श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ३९] सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन...विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन १७३
| पूर्वं निकामचारास्ता ह्यनिकेता अथावसन्।<br>यथायोगं यथाप्रीति निकेतेष्ववसन् पुनः॥ ३४ | द्वन्द्वोंसे निरन्तर प्रतिहत प्रजाएँ पर्वतोंपर घर बनाने लगती हैं। इसलिये पूर्वमें स्वेच्छाचारितापूर्ण वे प्रजाएँ, जो बिना घरके रहती थीं, पुनः अपने अनुकूल तथा सुविधाजनक घरोंमें रहने लगती हैं॥ ३३-३४॥ |
| कृत्वा द्वन्द्वोपघातांस्तान् वृत्त्युपायमचिन्तयन्।<br>नष्टेषु मधुना सार्धं कल्पवृक्षेषु वै तदा॥ ३५ | मधुके साथ उन कल्पवृक्षोंके भी नष्ट हो जानेपर पुनः उन द्वन्द्वोंके प्रति उपघात करती हुई वे प्रजाएँ जीविकोपार्जनका उपाय सोचने लगती हैं॥ ३५॥ |
| विवादव्याकुलास्ता वै प्रजास्तृष्णाक्षुधार्दिताः।<br>ततः प्रादुर्बभौ तासां सिद्धिस्त्रेतायुगे पुनः॥ ३६ | वे प्रजाएँ पुनः जब विवादसे व्याकुल तथा भूख एवं प्याससे पीड़ित हो जाती हैं, तब त्रेतायुगमें उनमें सिद्धिका प्रादुर्भाव पुनः होता है॥ ३६॥ |
| वार्तायाः साधिकाप्यन्या वृष्टिस्तासां निकामतः।<br>तासां वृष्ट्युदकादीनि ह्यभवन्निम्नगानि तु॥ ३७ | उनके लिये कृषि-कार्यको पूर्णतः सिद्ध करनेवाली दूसरी अन्य वृष्टि होती है। वृष्टिजनित वे जल आदि नदियोंके रूपमें परिवर्तित हो जाते हैं॥ ३७॥ |
| अभवन् वृष्टिसन्तत्या स्रोतस्थानानि निम्नगाः।<br>एवं नद्यः प्रवृत्तास्तु द्वितीये वृष्टिसर्जने॥ ३८ | सतत वृष्टि होनेसे नदियाँ तथा जलके अन्य उद्गमस्थान हो गये। इस प्रकार दूसरे वृष्टि-सर्जनमें नदियोंका प्रादुर्भाव हो गया॥ ३८॥ |
| ये पुनस्तदपां स्तोकाः पतिताः पृथिवीतले।<br>अपां भूमेश्च संयोगादोषध्यस्तास्तदाभवन्॥ ३९<br><br>अथाल्पकृष्टाश्चानुप्ता ग्राम्यारण्याश्चतुर्दश।<br>ऋतुपुष्पफलाश्चैव वृक्षगुल्माश्च जज्ञिरे॥ ४०<br><br>प्रादुर्भूतानि चैतानि वृक्षजात्यौषधानि च।<br>तेनौषधेन वर्तन्ते प्रजास्त्रेतायुगे तदा॥ ४१ | इस प्रकार पृथवीतलपर जो जल-बिन्दु गिरे; उन जलों तथा भूमिके संयोगसे अल्प-कृष्ट एवं बिना बोये चौदह प्रकारकी वन्य तथा ग्राम्य (वन एवं ग्रामीण क्षेत्रोंमें उगनेवाली) औषधियाँ उत्पन्न हो गयीं। ऋतुसम्बन्धी विभिन्न पुष्प, फल, वृक्ष एवं पौधे उग गये। इस प्रकार ये विभिन्न जातिके वृक्ष तथा औषध उत्पन्न हो गये और उस त्रेतायुगमें प्रजाएँ उन्हीं औषधियोंसे ही अपना जीवन-निर्वाह करने लगीं॥ ३९—४१॥ |
