भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ३९] सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन...विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन १७३


पूर्वं निकामचारास्ता ह्यनिकेता अथावसन्।<br>यथायोगं यथाप्रीति निकेतेष्ववसन् पुनः॥ ३४द्वन्द्वोंसे निरन्तर प्रतिहत प्रजाएँ पर्वतोंपर घर बनाने लगती हैं। इसलिये पूर्वमें स्वेच्छाचारितापूर्ण वे प्रजाएँ, जो बिना घरके रहती थीं, पुनः अपने अनुकूल तथा सुविधाजनक घरोंमें रहने लगती हैं॥ ३३-३४॥
कृत्वा द्वन्द्वोपघातांस्तान् वृत्त्युपायमचिन्तयन्।<br>नष्टेषु मधुना सार्धं कल्पवृक्षेषु वै तदा॥ ३५मधुके साथ उन कल्पवृक्षोंके भी नष्ट हो जानेपर पुनः उन द्वन्द्वोंके प्रति उपघात करती हुई वे प्रजाएँ जीविकोपार्जनका उपाय सोचने लगती हैं॥ ३५॥
विवादव्याकुलास्ता वै प्रजास्तृष्णाक्षुधार्दिताः।<br>ततः प्रादुर्बभौ तासां सिद्धिस्त्रेतायुगे पुनः॥ ३६वे प्रजाएँ पुनः जब विवादसे व्याकुल तथा भूख एवं प्याससे पीड़ित हो जाती हैं, तब त्रेतायुगमें उनमें सिद्धिका प्रादुर्भाव पुनः होता है॥ ३६॥
वार्तायाः साधिकाप्यन्या वृष्टिस्तासां निकामतः।<br>तासां वृष्ट्युदकादीनि ह्यभवन्निम्नगानि तु॥ ३७उनके लिये कृषि-कार्यको पूर्णतः सिद्ध करनेवाली दूसरी अन्य वृष्टि होती है। वृष्टिजनित वे जल आदि नदियोंके रूपमें परिवर्तित हो जाते हैं॥ ३७॥
अभवन् वृष्टिसन्तत्या स्रोतस्थानानि निम्नगाः।<br>एवं नद्यः प्रवृत्तास्तु द्वितीये वृष्टिसर्जने॥ ३८सतत वृष्टि होनेसे नदियाँ तथा जलके अन्य उद्गमस्थान हो गये। इस प्रकार दूसरे वृष्टि-सर्जनमें नदियोंका प्रादुर्भाव हो गया॥ ३८॥
ये पुनस्तदपां स्तोकाः पतिताः पृथिवीतले।<br>अपां भूमेश्च संयोगादोषध्यस्तास्तदाभवन्॥ ३९<br><br>अथाल्पकृष्टाश्चानुप्ता ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश।<br>ऋतुपुष्पफलाश्चैव वृक्षगुल्माश्च जज्ञिरे॥ ४०<br><br>प्रादुर्भूतानि चैतानि वृक्षजात्यौषधानि च।<br>तेनौषधेन वर्तन्ते प्रजास्त्रेतायुगे तदा॥ ४१इस प्रकार पृथवीतलपर जो जल-बिन्दु गिरे; उन जलों तथा भूमिके संयोगसे अल्प-कृष्ट एवं बिना बोये चौदह प्रकारकी वन्य तथा ग्राम्य (वन एवं ग्रामीण क्षेत्रोंमें उगनेवाली) औषधियाँ उत्पन्न हो गयीं। ऋतुसम्बन्धी विभिन्न पुष्प, फल, वृक्ष एवं पौधे उग गये। इस प्रकार ये विभिन्न जातिके वृक्ष तथा औषध उत्पन्न हो गये और उस त्रेतायुगमें प्रजाएँ उन्हीं औषधियोंसे ही अपना जीवन-निर्वाह करने लगीं॥ ३९—४१॥
ततः पुनरभूत्तासां रागो लोभश्च सर्वशः।<br>अवश्यं भाविनाथेन त्रेतायुगवशेन च॥ ४२<br><br>ततस्ताः पर्यगृह्णन्त नदीक्षेत्राणि पर्वतान्।<br>वृक्षगुल्मौषधीश्चैव प्रसह्य तु यथाबलम्॥ ४३<br><br>विपर्ययेण चौषध्यः प्रनष्टास्ताश्चतुर्दश।<br>मत्वा धरां प्रविष्टास्ता इत्यौषध्यः पितामहः॥ ४४इसके बाद उन प्रजाओंमें हर प्रकारसे राग तथा लोभका उदय हुआ और त्रेतायुगके प्रभावसे होनेवाली अवश्यम्भाविताके कारण वे प्रजाएँ नदीक्षेत्रों तथा पर्वतोंका अतिक्रमण करने लगीं और वृक्ष, गुल्मों एवं औषधियोंका बलपूर्वक पुनः हरण करने लगीं। उनके इस विपरीत आचरणसे चौदहों प्रकारकी औषधियाँ विनष्ट हो गयीं॥ ४२-४३ १/२॥
दुदोह गां प्रयत्नेन सर्वभूतहिताय वै।<br>तदाप्रभृति चौषध्यः फालकृष्टास्त्वितस्ततः॥ ४५अब वे औषधियाँ पृथ्वीमें समा गयीं—ऐसा मानकर भगवान् विष्णुने राजा पृथुके रूपमें होकर सभी प्राणियोंके कल्याणार्थ पृथ्वीरूप गायका दोहन किया। उसी समयसे हलके फालसे जुती हुई भूमिमें यहाँ-वहाँ