश
| नन्द्युवाच<br>ततस्तुतोष भगवाननुगृह्य महेश्वरः।<br>स्तुतिं श्रुत्वा स्तुतस्तेषामिदं वचनमब्रवीत्॥ १ | नन्दीश्वर बोले— उन मुनियोंके द्वारा संस्तुत भगवान् महेश्वर उनकी स्तुति सुनकर उनके प्रति अनुग्रहशील होकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनसे यह वचन बोले॥ १॥ |
| यः पठेच्छृणुयाद्वापि युष्माभिः कीर्तितं स्तवम्।<br>श्रावयेद्वा द्विजान् विप्रो गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ २ | जो विप्र आप लोगोंद्वारा की गयी स्तुतिको पढ़ेगा अथवा सुनेगा अथवा द्विजोंको सुनायेगा, वह मेरे गणोंमें मुख्य स्थान प्राप्त करेगा॥ २॥ |
| वक्ष्यामि वो हितं पुण्यं भक्तानां मुनिपुङ्गवाः।<br>स्त्रीलिङ्गमखिलं देवी प्रकृतिर्मम देहजा॥ ३<br><br>पुंल्लिङ्गं पुरुषो विप्रा मम देहसमुद्भवः।<br>उभाभ्यामेव वै सृष्टिर्मम विप्रा न संशयः॥ ४ | हे मुनिश्रेष्ठो! आप भक्तोंके हितार्थ अब मैं शुभ उपदेश करता हूँ। इस जगत्में समस्त स्त्रीलिङ्ग-समुदाय मेरे शरीरसे उत्पन्न प्रकृतिदेवीका ही रूप है और हे विप्रो! सभी पुंल्लिङ्ग-समुदाय मेरी देहसे उत्पन्न पुरुषका रूप है। हे विप्रो! यह सृष्टि मुझसे प्रादुर्भूत पुरुष-प्रकृति (नर-नारी) इन्हीं दोनोंसे हुई है, इसमें कोई संशय नहीं है॥ ३-४॥ |
| न निन्देद्यतिनं तस्माद्दिग्वाससमनुत्तमम्।<br>बालोन्मत्तविचेष्टं तु मत्परं ब्रह्मवादिनम्॥ ५ | सभी शिवरूप हैं, अतएव किसीकी भी निन्दा न |
अध्याय ३३ ] मुनियोंको शिवभक्तिका उपदेश १५१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ये हि मां भस्मनिरता भस्मना दग्धकिल्बिषाः।<br>यथोक्तकारिणो दान्ता विप्रा ध्यानपरायणाः॥ ६ | करें। विशेष रूपसे मेरी भक्तिमें तत्पर उत्तम, दिगम्बर, ब्रह्मवादी, बालस्वभाववाले, उन्मत्त तथा चेष्टारहित यतिकी तो कभी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये॥ ५॥ |
| महादेवपरा नित्यं चरन्तो ह्यूर्ध्वरेतसः।<br>अर्चयन्ति महादेवं वाङ्मनःकायसंयताः॥ ७ | भस्मसे विभूषित होकर दग्ध पापोंवाले, इन्द्रियजित्, ध्यानपरायण, नित्य नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले तथा महादेवकी भक्तिमें तत्पर जो विप्र मन-वाणी एवं शरीरसे संयत होकर मुझ महादेवकी यथोक्त रीतिसे पूजा-आराधना करते हैं, वे रुद्रलोकको प्राप्त होते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होता है। अतएव व्यक्त लिङ्गवाले शिवका यह [पाशुपत] व्रत परम दिव्य तथा अव्यक्त है॥ ६-८॥ |
| रुद्रलोकमनुप्राप्य न निवर्तन्ति ते पुनः।<br>तस्मादेतद् व्रतं दिव्यमव्यक्तं व्यक्तलिङ्गिनः॥ ८ | |
| भस्मव्रताश्च मुण्डाश्च व्रतिनो विश्वरूपिणः।<br>न तान् परिवदेद्विद्वान्न चैतानाभिलङ्घयेत्॥ ९ | विद्वान् मनुष्यको चाहिये कि भस्म धारण किये तथा मुण्डित सिर जो शिवरूप व्रती हैं, उनकी न तो निन्दा करे तथा न तो उनकी बातोंका उल्लंघन करे। लोक एवं परलोकमें अपना हित चाहनेवालेको ऐसे महात्माओंपर न तो हँसना चाहिये और न तो उनके प्रति अप्रिय वचन बोलना चाहिये॥ ९^१/_२॥ |