| ततः पुनरभूत्तासां रागो लोभश्च सर्वशः।<br>अवश्यं भाविनाथेन त्रेतायुगवशेन च॥ ४२<br><br>ततस्ताः पर्यगृह्णन्त नदीक्षेत्राणि पर्वतान्।<br>वृक्षगुल्मौषधीश्चैव प्रसह्य तु यथाबलम्॥ ४३<br><br>विपर्ययेण चौषध्यः प्रनष्टास्ताश्चतुर्दश।<br>मत्वा धरां प्रविष्टास्ता इत्यौषध्यः पितामहः॥ ४४ | इसके बाद उन प्रजाओंमें हर प्रकारसे राग तथा लोभका उदय हुआ और त्रेतायुगके प्रभावसे होनेवाली अवश्यम्भाविताके कारण वे प्रजाएँ नदीक्षेत्रों तथा पर्वतोंका अतिक्रमण करने लगीं और वृक्ष, गुल्मों एवं औषधियोंका बलपूर्वक पुनः हरण करने लगीं। उनके इस विपरीत आचरणसे चौदहों प्रकारकी औषधियाँ विनष्ट हो गयीं॥ ४२-४३ १/२॥ |
| दुदोह गां प्रयत्नेन सर्वभूतहिताय वै।<br>तदाप्रभृति चौषध्यः फालकृष्टास्त्वितस्ततः॥ ४५ | अब वे औषधियाँ पृथ्वीमें समा गयीं—ऐसा मानकर भगवान् विष्णुने राजा पृथुके रूपमें होकर सभी प्राणियोंके कल्याणार्थ पृथ्वीरूप गायका दोहन किया। उसी समयसे हलके फालसे जुती हुई भूमिमें यहाँ-वहाँ |
| १७४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| औषधियाँ उत्पन्न होने लगीं ॥ ४४-४५ ॥ | |
|---|---|
| वार्ता कृषिं समायाता वर्तुकामाः प्रयत्नतः ।<br>वार्तावृत्तिः समाख्याता कृषिकामप्रयत्नतः ॥ ४६ | इस तरह अब जीनेकी इच्छा रखनेवाली प्रजाएँ प्रयत्नपूर्वक कृषि कार्य करने लग गयीं। कृषिमें प्रयत्नपूर्वक इच्छा रखनेके कारण इसे 'वार्तावृत्ति' कहा गया ॥ ४६ ॥ |
| अन्यथा जीवितं तासां नास्ति त्रेतायुगात्यये ।<br>हस्तोद्भवा ह्यापश्चैव भवन्ति बहुशस्तदा ॥ ४७ | त्रेतायुगके उस अन्तिम कालमें इस कृषिको छोड़कर आजीविकाका कोई अन्य उपाय नहीं था। उस समय [खनित्र आदिके उपयोग बिना ही] हाथसे ही खोदकर पर्याप्त जल प्राप्त हो जाता था ॥ ४७ ॥ |
| तत्रापि जगृहुः सर्वे चान्योन्यं क्रोधमूर्च्छिताः ।<br>सुतदारधनाद्यांस्तु बलाद्युगबलेन तु ॥ ४८ | उस समय सभी लोग युग-प्रभावके कारण क्रोधके वशीभूत होकर बलपूर्वक एक-दूसरेके पुत्र, स्त्री, धन आदिका हरण कर लेते थे ॥ ४८ ॥ |
| मर्यादायाः प्रतिष्ठार्थं ज्ञात्वा तदखिलं विभुः ।<br>ससर्ज क्षत्रियांस्त्रातुं क्षतात्कमलसम्भवः ॥ ४९ | वह सम्पूर्ण स्थिति देखकर मर्यादाकी प्रतिष्ठा करनेके लिये तथा दुःखसे रक्षा करनेके लिये भगवान् कमलयोनिने क्षत्रियोंकी उत्पत्ति की ॥ ४९ ॥ |
| वर्णाश्रमप्रतिष्ठां च चकार स्वेन तेजसा ।<br>वृत्तेन वृत्तिना वृत्तं विश्वात्मा निर्ममे स्वयम् ॥ ५० | विश्वात्मा भगवान्ने अपने तेजसे वर्णाश्रम-व्यवस्था स्थापित की तथा उन्होंने स्वधर्मानुसार जीविकाद्वारा जीवनका निर्माण (परिपालन) स्वयं किया ॥ ५० ॥ |
| यज्ञप्रवर्तनं चैव त्रेतायामभवत्क्रमात् ।<br>पशुयज्ञं न सेवन्ते केचित्तत्रापि सुव्रताः ॥ ५१ | इसी प्रकार त्रेतायुगमें क्रमसे यज्ञ-अनुष्ठान आदि आरम्भ हुआ। सभीकी व्रतोंमें निष्ठा थी तथा कोई भी मनुष्य पशु-यज्ञ नहीं करते थे ॥ ५१ ॥ |
