श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 162, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 162
| १६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रद्धया च कृतं दिव्यं यच्छ्रुतं यच्च कीर्तितम्।<br>यदिष्टं तत्क्षमस्वेश नारायण नमोऽस्तु ते॥ १८ | रूपमें अधिष्ठित हैं। आप पुरुषोत्तम हैं और परम पूज्य हैं। आप देवेश्वरकी स्तुति मैं किस प्रकार करूँ? आपके विषयमें जैसा सुना तथा कहा गया है, उसी दिव्य भावको मैंने श्रद्धापूर्वक स्तुतिरूपमें कह दिया। हे ईश! हे नारायण! मेरी अभिलाषाके लिये मुझे क्षमा कीजिये। आपको नमस्कार है॥ १५-१८॥ |
| शैलादिरुवाच<br>इदं तु वैष्णवं स्तोत्रं सर्वपापप्रणाशनम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि क्षुपेण परिकीर्तितम्॥ १९<br><br>श्रावयेद्वा द्विजान् भक्त्या विष्णुलोकं स गच्छति॥ २० | नन्दीश्वर बोले— जो मनुष्य क्षुपके द्वारा की गयी सर्वपापनाशिनी इस विष्णु-स्तुतिको भक्तिपूर्वक पढ़ता है या सुनता है अथवा ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह विष्णु-लोकको प्राप्त होता है॥ १९-२०॥ |
| सम्पूज्य चैवं त्रिदशेश्वराद्यैः<br>स्तुत्वा स्तुतं देवमजेयमीशम्।<br>विज्ञापयामास निरीक्ष्य भक्त्या<br>जनार्दनाय प्रणिपत्य मूर्ध्ना॥ २१ | इस प्रकार इन्द्र आदिके द्वारा स्तुत किये जानेवाले अपराजेय परमेश्वर विष्णुकी भक्तिपूर्वक स्तुति करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम करके उनकी ओर कातर दृष्टिसे देखते हुए क्षुपने कहा॥ २१॥ |
| राजोवाच<br>भगवन् ब्राह्मणः कश्चिद्दधीच इति विश्रुतः।<br>धर्मवेत्ता विनीतात्मा सखा मम पुरातवत्॥ २२<br><br>अवध्यः सर्वदा सर्वैः शङ्करार्चनतत्परः।<br>सावज्ञं वामपादेन स मां मूर्ध्नि सदस्यथ॥ २३<br><br>ताडयामास देवेश विष्णो विश्वजगत्पते।<br>उवाच च मदाविष्टो न बिभेमीति सर्वतः॥ २४ | राजा बोले— हे भगवन्! दधीच नामसे लोकप्रसिद्ध एक धर्मज्ञ तथा विनीत आत्मावाले ब्राह्मण हैं, जो पहले मेरे मित्र थे। शिवजीकी आराधनामें सदा तत्पर रहनेके कारण उनकी कृपासे वे सभीसे अवध्य हैं। हे देवेश! हे विष्णो! हे जगत्पते! उन्होंने सभामें मेरा तिरस्कार करते हुए अपने बायें पैरसे मेरे सिरपर प्रहार कर दिया और उन मदोन्मत्तने कहा कि मैं किसीसे भी नहीं डरता हूँ॥ २२-२४॥ |
| जेतुमिच्छामि तं विप्रं दधीचं जगदीश्वर।<br>यथा हि तं तथा कर्तुं त्वमर्हसि जनार्दन॥ २५ | हे जगदीश्वर! मैं उन विप्र दधीचको जीतना चाहता हूँ। हे जनार्दन! मैं उन्हें जिस भी तरहसे जीत सकूँ; आप वैसा उपाय कीजिये॥ २५॥ |
| शैलादिरुवाच<br>ज्ञात्वा सोऽपि दधीचस्य ह्यवध्यत्वं महात्मनः।<br>सस्मार च महेशस्य प्रभावमतुलं हरिः॥ २६<br><br>एवं स्मृत्वा हरिः प्राह ब्रह्मणः क्षुतसम्भवम्।<br>विप्राणां नास्ति राजेन्द्र भयमेत्य महेश्वरम्॥ २७<br><br>विशेषाद्रुद्रभक्तानामभयं सर्वदा नृप।<br>नीचानामपि सर्वत्र दधीचस्यास्य किं पुनः॥ २८ | नन्दीश्वर बोले— इस प्रकार उन विष्णुने भी महात्मा दधीचके अवध्यत्वको जानकर तथा भगवान् शिवके अतुलित प्रभावका स्मरण करके ब्रह्माकी छींकसे उत्पन्न क्षुपसे कहा—हे राजेन्द्र! महेश्वरकी भक्तिको प्राप्त विप्रोंको किसी प्रकारका भय नहीं रहता। हे राजन्! विशेषरूपसे रुद्रके भक्त सर्वदा भयसे मुक्त रहते हैं, चाहे वे परम नीच ही क्यों न हों; फिर इन दधीचमुनिकी तो बात ही क्या?॥ २६-२८॥ |
| तस्मात्तव महाभाग विजयो नास्ति भूपते।<br>दुःखं करोमि विप्रस्य शापार्थं ससुरास्य मे॥ २९ | हे महाभाग! हे भूपते! अतः अब आपके विजयकी आशा नहीं है। देवताओंसहित अपनेको शापित होनेके |