| न हसेनाप्रियं ब्रूयादमुत्रेह हितार्थवान्।<br>यस्तान्निन्दति मूढात्मा महादेवं स निन्दति॥ १० | जो मनुष्य इनकी निन्दा करता है, वह मन्दबुद्धि साक्षात् महादेवकी निन्दा करता है तथा जो इनकी नित्य पूजा करता है, वह महादेवजीकी पूजा करता है॥ १०^१/_२॥ |
| यस्त्वेतान् पूजयेन्नित्यं स पूजयति शङ्करम्।<br>एवमेष महादेवो लोकानां हितकाम्यया॥ ११ | इस प्रकार ये महायोगी शिवजी भस्म-भूषित होकर लोक-कल्याणकी कामनासे युग-युगमें नानाविध क्रीड़ाएँ करते हैं। आपलोग भी ऐसा ही आचरण कीजिये; उससे आपलोगोंका कल्याण होगा तथा आपलोग सिद्धि प्राप्त करेंगे॥ ११-१२॥ |
| युगे युगे महायोगी क्रीडते भस्मगुण्ठितः।<br>एवं चरत भद्रं वस्ततः सिद्धिमवाप्स्यथ॥ १२ | |
| अतुलमिह महाभयप्रणाशहेतुं<br>शिवकथितं परमं पदं विदित्वा।<br>व्यपगतभवलोभमोहचित्ताः<br>प्रणिपतिताः सहसा शिरोभिरुग्रम्॥ १३ | महाभयका नाश करनेवाले शिव-कथित अतुलनीय तथा परमपदको जानकर उन मुनियोंका चित्त सांसारिक लोभ एवं मोहसे रहित हो गया और उन्होंने शंकरजीके चरणोंपर सिर रखकर प्रणाम किया॥ १३॥ |
| ततः प्रमुदिता विप्राः श्रुत्वैवं कथितं तदा।<br>गन्धोदकैः सुशुद्धैश्च कुशपुष्पविमिश्रितैः॥ १४ | इस प्रकार शिवकी बातें सुनकर प्रसन्न मनवाले उन मुनियोंने गन्ध, पुष्प तथा कुशसे मिश्रित शुद्ध जलसे परिपूर्ण विशाल घड़ोंसे महेश्वरको स्नान कराया और पुनः वे गूढ़ तथा हुंकारयुक्त सुन्दर स्वरोंसे महादेवजीका स्तुति-गान करने लगे॥ १४-१५॥ |
| स्नापयन्ति महाकुम्भैरद्भिरेव महेश्वरम्।<br>गायन्ति विविधैर्गूढैर्हुङ्कारैश्चापि सुस्वरैः॥ १५ | |
| नमो देवाधिदेवाय महादेवाय वै नमः।<br>अर्धनारीशरीराय सांख्ययोगप्रवर्तिने॥ १६ | देवाधिदेव महादेवको नमस्कार है। अर्धनारीश्वर |
३४- भगवान् शिवद्वारा भस्म, भस्मस्नान एवं शिवयोगियोंकी महिमाका प्रतिपादन
| १५२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| मेघवाहनकृष्णाय गजचर्मनिवासिने।<br>कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने ॥ १७ | तथा सांख्ययोगके प्रवर्तक शिवको नमस्कार है। मेघवाहन कृष्ण (सदाशिव), गजचर्मको अधोवस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले, कृष्णमृगके चर्मको उत्तरीयके रूपमें धारण करनेवाले एवं सर्पको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है ॥ १६-१७ ॥ | | सुरचितसुविचित्रकुण्डलाय<br>सुरचितमाल्यविभूषणाय तुभ्यम्।<br>मृगपतिवरचर्मवाससे च<br>प्रथितयशसे नमोऽस्तु शङ्कराय ॥ १८ | सुन्दर बने हुए अतिविचित्र कुण्डल धारण करनेवाले, सुन्दर रचित मालाको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, सिंहके उत्तम चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले तथा विस्तृत यशवाले आप शंकरको नमस्कार है ॥ १८ ॥ | | ततस्तान् स मुनीन् प्रीतः प्रत्युवाच महेश्वरः।<br>प्रीतोऽस्मि तपसा युष्मान् वरं वृणुत सुव्रताः ॥ १९ | तत्पश्चात् उस स्तुतिसे अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त उन महादेवने उन मुनियोंसे पुनः कहा—हे सुव्रती मुनीश्वरो! मैं तुमलोगोंकी तपस्यासे अति प्रसन्न हूँ। तुम सब वर माँगो ॥ १९ ॥ | | ततस्ते मुनयः सर्वे प्रणिपत्य महेश्वरम्।<br>भृग्वङ्गिरा वसिष्ठश्च विश्वामित्रस्तथैव च ॥ २०<br><br>गौतमोऽत्रिः सुकेशश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।<br>मरीचिः कश्यपः कण्वः संवर्तश्च महातपाः ॥ २१<br><br>ते प्रणम्य महादेवमिदं वचनमब्रुवन्।<br>भस्मस्नानं च नग्नत्वं वामत्वं प्रतिलोमता ॥ २२<br><br>सेव्यासेव्यत्वमेवं च ह्येतदिच्छाम वेदितुम्। | इसपर भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, अत्रि, सुकेश, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, कश्यप, कण्व, संवर्त आदि उन सभी महान् तपस्वी मुनियोंने शिवजीको प्रणामकर उनसे यह वचन कहा—भस्म-स्नान, नग्नता, वामता, प्रतिलोमता (काम्य कर्ममार्गमें प्रवृत्ति), सेव्य तथा असेव्य—इनके विषयमें हम जानना चाहते हैं ॥ २०—२२ १/२ ॥ | | ततस्तेषां वचः श्रुत्वा भगवान् परमेश्वरः ॥ २३<br><br>सस्मितं प्राह सम्प्रेक्ष्य सर्वान् मुनिवरांस्तदा ॥ २४ | इसपर उनकी बात सुनकर परमेश्वर भगवान् शिवने मुसकराकर सभी मुनिवरोंकी ओर देखकर उनसे कहा ॥ २३-२४ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ऋषिवाक्यं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ऋषिवाक्य' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥
चौंतीसवाँ अध्याय
भगवान् शिवद्वारा भस्म, भस्मस्नान एवं शिवयोगियोंकी महिमाका प्रतिपादन
| श्रीभगवानुवाच | भगवान् शिव बोले— |
|---|---|
| एतद्वः सम्प्रवक्ष्यामि कथासर्वस्वमद्य वै।<br>अग्निर्ह्यहं सोमकर्ता सोमश्चाग्निमुपाश्रितः ॥ १ | हे मुनीश्वर! इन सबके माहात्म्यसे युक्त कथाके सारभागका वर्णन मैं आपलोगोंसे करूँगा। सोमका कारणस्वरूप अग्नि मैं हूँ तथा अग्निसंयुक्त सोम भी मैं ही हूँ ॥ १ ॥ |
| कृतमेतद्द्बहत्यग्निर्भूयो लोकसमाश्रयात्।<br>असकृत्त्वग्निना दग्धं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २ | इस लोक (भारतवर्ष)-में रहनेके कारण सबके कर्मोंका फल अग्निके द्वारा ही धारण किया जाता है। अग्निने इस स्थावर-जंगम जगत्को अनेक बार दग्ध |
अध्याय ३४] | भगवान् शिवद्वारा भस्म, भस्मस्नान एवं शिवयोगियोंकी महिमाका प्रतिपादन | १५३
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| भस्मसादग्निहितं सर्वं पवित्रमिदमुत्तमम्।<br>भस्मना वीर्यमास्थाय भूतानि परिषिञ्चति॥ ३ | किया है। अग्निसे भस्मीभूत हो जानेसे यह सम्पूर्ण जगत् पवित्र तथा उत्तम हो जाता है। उसी भस्मसे ओज प्राप्त करके यह सोम प्राणियोंको जीवित करता है॥ २-३॥ |
| अग्निकार्यं च यः कृत्वा करिष्यति त्र्यायुषम्।<br>भस्मना मम वीर्येण मुच्यते सर्वकिल्बिषैः॥ ४ | जो मनुष्य अग्निहोत्र-कार्य सम्पन्न करके भस्मसे त्र्यायुष करता है, वह मेरे ओजसे समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ४॥ |
| भासतेत्येव यद्भस्म शुभं भावयते च यत्।<br>भक्षणात्सर्वपापानां भस्मेति परिकीर्तितम्॥ ५ | यह भस्म प्रकाशित करता है, कल्याण सम्पादित करता है तथा समस्त पापोंका नाश करता है, अतएव इसे भस्म कहा जाता है॥ ५॥ |
| ऊष्मपाः पितरो ज्ञेया देवा वै सोमसम्भवाः।<br>अग्नीषोमात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ ६ | ऊष्मपसंज्ञक पितर तथा देवतागण चन्द्रमासे उत्पन्न कहे गये हैं। स्थावर-जंगममय यह समस्त जगत् अग्नि-सोमात्मक है॥ ६॥ |