| बलाद्विष्णुस्तदा यज्ञमकरोत्सर्वदृक् क्रमात् ।<br>द्विजास्तदा प्रशंसन्ति ततस्त्वहिंसकं मुने ॥ ५२ | उस समय व्यापक दृष्टिवाले भगवान् विष्णुने अपने सामर्थ्यसे क्रमपूर्वक यज्ञ सम्पन्न किये। हे मुने! उस समय द्विज लोग हिंसा न करनेवालेकी प्रशंसा करते थे ॥ ५२ ॥ |
| द्वापरेष्वपि वर्तन्ते मतिभेदास्तदा नृणाम् ।<br>मनसा कर्मणा वाचा कृच्छाद्वार्ता प्रसिध्यति ॥ ५३ | द्वापरमें भी लोगोंमें मन-वचन-कर्मसे बुद्धि-भेद उत्पन्न होते हैं। कष्टपूर्वक कृषिकार्य भी सम्पन्न होते हैं ॥ ५३ ॥ |
| तदा तु सर्वभूतानां कायक्लेशवशात्क्रमात् ।<br>लोभो भृतिर्वणिग्युद्धं तत्त्वानामविनिश्चयः ॥ ५४ | उस समय शारीरिक क्लेशवश सभी लोगोंमें लोभ, भृति, वाणिज्य कर्मोंमें विवाद तथा चित्त-कालुष्यके कारण यथार्थ वस्तुओंके प्रति सन्देह उत्पन्न होने लगता है ॥ ५४ ॥ |
| वेदशाखाप्रणयनं धर्माणां सङ्करस्तथा ।<br>वर्णाश्रमपरिध्वंसः कामद्वेषौ तथैव च ॥ ५५ | उस समय शाखाओंके रूपमें वेदोंका विभाग होता है तथा धर्मोंके संकर अर्थात् अन्य धर्मकी प्रवृत्ति होने लगती है। उस द्वापरमें ब्राह्मण आदि वर्णों एवं |
अध्याय ३९] सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन⋯विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन १७५
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| द्वापरे तु प्रवर्तन्ते रागो लोभो मदस्तथा।<br>वेदो व्यासैश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु ॥ ५६<br><br>एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतास्विह विधीयते।<br>सङ्क्षयादायुषश्चैव व्यस्यते द्वापरेषु सः ॥ ५७ | ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंका लगभग विनाश हो जाता है। लोगोंमें वासना, द्वेष, राग, लोभ तथा मद प्रवृत्त हो जाते हैं। द्वापर आदि कालोंमें व्यासोंके द्वारा एक वेद चार भागोंमें विभक्त किया जाता है। ऋक् आदि चार पादोंसे युक्त एक वेद-संहिताका इस भूलोकमें त्रेता आदि कालोंमें अध्ययन किया जाता है; वही वेद द्वापर आदि कालोंमें आयुसंख्याके कारण विभाजित कर दिया जाता है॥ ५५-५७॥ |
| ऋषिपुत्रैः पुनर्भेदा भिद्यन्ते दृष्टिविभ्रमैः।<br>मन्त्रब्राह्मणविन्यासैः स्वरवर्णविपर्ययैः ॥ ५८<br><br>संहिता ऋग्यजुःसाम्नां संहन्यन्ते मनीषिभिः।<br>सामान्या वैकृताश्चैव दृष्टिभिस्तैः पृथक्पृथक् ॥ ५९ | इसके आगे ऋषिपुत्रोंके द्वारा अपनी दृष्टिसे विभाजन पुनः किया जाता है। दृष्टिविभ्रम (अलग-अलग विचार रखनेवाले) मनीषियोंने समानरूपसे विभाजित की गयी ऋक्, यजुः तथा साम नामक संहिताओंको स्वर-वर्णोंके भेदसे मन्त्र और ब्राह्मणभागके स्वरूपमें पुनः अलग-अलग विभाजित किया॥ ५८-५९॥ |
