श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १५२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| मेघवाहनकृष्णाय गजचर्मनिवासिने।<br>कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने ॥ १७ | तथा सांख्ययोगके प्रवर्तक शिवको नमस्कार है। मेघवाहन कृष्ण (सदाशिव), गजचर्मको अधोवस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले, कृष्णमृगके चर्मको उत्तरीयके रूपमें धारण करनेवाले एवं सर्पको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है ॥ १६-१७ ॥ | | सुरचितसुविचित्रकुण्डलाय<br>सुरचितमाल्यविभूषणाय तुभ्यम्।<br>मृगपतिवरचर्मवाससे च<br>प्रथितयशसे नमोऽस्तु शङ्कराय ॥ १८ | सुन्दर बने हुए अतिविचित्र कुण्डल धारण करनेवाले, सुन्दर रचित मालाको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, सिंहके उत्तम चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले तथा विस्तृत यशवाले आप शंकरको नमस्कार है ॥ १८ ॥ | | ततस्तान् स मुनीन् प्रीतः प्रत्युवाच महेश्वरः।<br>प्रीतोऽस्मि तपसा युष्मान् वरं वृणुत सुव्रताः ॥ १९ | तत्पश्चात् उस स्तुतिसे अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त उन महादेवने उन मुनियोंसे पुनः कहा—हे सुव्रती मुनीश्वरो! मैं तुमलोगोंकी तपस्यासे अति प्रसन्न हूँ। तुम सब वर माँगो ॥ १९ ॥ | | ततस्ते मुनयः सर्वे प्रणिपत्य महेश्वरम्।<br>भृग्वङ्गिरा वसिष्ठश्च विश्वामित्रस्तथैव च ॥ २०<br><br>गौतमोऽत्रिः सुकेशश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।<br>मरीचिः कश्यपः कण्वः संवर्तश्च महातपाः ॥ २१<br><br>ते प्रणम्य महादेवमिदं वचनमब्रुवन्।<br>भस्मस्नानं च नग्नत्वं वामत्वं प्रतिलोमता ॥ २२<br><br>सेव्यासेव्यत्वमेवं च ह्येतदिच्छाम वेदितुम्। | इसपर भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, अत्रि, सुकेश, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरीचि, कश्यप, कण्व, संवर्त आदि उन सभी महान् तपस्वी मुनियोंने शिवजीको प्रणामकर उनसे यह वचन कहा—भस्म-स्नान, नग्नता, वामता, प्रतिलोमता (काम्य कर्ममार्गमें प्रवृत्ति), सेव्य तथा असेव्य—इनके विषयमें हम जानना चाहते हैं ॥ २०—२२ १/२ ॥ | | ततस्तेषां वचः श्रुत्वा भगवान् परमेश्वरः ॥ २३<br><br>सस्मितं प्राह सम्प्रेक्ष्य सर्वान् मुनिवरांस्तदा ॥ २४ | इसपर उनकी बात सुनकर परमेश्वर भगवान् शिवने मुसकराकर सभी मुनिवरोंकी ओर देखकर उनसे कहा ॥ २३-२४ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ऋषिवाक्यं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ऋषिवाक्य' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥
चौंतीसवाँ अध्याय
भगवान् शिवद्वारा भस्म, भस्मस्नान एवं शिवयोगियोंकी महिमाका प्रतिपादन
| श्रीभगवानुवाच | भगवान् शिव बोले— |
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| एतद्वः सम्प्रवक्ष्यामि कथासर्वस्वमद्य वै।<br>अग्निर्ह्यहं सोमकर्ता सोमश्चाग्निमुपाश्रितः ॥ १ | हे मुनीश्वर! इन सबके माहात्म्यसे युक्त कथाके सारभागका वर्णन मैं आपलोगोंसे करूँगा। सोमका कारणस्वरूप अग्नि मैं हूँ तथा अग्निसंयुक्त सोम भी मैं ही हूँ ॥ १ ॥ |
| कृतमेतद्द्बहत्यग्निर्भूयो लोकसमाश्रयात्।<br>असकृत्त्वग्निना दग्धं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २ | इस लोक (भारतवर्ष)-में रहनेके कारण सबके कर्मोंका फल अग्निके द्वारा ही धारण किया जाता है। अग्निने इस स्थावर-जंगम जगत्को अनेक बार दग्ध |