| अहमग्निर्महातेजाः सोमश्चैषा महाम्बिका।<br>अहमग्निश्च सोमश्च प्रकृत्या पुरुषः स्वयम्॥ ७ | मैं महान् तेजसे युक्त अग्नि हूँ तथा ये महिमामयी अम्बा पार्वती सोमस्वरूपा हैं। प्रकृतिके साथ पुरुषरूप मैं अग्नि सोम दोनों ही हूँ॥ ७॥ |
| तस्माद्भस्म महाभागा मद्वीर्यमिति चोच्यते।<br>स्ववीर्यं वपुषा चैव धारयामीति वै स्थितिः॥ ८ | अतएव हे महाभाग मुनियो! यह भस्म मेरा वीर्य है—ऐसा कहा जाता है। मैं अपने शरीरमें अपने वीर्य (भस्म)-को धारण करके अधिष्ठित हूँ और उसी |
| तदाप्रभृति लोकेषु रक्षार्थमशुभेषु च।<br>भस्मना क्रियते रक्षा सूतिकानां गृहेषु च॥ ९ | समयसे यह भस्म सभी अमंगलोंसे लोकोंकी रक्षा करता है तथा इसी भस्मसे सूतिकागृहोंकी भी रक्षा की जाती है॥ ८-९॥ |
| भस्मस्नानविशुद्धात्मा जितक्रोधो जितेन्द्रियः।<br>मत्समीपं समागम्य न भूयो विनिवर्तते॥ १० | जो मनुष्य क्रोध तथा इन्द्रियोंको जीतकर भस्मस्नान करके पवित्र अन्तःकरणवाला हो जाता है, वह मेरा सांनिध्य प्राप्त कर लेता है एवं पुनर्जन्मसे मुक्त हो जाता है॥ १०॥ |
| व्रतं पाशुपतं योगं कापिलं चैव निर्मितम्।<br>पूर्वं पाशुपतं ह्येतन्निर्मितं तदनुत्तमम्॥ ११ | पाशुपतव्रत, योगशास्त्र तथा कापिल (सांख्यशास्त्र)-की रचना मैंने ही की। इनमें पाशुपतयोगकी रचना पहले हुई है, इसलिये यह उत्तम है॥ ११॥ |
| शेषाश्चाश्रमिणः सर्वे पश्चात्सृष्टाः स्वयम्भुवा।<br>सृष्टिरेषा मया सृष्टा लज्जामोहभयात्मिका॥ १२ | आश्रम-सम्बन्धी शेष सभी शास्त्र स्वयंभू ब्रह्माजीके द्वारा बादमें रचे गये और लज्जा, मोह तथा भयसे युक्त इस सृष्टिकी रचना मैंने ही की है॥ १२॥ |
| नग्ना एव हि जायन्ते देवता मुनयस्तथा।<br>ये चान्ये मानवा लोके सर्वे जायन्त्यवाससः॥ १३ | देवता तथा मुनिगण नग्न ही उत्पन्न होते हैं। लोकमें अन्य जो मनुष्य हैं, वे भी वस्त्रविहीन-अवस्थामें उत्पन्न होते हैं। |
| इन्द्रियैरजितैर्नग्नो दुकूलेनापि संवृतः।<br>तैरेव संवृतैर्गुप्तो न वस्त्रं कारणं स्मृतम्॥ १४ | इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त न किये हुए लोग सुन्दर वस्त्र धारण करके भी नग्न हैं और |
| १५४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- | | | इन्द्रियजित् लोग नग्न रहते हुए भी वस्त्रसे ढँके हुए हैं, इसमें वस्त्र हेतु नहीं माना गया है॥ १३-१४॥ | | क्षमा धृतिरहिंसा च वैराग्यं चैव सर्वशः।<br>तुल्यौ मानावमानौ च तदावरणमुत्तमम्॥ १५ | क्षमा, धैर्य, अहिंसा, वैराग्य तथा हर तरहसे मान-अपमानमें समानता उत्तम आवरण कहे गये हैं॥ १५॥ | | भस्मस्नानेन दिग्धाङ्गो ध्यायते मनसा भवम्।<br>यद्यकार्यसहस्राणि कृत्वा यः स्नाति भस्मना॥ १६ | भस्म-स्नानके द्वारा पूरे शरीरमें भस्मका अनुलेपनकर मनसे शिवजीका ध्यान करना चाहिये। हजारों प्रकारके कुकृत्य करके भी यदि जो कोई मनुष्य भस्मसे स्नान करे, तो उसके सभी पापोंको भस्म उसी प्रकार जला डालता है, जिस प्रकार अग्नि अपने तेजसे वनको दग्ध कर देता है॥ १६ १/२॥ | | तत्सर्वं दहते भस्म यथाग्निस्तेजसा वनम्।<br>तस्माद्यत्नपरो भूत्वा त्रिकालमपि यः सदा॥ १७ | अतएव जो मनुष्य प्रयत्नशील होकर त्रिकाल भस्म-स्नान करता है, वह मेरे गणोंमें श्रेष्ठताको प्राप्त होता है॥ १७ १/२॥ | | भस्मना कुरुते स्नानं गाणपत्यं स गच्छति।<br>समाहृत्य क्रतून् सर्वान् गृहीत्वा व्रतमुत्तमम्॥ १८<br><br>ध्यायन्ति ये महादेवं लीलासद्भावभाविताः।<br>उत्तरेणार्यपन्थानं तेऽमृतत्वमवाप्नुयुः॥ १९ | जो लोग उत्तम व्रत धारण करके समस्त यज्ञ सम्पन्न करके महादेवके लीला-विग्रहका चिन्तन करते हुए उनकी आराधना करते हैं; वे अमृतत्व (मोक्ष)-को प्राप्त होते हैं। इसे श्रेष्ठ उत्तरमार्ग कहा गया है॥ १८-१९॥ | | दक्षिणेन च पन्थानं ये श्मशानानि भेजिरे।<br>अणिमा गरिमा चैव लघिमा प्राप्तिरेव च॥ २०<br><br>इच्छाकामावसायित्वं तथा प्राकाम्यमेव च।<br>ईशित्वं च वशित्वं च अमरत्वं च ते गताः॥ २१ | जो लोग दक्षिण-मार्गके द्वारा नाशवान् काम्यकर्मोंके लिये परमेश्वरकी आराधना करते हैं, वे अणिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, इच्छाकामावसायित्व, प्राकाम्य, ईशित्व तथा वशित्व सिद्धियाँ प्राप्तकर अमर हो जाते हैं॥ २०-२१॥ | | इन्द्रादयस्तथा देवाः कामिकव्रतमास्थिताः।<br>ऐश्वर्यं परमं प्राप्य सर्वे प्रथिततेजसः॥ २२ | इन्द्र आदि सभी देवता भी काम्य व्रतका आश्रयणकर परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति करके अपरिमित तेजस्वी हो गये॥ २२॥ | | व्यपगतमदमोहमुक्तराग-<br>स्तमरजदोषविवर्जितस्वभावः।<br>परिभवमिदमुत्तमं विदित्वा<br>पशुपतियोगपरो भवेत्सदैव॥ २३ | मद-मोहसे शून्य, रागोंसे मुक्त तथा तम-रज आदि विकारोंसे रहित स्वभाववाला होकर संसारको परिभूत करनेवाले पाशुपतयोगको उत्तम जानकर सदा इस पशुपतियोगमें स्थित रहना चाहिये॥ २३॥ | | इमं पाशुपतं ध्यायन् सर्वपापप्रणाशनम्।<br>यः पठेच्च शुचिर्भूत्वा श्रद्दधानो जितेन्द्रियः॥ २४ | सभी इन्द्रियोंको जीतकर जो मनुष्य पवित्र मनसे सभी पापोंका नाश करनेवाले इस पाशुपतयोगका ध्यानपूर्वक श्रद्धाभावसे पाठ करता है, सभी पातकोंसे रहित विशुद्ध आत्मावाला वह प्राणी रुद्रलोकको प्राप्त होता है॥ २४ १/२॥ | | सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति।<br>ते सर्वे मुनयः श्रुत्वा वसिष्ठाद्या द्विजोत्तमाः॥ २५ | महादेवजीका यह वचन सुनकर द्विजोंने श्रेष्ठ |
३५- महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महा-मृत्युंजय मन्त्रकी स्वरूपमीमांसा
अध्याय ३५ ] महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महामृत्युंजयमन्त्रकी स्वरूपमीमांसा १५५
| भस्मपाण्डुरदिग्धाङ्गा बभूवुर्विगतस्पृहाः।<br>रुद्रलोकाय कल्पान्ते संस्थिताः शिवतेजसा॥ २६ | वसिष्ठ आदि वे सभी मुनि अपने अंगोंमें पीताभ-श्वेत भस्म लगाने लगे और इच्छारहित वे मुनिगण कल्पके अन्तमें शिवजीके तेजके प्रभावसे रुद्रलोकके लिये प्रस्थित हुए॥ २५-२६॥ |
| तस्मान्न निन्द्याः पूज्याश्च विकृता मलिना अपि।<br>रूपान्विताश्च विप्रेन्द्राः सदा योगीन्द्रशङ्कया॥ २७ | [नन्दी कहते हैं—हे सनत्कुमारजी!] अतः मलिन, विकृत, रूपसम्पन्न चाहे जिस रूपमें हों, महान् योगीकी शंका करके उनकी निन्दा नहीं करनी चाहिये, अपितु उनकी सदा पूजा करनी चाहिये॥ २७॥ |