| ब्राह्मणं कल्पसूत्राणि मन्त्रप्रवचनानि च।<br>अन्ये तु प्रस्थितास्तान् वै केचित्तान् प्रत्यवस्थिताः ॥ ६० | इस प्रकार मनीषियोंने ब्राह्मणभाग, कल्पसूत्र तथा मीमांसा-न्यायके सूत्रोंकी रचना की। कुछ मनीषी इतने विभाजनको पर्याप्त मानकर इसीपर स्थिरमति हो गये, किंतु अन्य मनीषी इस विभाजनको न्यून मानकर इसके विस्तारमें प्रवृत्त हुए॥ ६०॥ |
| इतिहासपुराणानि भिद्यन्ते कालगौरवात्।<br>ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा ॥ ६१<br><br>भविष्यं नारदीयं च मार्कण्डेयमतः परम्।<br>आग्नेयं ब्रह्मवैवर्तं लैङ्गं वाराहमेव च ॥ ६२<br><br>वामनाख्यं ततः कूर्मं मात्स्यं गारुडमेव च।<br>स्कान्दं तथा च ब्रह्माण्डं तेषां भेदः प्रकथ्यते ॥ ६३ | अनेक कल्पोंके भेदसे इतिहास, पुराण आदिके भी विशिष्ट भेद होते हैं। ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, भागवतपुराण, भविष्यपुराण, नारदपुराण, मार्कण्डेयपुराण, अग्निपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, लिङ्गपुराण, वाराहपुराण, वामनपुराण, कूर्मपुराण, मत्स्यपुराण, गरुड़पुराण, स्कन्दपुराण तथा ब्रह्माण्डपुराण—ये उन पुराणोंके भेद कहे जाते हैं। इनमें ग्यारहवाँ पवित्र लिङ्गपुराण द्वापरमें विभक्त किया गया है॥ ६१—६३ १/२ ॥ |
| लैङ्गमेकादशविधं प्रभिन्नं द्वापरे शुभम्।<br>मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः ॥ ६४<br><br>यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती।<br>पाराशरव्यासशङ्खलिखिता दक्षगौतमौ ॥ ६५<br><br>शातातपो वसिष्ठश्च एवमाद्यैः सहस्रशः। | मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप तथा वसिष्ठ आदि बहुत-से मुनि धर्मशास्त्रोंका विस्तार करनेवाले हैं॥ ६४—६५ १/२ ॥ |
| अवृष्टिर्मरणं चैव तथा व्याध्याद्युपद्रवाः ॥ ६६<br><br>वाङ्मनःकर्मजैर्दुःखैर्निर्वेदो जायते ततः।<br>निर्वेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षविचारणा ॥ ६७ | अवृष्टि, अकालमरण, रोग, विघ्न एवं मन-वचन-कर्मजनित दुःखोंसे निर्वेद उत्पन्न होता है। निर्वेदसे उन प्रजाओंके मनमें दुःखोंसे छूटनेका विचार |
४०- कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास तथा स्वल्प भी धर्माचरणका महत्फल एवं कलियुगके अन्तमें पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति
