भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ३६] राजा क्षुपद्वारा विष्णुकी आराधना, विष्णुद्वारा शिवभक्तोंकी महिमाका कथन १६१


लिये मैं अब विप्र दधीचको क्रोधित करूँगा॥ २९॥
भविता तस्य शापेन दक्षयज्ञे सुरैः समम्।<br>विनाशो मम राजेन्द्र पुनरुत्थानमेव च॥ ३०हे राजेन्द्र! उनके शापसे दक्षके यज्ञमें सभी देवताओंसहित मेरा विनाश होगा और पुनः उत्थान होगा॥ ३०॥
तस्मात्समेत्य विप्रेन्द्र सर्वयत्नेन भूपते।<br>करोमि यत्नं राजेन्द्र दधीचविजयाय ते॥ ३१हे भूपते! हे राजेन्द्र! समस्त देवताओंसहित मैं विप्रेन्द्र दधीचमुनिसे आपकी विजयके लिये पूरे मनसे प्रयास करूँगा॥ ३१॥
शैलादिरुवाच<br>श्रुत्वा वाक्यं क्षुपः प्राह तथास्त्विति जनार्दनम्।<br>भगवानपि विप्रस्य दधीचस्याश्रमं ययौ॥ ३२नन्दीश्वर बोले— भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर क्षुपने उनसे कहा—आप वैसा ही कीजिये। इधर भक्तवत्सल भगवान् विष्णु ब्राह्मणका रूप धारणकर दधीचमुनिके आश्रम पहुँचे। जगद्गुरु विष्णुने ब्रह्मर्षि दधीचको प्रणामकर उनसे कहा॥ ३२-३३॥
आस्थाय रूपं विप्रस्य भगवान् भक्तवत्सलः।<br>दधीचमाह ब्रह्मर्षिमभिवन्द्य जगद्गुरुः॥ ३३
श्रीभगवानुवाच<br>भो भो दधीच ब्रह्मर्षे भवार्चनरताव्यय।<br>वरमेकं वृणे त्वत्तस्तं भवान् दातुमर्हति॥ ३४श्रीभगवान् बोले— हे शिवाराधनमें तत्पर निर्विकार ब्रह्मर्षि दधीच! मैं आपसे एक वरकी याचना करता हूँ। आप मुझे वह वर देनेकी कृपा कीजिये॥ ३४॥
याचितो देवदेवेन दधीचः प्राह विष्णुना।<br>ज्ञातं तवेप्सितं सर्वं न बिभेमि तवाप्यहम्॥ ३५देवदेव विष्णुके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दधीचने कहा—मैं आपके सभी भावों तथा मनोरथोंको समझ गया हूँ। मुझे आपसे भी कोई भय नहीं है॥ ३५॥
भवान् विप्रस्य रूपेण आगतोऽसि जनार्दन।<br>भूतं भविष्यं देवेश वर्तमानं जनार्दन॥ ३६हे जनार्दन! आप यहाँ ब्राह्मणका रूप धारणकर आये हुए हैं। हे देवेश! हे जनार्दन! भगवान् शिवकी कृपासे मैं भूत, भविष्य तथा वर्तमान सब कुछ जानता हूँ। हे सुव्रत! आप यह विप्ररूप छोड़ दीजिये। हे देवेश! हे मधुसूदन! क्षुपने अपनी कार्य-सिद्धिके लिये आपकी आराधना की है॥ ३६-३७॥
ज्ञातं प्रसादाद् रुद्रस्य द्विजत्वं त्यज सुव्रत।<br>आराधितोऽसि देवेश क्षुपेण मधुसूदन॥ ३७
जाने तवैनां भगवन् भक्तवत्सलतां हरे।<br>स्थाने तवैषा भगवन् भक्तवात्सल्यता हरे॥ ३८हे भगवन्! हे हरे! आपकी यह भक्तवत्सलता मुझे पूर्ण रूपसे विदित है। हे भगवन्! हे हरे! आज यहाँ भी आपकी वही भक्तवत्सलता विद्यमान है॥ ३८॥
अस्ति चेद्भगवन् भीतिर्भवार्चनरतस्य मे।<br>वक्तुमर्हसि यत्नेन वरदाम्बुजलोचन॥ ३९हे भगवन्! हे वरदाता! हे कमलनयन! यदि आपका ऐसा भक्तवात्सल्य है तो आप सोच-समझकर यह बताइये कि मुझ शिवाराधनतत्पर व्यक्तिको आपसे क्या भय हो सकता है?॥ ३९॥
वदामि न मृषा तस्मान्न बिभेमि जनार्दन।<br>न बिभेमि जगत्यस्मिन् देवदैत्यद्विजादपि॥ ४०हे जनार्दन! मैं मिथ्या-भाषण नहीं करता; इसीलिये इस जगत्में देवता, दैत्य तथा ब्राह्मण किसीसे भी मैं भयभीत नहीं रहता हूँ॥ ४०॥
नन्द्युवाच<br>श्रुत्वा वाक्यं दधीचस्य तदास्थाय जनार्दनः।<br>स्वरूपं सस्मितं प्राह सन्त्यज्य द्विजतां क्षणात्॥ ४१नन्दी कहते हैं— [हे सनत्कुमार!] दधीचका वह
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