| बहुना किं प्रलापेन भवभक्ता द्विजोत्तमाः।<br>सम्पूज्याः सर्वयत्नेन शिववन्नात्र संशयः॥ २८ | अधिक कहनेकी क्या आवश्यकता; दृढ़ व्रतवाले भगवान् शिवके द्विजश्रेष्ठ भक्त चाहे वे मलिन ही क्यों न हों, पूरे प्रयत्नसे शिवकी ही भाँति उनकी पूजा करनी चाहिये, इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ २८^{१}/_{२}॥ |
| मलिनाश्चैव विप्रेन्द्रा भवभक्ता दृढव्रताः।<br>दधीचस्तु यथा देवदेवं जित्वा व्यवस्थितः॥ २९ | इसी भाँति मुनि दधीच शिवकी भक्तिसे देवदेव नारायणको जीतकर लोकमें प्रतिष्ठित हो गये थे; इसमें सन्देह नहीं है॥ २९^{१}/_{२}॥ |
| नारायणं तथा लोके रुद्रभक्त्या न संशयः।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भस्मदिग्धतनूरुहाः॥ ३० | अतएव भस्मसे लिप्त शरीरवाले, जटाधारी, मुण्डित सिरवाले तथा दिगम्बर वेशवाले अनेक प्रकारके महात्माओंकी मन, वचन एवं कर्मसे पूर्ण प्रयत्नके साथ महादेवकी भाँति विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥ ३०-३१॥ |
| जटिनो मुण्डिनश्चैव नग्ना नानाप्रकारिणः।<br>सम्पूज्याः शिववन्नित्यं मनसा कर्मणा गिरा॥ ३१ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे योगिप्रशंसा नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'योगिप्रशंसा' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३४॥
पैंतीसवाँ अध्याय
महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महामृत्युंजयमन्त्रकी स्वरूपमीमांसा
| सनत्कुमार उवाच<br>कथं जघान राजानं क्षुपं पादेन सुव्रत।<br>दधीचः समरे जित्वा देवदेवं जनार्दनम्॥ १<br><br>वज्रास्थित्वं कथं लेभे महादेवान् महातपाः।<br>वक्तुमर्हसि शैलादे जितो मृत्युस्त्वया यथा॥ २ | सनत्कुमार बोले— हे सुव्रत! मुनि दधीचने समरमें देवदेव नारायणको जीतकर राजा क्षुपके ऊपर अपने पैरसे प्रहार क्यों किया? और उन महातपस्वीने महादेवजीसे अपनी हड्डियाँ वज्रतुल्य होनेका वरदान किस प्रकार प्राप्त किया और हे नन्दीश्वर! जिस प्रकार आपने मृत्युपर विजय प्राप्त की, वह भी आप कृपा करके बताइये॥ १-२॥ |
| शैलादिरुवाच<br>ब्रह्मपुत्रो महातेजा राजा क्षुप इति स्मृतः।<br>अभून्मित्रो दधीचस्य मुनीन्द्रस्य जनेश्वरः॥ ३ | नन्दी कहते हैं— ब्रह्माजीके पुत्र महान् तेजवाले क्षुप नामक एक राजा हुए हैं। उन लोकपति क्षुपकी मुनीश्वर दधीचसे मित्रता थी॥ ३॥ |
| १५६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| चिरात्तयोः प्रसङ्गाद्वै वादः क्षुपदधीचयोः।<br>अभवत् क्षत्रियश्रेष्ठो विप्र एवेति विश्रुतः॥ ४ | कालान्तरमें उन क्षुप तथा दधीचके मध्य किसी बातके सन्दर्भमें विवाद हो गया। क्षुपका कथन था कि क्षत्रिय श्रेष्ठ होता है और दधीचका कथन था कि ब्राह्मण ही श्रेष्ठ होता है॥ ४॥ | | अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः।<br>तस्मादिन्द्रो ह्यहं वह्निर्यमश्च निर्ऋतिस्तथा॥ ५<br><br>वरुणश्चैव वायुश्च सोमो धनद एव च।<br>ईश्वरोऽहं न सन्देहो नावमन्तव्य एव च॥ ६ | राजा आठ लोकपालोंका विग्रहस्वरूप होता है। इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, चन्द्र, कुबेर तथा ईश्वर मैं ही हूँ; इसमें कोई सन्देह नहीं है, अतः तुम्हें मेरी अवज्ञा नहीं करनी चाहिये॥ ५-६॥ | | महती देवता या सा महतश्चापि सुव्रत।<br>तस्मात्त्वया महाभाग च्यावनेय सदा ह्यहम्॥ ७<br><br>नावमन्तव्य एवेह पूजनीयश्च सर्वथा।<br>श्रुत्वा तथा मतं तस्य क्षुपस्य मुनिसत्तमः॥ ८ | हे सुव्रत! वह राजा महान् देवता होता है। अतः हे च्यवनपुत्र! हे महाभाग! तुम्हें मेरा अपमान कभी नहीं करना चाहिये, अपितु सर्वथा मेरी पूजा करनी चाहिये॥ ७ १/२॥<br><br>उन क्षुपका वह वचन सुनकर च्यवनपुत्र मुनिश्रेष्ठ द्विज दधीचने आत्मगौरवसे प्रेरित होकर अपने बाँयें हाथसे क्षुपके सिरपर तेज मुष्टिका-प्रहार किया॥ ८ १/२॥ | | दधीचश्च्यावनिश्चोग्रो गौरवादात्मनो द्विजः।<br>अताडयत्क्षुपं मूर्ध्नि दधीचो वाममुष्टिना।<br>चिच्छेद वज्रेण च तं दधीचं बलवान् क्षुपः॥ ९<br><br>ब्रह्मलोके पुरासौ हि ब्रह्मणः क्षुतसम्भवः।<br>लब्धं वज्रं च कार्यार्थं वज्रिणा चोदितः प्रभुः॥ १० | बलशाली क्षुपने भी वज्रसे उन दधीचपर प्रहार किया। पूर्वकालमें राजा क्षुप ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीकी छींकसे उत्पन्न हुए थे। भगवान्की प्रेरणासे असुरोंके पराजयरूप कार्यके निमित्त इन्द्रसे उन्होंने वज्र प्राप्त किया था॥ ९-१०॥ | | स्वेच्छयैव नरो भूत्वा नरपालो बभूव सः।<br>तस्माद्राजा स विप्रेन्द्रमजयद्वै महाबलः॥ ११ | अपनी इच्छासे ही नर होकर वे राजा बने थे। श्रीयुक्त, बलवान् तथा तमोगुणयुक्त इन्द्रकी भाँति राजा क्षुप भी बलशाली थे, इसीलिये वे विप्रेन्द्र दधीचको जीतनेमें समर्थ हो गये॥ ११ १/२॥ | | यथा वज्रधरः श्रीमान् बलवांस्तमसान्वितः।<br>पपात भूमौ निहतो वज्रेण द्विजपुङ्गवः॥ १२ | राजा क्षुपके वज्र-प्रहारसे निहत द्विजश्रेष्ठ दधीच भूमिपर गिर पड़े। फिर अत्यन्त दुःखी होकर उन्होंने भृगु-पुत्र मुनि शुक्राचार्यका स्मरण किया॥ १२ १/२॥ | | सस्मार च तदा तत्र दुःखार्तो भार्गवं मुनिम्।<br>शुक्रोऽपि सन्धयामास ताडितं कुलिशेन तम्॥ १३ | देहधारियोंमें श्रेष्ठ शुक्राचार्यने भी वहाँ पहुँचकर दधीचमुनिके वज्र-ताड़ित शरीरको अपने योगबलसे यथावत् जोड़ दिया॥ १३ १/२॥ | | योगादेत्य दधीचस्य देहं देहभृतांवरः।<br>सन्धाय पूर्ववद्देहं दधीचस्याह भार्गवः॥ १४<br><br>भो दधीच महाभाग देवदेवमुमापतिम्।<br>सम्पूज्य पूज्यं ब्रह्माद्यैर्देवदेवं निरञ्जनम्॥ १५ | दधीचके शरीरको पूर्वकी भाँति ठीककर भार्गव शुक्राचार्यने कहा—हे महाभाग दधीच! हे विप्रवर! ब्रह्मा आदि देवताओंसे पूजित निरंजन देवाधिदेव उमापति शिवकी सम्यक् पूजा करके उन त्र्यम्बक महादेवके अनुग्रहसे अवध्य हो जाओ॥ १४-१५ १/२॥ | | अवध्यो भव विप्रर्षे प्रसादात्त्र्यम्बकस्य तु।<br>मृतसञ्जीवनं तस्माल्लब्धमेतन्मया द्विज॥ १६ | हे द्विज! उन्हीं महादेवजीसे मैंने भी मृतसंजीवनी |
अध्याय ३५] महर्षि दधीच एवं राजा क्षुपकी कथा तथा महामृत्युंजय मन्त्रकी स्वरूपमीमांसा १५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नास्ति मृत्युभयं शम्भोर्भक्तानामिह सर्वतः।<br>मृतसञ्जीवनं चापि शैवमद्य वदामि ते॥ १७ | विद्या प्राप्त की है। शिवजीके भक्तोंको मृत्युसे किसी प्रकारका भय नहीं होता है। उसी शैवी मृतसंजीवनी विद्याको अब मैं तुम्हें बता रहा हूँ॥ १६-१७॥ |