| १७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| विचारणाच्च वैराग्यं वैराग्याद्दोषदर्शनम्।<br>दोषाणां दर्शनाच्चैव द्वापरे ज्ञानसम्भवः ॥ ६८ | पैदा होता है। उस विचारसे वैराग्य तथा वैराग्यसे सांसारिक क्रियाकलापोंमें दोष दिखायी देने लगते हैं और उन दोषोंके दर्शनसे द्वापरमें ज्ञान उत्पन्न हो जाता है॥ ६६—६८॥ | | एषा रजस्तमोयुक्ता वृत्तिर्वै द्वापरे स्मृता।<br>आद्ये कृते तु धर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रवर्तते ॥ ६९<br>द्वापरे व्याकुलीभूत्वा प्रणश्यति कलौ युगे॥ ७० | द्वापरमें रजोगुण तथा तमोगुणसे युक्त इस प्रकारकी वृत्ति कही गयी है। आदि सत्ययुगमें एकमात्र धर्म ही सर्वत्र रहता है, वह त्रेतामें प्रेरणासे प्रवृत्त होता है वह धर्म द्वापरमें व्याकुल होकर स्थित रहता है तथा फिर कलियुगमें नष्ट हो जाता है॥ ६९-७०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे 'चतुर्युगधर्माणां वर्णनं' नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'चतुर्युगधर्मवर्णन' नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३९॥
चालीसावाँ अध्याय
कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास तथा स्वल्प भी धर्माचरणका महत्फल एवं कलियुगके अन्तमें पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति
| शक्र उवाच | इन्द्र बोले— |
|---|---|
| तिष्ये मायामसूयां च वधं चैव तपस्विनाम्।<br>साधयन्ति नरास्तत्र तमसा व्याकुलेन्द्रियाः ॥ १ | [हे शिलाद!] कलियुगमें तमोगुणसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले मनुष्य माया रचेंगे, दूसरोंका दोष देखेंगे तथा तपस्वियोंका वध करेंगे॥ १॥ |
| कलौ प्रमादको रोगः सततं क्षुद्भयानि च।<br>अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः ॥ २ | कलियुगमें प्रमाद, रोग, निरन्तर क्षुधाका भय, अनावृष्टिरूप घोर भय तथा देशोंका विपर्यय (विनाश)—ये सब होंगे॥ २॥ |
| न प्रामाण्यं श्रुतेरस्ति नृणां चाधर्मसेवनम्।<br>अधार्मिकास्त्वनाचारा महाकोपाल्पचेतसः ॥ ३ | लोग वेदोंकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं करेंगे तथा अधर्मका आचरण करेंगे। मनुष्य धर्मच्युत होकर अनाचारमें रत रहेंगे और महान् क्रोधी तथा मन्द बुद्धिवाले होंगे॥ ३॥ |
| अनृतं ब्रुवते लुब्धास्तिष्ये जाताश्च दुष्प्रजाः।<br>दुरिष्टैर्दुरधीतैश्च दुराचारैर्दुरागमैः॥ ४<br>विप्राणां कर्मदोषेण प्रजानां जायते भयम्।<br>नाधीयन्ते तदा वेदान्न यजन्ति द्विजातयः ॥ ५ | कलियुगमें प्रजाएँ मिथ्या भाषण करेंगी, लोभ-परायण होंगी तथा मलिन आचार-विचारवाली होंगी। ब्राह्मणोंके दूषित यज्ञ, दूषित पठन, दूषित आचार एवं दूषित शास्त्रोंके सेवनरूपी कर्मदोषसे प्रजाओंमें भय उत्पन्न होगा। द्विजातिगण न तो वेदोंका अध्ययन करेंगे और न तो यज्ञ-अनुष्ठान करेंगे॥ ४-५॥ |
