भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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| १७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

| वर्तयन्ति स्म तेभ्यस्तास्त्रेतायुगमुखे प्रजाः।<br>ततः कालेन महता तासामेव विपर्ययात्॥ २३ | गृहरूप बन जाते हैं। उन प्रजाओंकी सम्पूर्ण वृत्ति तथा उपभोग उन्हीं वृक्षोंपर आश्रित रहता है। इस प्रकार त्रेतायुगके आरम्भमें प्रजाएँ जीवनयापन-सम्बन्धी सभी व्यवहार उन्हीं वृक्षोंपर आश्रित होकर करती हैं॥ २०—२२^१/_२॥ | | रागलोभात्मको भावस्तदा ह्याकस्मिकोऽभवत्।<br>विपर्ययेण तासां तु तेन तत्कालभाविना॥ २४ | पश्चात् अधिक समय बीतनेपर उनके [बुद्धि]-विपर्ययसे उन प्रजाओंमें अकस्मात् राग तथा लोभसे युक्त भाव उत्पन्न हो जाते हैं॥ २३^१/_२॥ | | प्रणश्यन्ति ततः सर्वे वृक्षास्ते गृहसंज्ञिताः।<br>ततस्तेषु प्रणष्टेषु विभ्रान्ता मैथुनोद्भवाः॥ २५ | उन प्रजाओंमें उस समय उत्पन्न उस विपर्ययके कारण उनके गृहसंज्ञक सभी वृक्ष नष्ट हो जाते हैं॥ २४^१/_२॥ | | अपि ध्यायन्ति तां सिद्धिं सत्याभिध्यायिनस्तदा।<br>प्रादुर्बभूवुस्तासां तु वृक्षास्ते गृहसंज्ञिताः॥ २६ | तब उन वृक्षोंके नष्ट हो जानेपर मैथुनसे उत्पन्न वे प्रजाएँ भ्रमित हो जाती हैं। इसके बाद सत्यका चिन्तन करनेवाले वे प्रजागण उस सिद्धिका फिरसे ध्यान करते हैं॥ २५^१/_२॥ | | वस्त्राणि ते प्रसूयन्ते फलान्याभरणानि च।<br>तेष्वेव जायते तासां गन्धवर्णरसान्वितम्॥ २७ | इस प्रकार ध्यानके फलस्वरूप उनके गृहसंज्ञक वे वृक्ष फिरसे उत्पन्न हो जाते हैं। वे वृक्ष प्रजाओंके लिये वस्त्र, भूषण तथा नानाविध फल उत्पन्न करते हैं॥ २६^१/_२॥ | | अमाक्षिकं महावीर्यं पुटके पुटके मधु।<br>तेन ता वर्तयन्ति स्म सुखमायुः सदैव हि॥ २८ | उनके लिये उन वृक्षोंके पत्ते-पत्तेमें गन्ध-वर्ण-रससे युक्त, शक्तिवर्धक तथा अमाक्षिक (मक्षिकारहित) मधु पैदा होता है॥ २७^१/_२॥ | | हृष्टपुष्टास्तया सिद्ध्या प्रजा वै विगतज्वराः।<br>ततः कालान्तरेणैव पुनर्लोभावृतास्तु ताः॥ २९ | उसी मधुसे प्रजाएँ सुखपूर्वक सदा जीवनयापन करती हैं और वे उसी सिद्धिसे सन्तापरहित होकर सर्वदा हृष्ट-पुष्ट रहती हैं॥ २८^१/_२॥ | | वृक्षांस्तान् पर्यगृह्णन्ति मधु वा माक्षिकं बलात्।<br>तासां तेनोपचारेण पुनर्लोभकृतेन वै॥ ३० | तत्पश्चात् कालान्तरमें वे प्रजाएँ पुनः लोभके वशीभूत होकर बलपूर्वक उन वृक्षों अथवा माक्षिक मधुका हरण करती हैं॥ २९^१/_२॥ | | प्रणष्टा मधुना सार्धं कल्पवृक्षाः क्वचित्क्वचित्।<br>तस्यामेवाल्पशिष्टायां सिद्ध्यां कालवशात्तदा॥ ३१ | लोभमें पड़कर उनके द्वारा किये गये इस अनाचारपूर्ण कृत्यसे मधुके साथ-साथ कहीं-कहीं वे कल्पवृक्ष भी नष्ट हो जाते हैं॥ ३०^१/_२॥ | | आवर्तनात्तु त्रेतायां द्वन्द्वान्यभ्युत्थितानि वै।<br>शीतवर्षातपैस्तीव्रैस्ततस्ता दुःखिता भृशम्॥ ३२ | पुनः उस त्रेतामें कालयोगसे अवशिष्ट सिद्धियोंमें आवर्तन हो जानेसे द्वन्द्व उत्पन्न होने लगते हैं॥ ३१^१/_२॥ | | द्वन्द्वैः सम्पीज्यमानाश्च चक्रुरावरणानि तु।<br>कृतद्वन्द्वप्रतीघाताः केतनानि गिरौ ततः॥ ३३ | पुनः तीव्र शीत, वर्षा तथा आतपसे प्रजाएँ अत्यन्त दुःखित हो जाती हैं और इन द्वन्द्वोंसे पीड़ित प्रजाएँ अपने आवरणका उपाय करने लगती हैं॥ ३२^१/_२॥ |