| त्रियम्बकं यजामहे त्रैलोक्यपितरं प्रभुम्।<br>त्रिमण्डलस्य पितरं त्रिगुणस्य महेश्वरम्॥ १८<br><br>त्रितत्त्वस्य त्रिवह्नेश्च त्रिधाभूतस्य सर्वतः।<br>त्रिदेवस्य महादेवं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्॥ १९ | तीनों लोकोंके पिता; सोम-चन्द्र-अग्नि-इन तीनों मण्डलोंके जनक; सत-रज-तम-तीनों गुणोंके महेश्वर; तीन तत्त्वों (बुद्धि-अहंकार-मन), तीन अग्नियों (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि), तीन देवों (ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र) तथा जगत्के सभी तीन प्रकारके पदार्थोंके स्वामी, सुगन्धिरूप पुष्टिवर्धन परमेश्वर महादेवका यजन करना चाहिये॥ १८-१९॥ |
| सर्वभूतेषु सर्वत्र त्रिगुणे प्रकृतौ तथा।<br>इन्द्रियेषु तथान्येषु देवेषु च गणेषु च॥ २० | सुगन्धिरूप वह सूक्ष्म परमेश्वर सभी जगह, समस्त जीवधारियोंमें, त्रिगुणात्मिका प्रकृतिमें, इन्द्रियोंमें, अन्य देवताओं तथा गणोंमें उसी प्रकार अधिष्ठित है, जैसे पुष्पोंमें गन्ध विद्यमान रहती है॥ २० १/२॥ |
| पुष्पेषु गन्धवत्सूक्ष्मः सुगन्धिः परमेश्वरः।<br>पुष्टिश्च प्रकृतिर्यस्मात्पुरुषस्य द्विजोत्तम॥ २१<br><br>महदादिविशेषान्तविकल्पस्यापि सुव्रत।<br>विष्णोः पितामहस्यापि मुनीनां च महामुने॥ २२ | हे द्विजश्रेष्ठ! चूँकि पुरुषरूप परमेश्वरकी पुष्टि प्रकृतिरूप है। हे सुव्रत! हे महामुने! अतएव वही परमेश्वर महत् आदिसे लेकर विशेषपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच, विष्णु, ब्रह्मा, मुनियों तथा इन्द्र आदि सभी देवताओंका पुष्टिवर्धन करता है॥ २१-२२ १/२॥ |
| इन्द्रस्यापि च देवानां तस्माद्वै पुष्टिवर्धनः।<br>तं देवममृतं रुद्रं कर्मणा तपसा तथा॥ २३ | कर्म, तपस्या, स्वाध्याय, योग तथा ध्यानके द्वारा उन अमृतरूप महादेवका यजन करना चाहिये॥ २३ १/२॥ |
| स्वाध्यायेन च योगेन ध्यानेन च यजामहे।<br>सत्येनानेन मुक्षीयान्मृत्युपाशाद्भवः स्वयम्॥ २४<br><br>बन्धमोक्षकरो यस्मादुर्वारुकमिव प्रभुः।<br>मृतसञ्जीवनो मन्त्रो मया लब्धस्तु शङ्करात्॥ २५ | जन्म-मरणरूप बन्धनसे मुक्ति प्रदान करनेवाले प्रभु शिव इस सत्यके द्वारा जीवको मृत्युके पाशसे छुटकारा प्रदान करते हैं। सूर्यकी किरणोंसे पककर अपने मूलबन्धसे स्वयं मुक्त हुए उर्वारुक (ककड़ी)-की भाँति वह जीव शिवाराधनके द्वारा सांसारिक बन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ २४ १/२॥ |
| जप्त्वा हुत्वाभिमन्त्र्यैवं जलं पीत्वा दिवानिशम्।<br>लिङ्गस्य सन्निधौ ध्यात्वा नास्ति मृत्युभयं द्विज॥ २६ | मैंने भी शिवजीसे ही मृतसंजीवनी मन्त्र प्राप्त किया है। हे द्विज! जप करने, हवन करने, अभिमन्त्रित जलका पान करने तथा दिन-रात शिवलिङ्गके सांनिध्यमें बैठकर उनका ध्यान करनेसे मृत्युका भय नहीं रह जाता॥ २५-२६॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तपसाराध्य शङ्करम्।<br>वज्रास्थित्वमवध्यत्वमदीनत्वं च लब्धवान्॥ २७ | उन शुक्राचार्यका वह वचन सुनकर मुनि दधीचने घोर तपस्या करके शिवकी आराधना की, जिसके |