| उत्सीदन्ति नराश्चैव क्षत्रियाश्च विशः क्रमात्।<br>शूद्राणां मन्त्रयोगेन सम्बन्धो ब्राह्मणैः सह ॥ ६<br>भवतीह कलौ तस्मिन् शयनासनभोजनैः।<br>राजानः शूद्रभूयिष्ठा ब्राह्मणान् बाधयन्ति ते ॥ ७ | क्षत्रिय, वैश्य आदि सभी मनुष्य क्रमशः विनष्ट हो जायँगे। कलियुगमें ब्राह्मण लोग शूद्रोंको मन्त्रोपदेश देंगे तथा उनके साथ शयन, आसन, भोजन आदिका व्यवहार |
अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास...पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| करके उनसे सम्बन्ध बनायेंगे। राजा लोग शूद्रवत् आचरण करते हुए ब्राह्मणोंको सन्ताप देंगे॥ ६-७॥ | |
| भ्रूणहत्या वीरहत्या प्रजायन्ते प्रजासु वै।<br>शूद्राश्च ब्राह्मणाचाराः शूद्राचाराश्च ब्राह्मणाः॥ ८ | प्रजाओंमें भ्रूणहत्या तथा वीरोंकी हत्याकी प्रवृत्ति व्याप्त रहेगी। शूद्र लोग ब्राह्मणोंका आचरण करेंगे एवं ब्राह्मण शूद्रोंका आचरण करेंगे॥ ८॥ |
| राजवृत्तिस्थिताश्चौराश्चौराचाराश्च पार्थिवाः।<br>एकपत्न्यो न शिष्यन्ति वर्धिष्यन्त्यभिसारिकाः॥ ९ | चोर लोग राजाओंके तुल्य व्यवहार करेंगे और राजा लोग चोरों-जैसा व्यवहार करेंगे। स्त्रियाँ पातिव्रत्य धर्मका पालन नहीं करेंगी और व्यभिचारिणी स्त्रियोंका बाहुल्य होगा॥ ९॥ |
| वर्णाश्रमप्रतिष्ठा नो जायते नृषु सर्वतः।<br>तदा स्वल्पफला भूमिः क्वचिच्चापि महाफला॥ १० | मनुष्योंमें वर्ण तथा आश्रमसम्बन्धी समस्त व्यवहार समाप्त हो जायगा। उस समय पृथ्वी कहीं कम और कहीं अधिक फल देनेवाली होगी॥ १०॥ |
| अरक्षितारो हर्तारः पार्थिवाश्च शिलाशन।<br>शूद्रा वै ज्ञानिनः सर्वे ब्राह्मणैरभिवन्दिताः॥ ११ | हे शिलाद! राजागण प्रजाओंके रक्षक न होकर उनके विनाशक हो जायेंगे। सभी शूद्र ज्ञानी बनकर ब्राह्मणोंसे वन्दित होंगे॥ ११॥ |
| अक्षत्रियाश्च राजानो विप्राः शूद्रोपजीविनः।<br>आसनस्था द्विजान् दृष्ट्वा न चलन्त्यल्पबुद्धयः॥ १२<br><br>ताडयन्ति द्विजेन्द्रांश्च शूद्रा वै स्वल्पबुद्धयः।<br>आस्ये निधाय वै हस्तं कर्णं शूद्रस्य वै द्विजाः॥ १३<br><br>नीचस्येव तदा वाक्यं वदन्ति विनयेन तम्। | क्षत्रियसे इतर वर्णवाले राजा होंगे, ब्राह्मण आजीविकाके लिये शूद्रोंपर निर्भर रहेंगे और अल्प बुद्धिवाले वे शूद्र ब्राह्मणोंको देखकर अपने आसनसे नहीं उठेंगे। स्वल्प बुद्धिवाले शूद्र श्रेष्ठ द्विजोंको भी दण्डित (अपमानित) करेंगे। द्विज अपने मुखपर हाथ रखकर शूद्रके कानमें विनयपूर्वक नीच व्यक्तिके समान वाक्य बोलेंगे॥ १२-१३ १/२ ॥ |
| उच्चासनस्थान् शूद्रांश्च द्विजमध्ये द्विजर्षभ॥ १४<br><br>ज्ञात्वा न हिंसते राजा कलौ कालवशेन तु।<br>पुष्पैश्च वासितैश्चैव तथान्यैर्मङ्गलैः शुभैः॥ १५<br><br>शूद्रानभ्यर्चयन्त्यल्पश्रुतभाग्यबलान्विताः।<br>न प्रेक्षन्ते गर्विताश्च शूद्रा द्विजवरान् द्विज॥ १६ | हे द्विजश्रेष्ठ! कलियुगमें कालके वशमें होकर राजा ब्राह्मणोंके बीच उच्च आसनपर बैठे हुए शूद्रको देखकर उसे दण्डित नहीं करेंगे। वे पुष्पों, सुगन्धित पदार्थों तथा अन्य मंगल-द्रव्योंसे शूद्रोंकी पूजा करेंगे। हे द्विज! अल्प शास्त्र-ज्ञान, खोटे भाग्य एवं बलसे युक्त शूद्र लोग गर्वित होकर श्रेष्ठसे श्रेष्ठ द्विजोंकी ओर देखनातक पसन्द नहीं करेंगे॥ १४-१६॥ |
