भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 153

अध्याय ३३ ] मुनियोंको शिवभक्तिका उपदेश १५१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ये हि मां भस्मनिरता भस्मना दग्धकिल्बिषाः।<br>यथोक्तकारिणो दान्ता विप्रा ध्यानपरायणाः॥ ६करें। विशेष रूपसे मेरी भक्तिमें तत्पर उत्तम, दिगम्बर, ब्रह्मवादी, बालस्वभाववाले, उन्मत्त तथा चेष्टारहित यतिकी तो कभी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये॥ ५॥
महादेवपरा नित्यं चरन्तो ह्यूर्ध्वरेतसः।<br>अर्चयन्ति महादेवं वाङ्मनःकायसंयताः॥ ७भस्मसे विभूषित होकर दग्ध पापोंवाले, इन्द्रियजित्, ध्यानपरायण, नित्य नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाले तथा महादेवकी भक्तिमें तत्पर जो विप्र मन-वाणी एवं शरीरसे संयत होकर मुझ महादेवकी यथोक्त रीतिसे पूजा-आराधना करते हैं, वे रुद्रलोकको प्राप्त होते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होता है। अतएव व्यक्त लिङ्गवाले शिवका यह [पाशुपत] व्रत परम दिव्य तथा अव्यक्त है॥ ६-८॥
रुद्रलोकमनुप्राप्य न निवर्तन्ति ते पुनः।<br>तस्मादेतद् व्रतं दिव्यमव्यक्तं व्यक्तलिङ्गिनः॥ ८
भस्मव्रताश्च मुण्डाश्च व्रतिनो विश्वरूपिणः।<br>न तान् परिवदेद्विद्वान्न चैतानाभिलङ्घयेत्॥ ९विद्वान् मनुष्यको चाहिये कि भस्म धारण किये तथा मुण्डित सिर जो शिवरूप व्रती हैं, उनकी न तो निन्दा करे तथा न तो उनकी बातोंका उल्लंघन करे। लोक एवं परलोकमें अपना हित चाहनेवालेको ऐसे महात्माओंपर न तो हँसना चाहिये और न तो उनके प्रति अप्रिय वचन बोलना चाहिये॥ ९^१/_२॥
न हसेनाप्रियं ब्रूयादमुत्रेह हितार्थवान्।<br>यस्तान्निन्दति मूढात्मा महादेवं स निन्दति॥ १०जो मनुष्य इनकी निन्दा करता है, वह मन्दबुद्धि साक्षात् महादेवकी निन्दा करता है तथा जो इनकी नित्य पूजा करता है, वह महादेवजीकी पूजा करता है॥ १०^१/_२॥
यस्त्वेतान् पूजयेन्नित्यं स पूजयति शङ्करम्।<br>एवमेष महादेवो लोकानां हितकाम्यया॥ ११इस प्रकार ये महायोगी शिवजी भस्म-भूषित होकर लोक-कल्याणकी कामनासे युग-युगमें नानाविध क्रीड़ाएँ करते हैं। आपलोग भी ऐसा ही आचरण कीजिये; उससे आपलोगोंका कल्याण होगा तथा आपलोग सिद्धि प्राप्त करेंगे॥ ११-१२॥
युगे युगे महायोगी क्रीडते भस्मगुण्ठितः।<br>एवं चरत भद्रं वस्ततः सिद्धिमवाप्स्यथ॥ १२
अतुलमिह महाभयप्रणाशहेतुं<br>शिवकथितं परमं पदं विदित्वा।<br>व्यपगतभवलोभमोहचित्ताः<br>प्रणिपतिताः सहसा शिरोभिरुग्रम्॥ १३महाभयका नाश करनेवाले शिव-कथित अतुलनीय तथा परमपदको जानकर उन मुनियोंका चित्त सांसारिक लोभ एवं मोहसे रहित हो गया और उन्होंने शंकरजीके चरणोंपर सिर रखकर प्रणाम किया॥ १३॥
ततः प्रमुदिता विप्राः श्रुत्वैवं कथितं तदा।<br>गन्धोदकैः सुशुद्धैश्च कुशपुष्पविमिश्रितैः॥ १४इस प्रकार शिवकी बातें सुनकर प्रसन्न मनवाले उन मुनियोंने गन्ध, पुष्प तथा कुशसे मिश्रित शुद्ध जलसे परिपूर्ण विशाल घड़ोंसे महेश्वरको स्नान कराया और पुनः वे गूढ़ तथा हुंकारयुक्त सुन्दर स्वरोंसे महादेवजीका स्तुति-गान करने लगे॥ १४-१५॥
स्नापयन्ति महाकुम्भैरद्भिरेव महेश्वरम्।<br>गायन्ति विविधैर्गूढैर्हुङ्कारैश्चापि सुस्वरैः॥ १५
नमो देवाधिदेवाय महादेवाय वै नमः।<br>अर्धनारीशरीराय सांख्ययोगप्रवर्तिने॥ १६देवाधिदेव महादेवको नमस्कार है। अर्धनारीश्वर
श्रीलिंगमहापुराण · पृष्ठ 153, कुल 834 में से · BharatKosha