श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय २९ ] | देवदारुवनका वृत्तान्त... संन्यासधर्मका वर्णन | १३९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पुष्प आदिकी भाँति शिरोधार्य करके अतिथि-सत्कारमें प्रवृत्त हो गयी॥ ५१ १/२॥ | |
| धर्मो द्विजोत्तमो भूत्वा जगामाथ मुनेर्गृहम्।<br>तं दृष्ट्वा चार्चयामास सार्घाद्यैरनघा द्विजम्॥ ५३ | हे श्रेष्ठ द्विजो! उन दोनोंकी श्रद्धाकी परीक्षा करनेके लिये एक सुन्दर ब्राह्मणका रूप धारण करके साक्षात् धर्म मुनिके घर पधारे। उस ब्राह्मणको देखकर विशुद्ध हृदयवाली उस मुनिभार्याने अर्घ्य आदिसे उस ब्राह्मणका पूजन किया॥ ५२-५३॥ |
| सम्पूजितस्तया तां तु प्राह धर्मो द्विजः स्वयम्।<br>भद्रे कुतः पतिर्धीमांस्तव भर्ता सुदर्शनः॥ ५४<br>अन्नाद्यैरलमद्यार्यै स्वं दातुमिह चार्हसि।<br>सा च लज्जावृता नारी स्मरन्ती कथितं पुरा॥ ५५<br>भर्त्रा नमील्यनयने चचाल च पतिव्रता।<br>किं चैत्याह पुनस्तं वै धर्मे चक्रे च सा मतिम्॥ ५६ | उस स्त्रीके द्वारा भलीभाँति पूजित होकर ब्राह्मण-वेषधारी साक्षात् धर्मने उससे कहा—हे कल्याणि! तुम्हारे बुद्धिसम्पन्न पति सुदर्शन कहाँ हैं? तत्पश्चात् अपने पतिद्वारा कही गयी बातका स्मरण करती हुई उस स्त्रीने पतिकी आज्ञाको ध्यानमें रखकर धर्मरूप उस ब्राह्मणके लिये आतिथ्य-सेवा करनेका मनमें निश्चय किया॥ ५४-५६ १/२॥ |
| निवेदितुं किलात्मानं तस्मै पत्युरिहाज्ञया।<br>एतस्मिन्नन्तरे भर्ता तस्या नार्याः सुदर्शनः॥ ५७<br>गृहद्वारं गतो धीमांस्तामुवाच महामुनिः।<br>एहोहि क्व गता भद्रे तमुवाचातिथिः स्वयम्॥ ५८<br>भार्यया त्वनया सार्धं मैथुनस्थोऽहमद्य वै।<br>सुदर्शन महाभाग किंकर्तव्यमिहोच्यताम्॥ ५९<br>सुरतान्तस्तु विप्रेन्द्र सन्तुष्टोऽहं द्विजोत्तम।<br>सुदर्शनस्ततः प्राह सुप्रहृष्टो द्विजोत्तमः॥ ६० | इसी बीच उस स्त्रीके पति प्रज्ञासम्पन्न सुदर्शन घरके द्वारपर आ गये। मुनिवर सुदर्शनने अपनी भार्याको आवाज दी—हे भद्रे! तुम कहाँ चली गयी हो? तब साक्षात् धर्मरूप अतिथि उनसे बोले—हे महाभाग सुदर्शन! मैं इस समय तुम्हारी इस भार्याके आतिथ्यसे परम सन्तुष्ट हूँ॥ ५७-६० १/२॥ |
| भुङ्क्ष्व चैनां यथाकामं गमिष्येऽहं द्विजोत्तम।<br>हृष्टोऽथ दर्शयामास स्वात्मानं धर्मराट् स्वयम्॥ ६१<br>प्रददौ चेप्सितं सर्वं तमाह च महाद्युतिः।<br>एषा न भुक्ता विप्रेन्द्र मनसापि सुशोभना॥ ६२<br>मया चैषा न सन्देहः श्रद्धां ज्ञातुमिहागतः।<br>जितो वै यस्त्वया मृत्युर्धर्मेणैकेन सुव्रत॥ ६३ | तदनन्तर धर्मराजने अपना वास्तविक रूप उन्हें दिखाया और मनोवांछित वर देकर महान् कान्तिवाले धर्मने उनसे कहा—हे विप्रेन्द्र! मैं यहाँ केवल तुम्हारी श्रद्धाकी परीक्षा करनेके निमित्त आया हूँ। हे सुव्रत! तुमने अपने एकमात्र अतिथिपूजारूप धर्मसे मृत्यूतकको जीत लिया है॥ ६१-६३॥ |
| अहोऽस्य तपसो वीर्यमित्युक्त्वा प्रययौ च सः।<br>तस्मात्तथा पूजनीयाः सर्वे ह्यतिथयः सदा॥ ६४<br>बहुनात्र किमुक्तेन भाग्यहीना द्विजोत्तमाः।<br>तमेव शरणं तूर्णं गन्तुमर्हथ शङ्करम्॥ ६५ | 'अहो, इस तपस्वीका ऐसा ओज'—इस प्रकार कहकर धर्म वहाँसे चले गये। [हे मुनियो!] इसलिये सभी अतिथियोंकी सदा पूजा करनी चाहिये। हे अभागे मुनीश्वरो! अब अधिक कहनेसे क्या लाभ? तुम लोग शीघ्र ही उन्हीं महादेवकी शरणमें जाओ॥ ६४-६५॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणो ब्राह्मणर्षभाः।<br>ब्रह्माणमभिवन्द्यार्ताः प्रोचुराकुलितेक्षणाः॥ ६६ | उन ब्रह्माजीका वह वचन सुनकर व्याकुल नेत्रोंवाले वे द्विजश्रेष्ठ दुःखित होकर ब्रह्माजीसे प्रार्थना करते हुए कहने लगे॥ ६६॥ |
| ब्राह्मणा ऊचुः<br>नापेक्षितं महाभाग जीवितं विकृताः स्त्रियः।<br>दृष्टोऽस्माभिर्महादेवो निन्दितो यस्त्वनिन्दितः॥ ६७ | विप्रगण बोले—हे महाभाग! स्त्रियाँ तो विकार-युक्त होती ही हैं, जिनके लिये हमलोगोंने अपना जीवन |