| सेवावसरमालोक्य द्वारे तिष्ठन्ति वै द्विजाः।<br>वाहनस्थान् समावृत्य शूद्रान् शूद्रोपजीविनः॥ १७<br><br>सेवन्ते ब्राह्मणास्तत्र स्तुवन्ति स्तुतिभिः कलौ।<br>तपोयज्ञफलानां च विक्रेतारो द्विजोत्तमाः॥ १८ | अपनी आजीविकाके लिये शूद्रोंपर आश्रित रहनेवाले ब्राह्मण सेवाका अवसर देखकर वाहनोंपर स्थित शूद्रोंको घेरकर उनके द्वारपर खड़े होकर उनकी सेवा करेंगे। कलियुगमें ब्राह्मण अनेकविध स्तुतियोंसे शूद्रोंका स्तवन करेंगे। उस समय उत्तम विप्रगण अपने तपों तथा यज्ञोंके फलका विक्रय करेंगे॥ १७-१८॥ |
| १७८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यतयश्च भविष्यन्ति बहवोऽस्मिन् कलौ युगे।<br>पुरुषाल्पं बहुस्त्रीकं युगान्ते समुपस्थिते॥ १९ | उस कलियुगमें बहुत लोग संन्यासीका रूप धारण कर लेंगे। उस युगान्तके उपस्थित होनेपर पुरुष तो कम होंगे, किंतु स्त्रियाँ अधिक होंगी। कलियुगमें ब्राह्मण वेद-विद्या तथा वैदिक कर्मोंकी निन्दा करेंगे॥ १९½॥ |
| निन्दन्ति वेदविद्यां च द्विजाः कर्माणि वै कलौ।<br>कलौ देवो महादेवः शङ्करो नीललोहितः॥ २० | तब उस कलियुगमें नीललोहित महादेव शिव धर्मकी प्रतिष्ठाके लिये अपनी विकृत आकृति अर्थात् उच्छिन्नभिन्न लिङ्गस्वरूपवाले होकर प्रकट होंगे॥ २०½॥ |
| प्रकाशते प्रतिष्ठार्थं धर्मस्य विकृताकृतिः।<br>ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केनापि शङ्करम्॥ २१ | उस समय जो विप्रगण जिस किसी भी तरहसे उन विकृत वेषवाले शिवकी आराधना करेंगे, वे कलियुगके दोषोंपर विजय प्राप्तकर परमपदको प्राप्त होंगे॥ २१½॥ |
| कलिदोषान् विनिर्जित्य प्रयान्ति परमं पदम्।<br>श्वापदप्रबलत्वं च गवां चैव परिक्षयः॥ २२ | उस कलियुगके अन्तमें हिंसक पशुओंकी प्रबलता तथा गायोंका ह्रास होगा और उत्तम साधुओंका अभाव हो जायगा॥ २२½॥ |
| साधूनां विनिवृत्तिश्च वेद्या तस्मिन् युगक्षये।<br>तदा सूक्ष्मो महोदर्को दुर्लभो दानमूलवान्॥ २३ | उस समय दानके मूलवाला सूक्ष्म ऐश्वर्यका रूप भी दुर्लभ हो जायगा, ब्रह्मचर्य आदि चारों आश्रमोंकी शिथिलता हो जानेपर धर्म विनष्ट हो जायगा॥ २३½॥ |
| चातुराश्रमशैथिल्ये धर्मः प्रतिचलिष्यति।<br>अरक्षितारो हर्तारो बलिभागस्य पार्थिवाः॥ २४ | उस युगान्तमें राजा लोग प्रजाजनोंकी रक्षा न करके मात्र अपनी रक्षामें तत्पर रहेंगे और बलिभाग [कर]-के हर्ता बन जायँगे॥ २४½॥ |
| युगान्तेषु भविष्यन्ति स्वरक्षणपरायणाः।<br>अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः॥ २५<br><br>प्रमदाः केशशूलिन्यो भविष्यन्ति कलौ युगे।<br>चित्रवर्षी तदा देवो यदा प्राहुर्युगक्षयम्॥ २६ | कलियुगमें समस्त प्राणी अन्न तथा कन्याओंका विक्रय करनेवाले एवं ब्राह्मण वेद बेचनेवाले होंगे और स्त्रियाँ व्यभिचारपरायण हो जायँगी। जब युगक्षय होता है, उस समय वर्षाके देवता इन्द्र कहीं-कहींपर वृष्टि करनेवाले कहे जाते हैं॥ २५-२६॥ |
| सर्वे वणिग्जनाश्चापि भविष्यन्त्यधमे युगे।<br>कुशीलचर्याः पाखण्डैर्वृथारूपैः समावृताः॥ २७ | उस अधम कलियुगमें सभी वणिक् जन भी कुत्सित आचरणवाले, दम्भ करनेवाले तथा पाखण्डी अर्थात् अवैदिक मार्गोंपर चलनेवाले होंगे॥ २७॥ |
| बहुयाजनको लोको भविष्यति परस्परम्।<br>नाव्याहृतक्रूरवाक्यो नार्जवी नानसूयकः॥ २८<br><br>न कृते प्रतिकर्ता च युगक्षीणे भविष्यति।<br>निन्दकाश्चैव पतिता युगान्तस्य च लक्षणम्॥ २९ | कलियुगमें सभी लोग ग्रामयाजक (पात्र-अपात्रका विचार किये बिना सबका यज्ञ आदि करानेवाले) हो जायँगे। कोई भी मृदु वचन बोलनेवाला, सरल स्वभाववाला, ईर्ष्यारहित तथा प्रत्युपकारी अर्थात् अपने लिये किये गये उपकारको माननेवाला नहीं होगा और सभी लोग निन्दक एवं पतित हो जायँगे। यह सब युगान्त कलियुगका लक्षण है॥ २८-२९॥ |
अध्याय ४०] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास...पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १७९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नृपशून्या वसुमती न च धान्यधनावृता।<br>मण्डलानि भविष्यन्ति देशेषु नगरेषु च॥ ३० | पृथ्वी राजाओंसे शून्य हो जायगी तथा धन-धान्यसे परिपूर्ण नहीं रहेगी। देशों और नगरोंमें बहुत-से स्थान जनशून्य हो जायँगे॥ ३०॥ |
| अल्पोदका चाल्पफला भविष्यति वसुन्धरा।<br>गोप्तारश्चाप्यगोप्तारः सम्भविष्यन्त्यशासनाः॥ ३१ | पृथ्वी अल्प जलवाली तथा कम फल देनेवाली होगी। रक्षक ही भक्षक बन जायँगे एवं लोग स्वेच्छाचारी हो जायँगे॥ ३१॥ |
| हर्तारः परवित्तानां परदारप्रधर्षकाः।<br>कामात्मानो दुरात्मानो ह्यधमाः साहसप्रियाः॥ ३२<br><br>प्रनष्टचेष्टनाः पुंसो मुक्तकेशाश्च शूलिनः।<br>जनाः षोडशवर्षाश्च प्रजायन्ते युगक्षये॥ ३३ | युगान्त कलियुगमें सभी लोग दूसरोंके धनका हरण करनेवाले, परस्त्रीगमन करनेवाले, कामी, दुरात्मा, अधम, दुस्साहसी, उद्योगरहित, लज्जारहित, रोगी तथा सोलह वर्षकी परम आयुवाले होंगे॥ ३२-३३॥ |
| शुक्लदन्ताजिनाक्षाश्च मुण्डाः काषायवाससः।<br>शूद्रा धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते॥ ३४ | कलियुगके उपस्थित होनेपर शूद्रगण [निर्लज्जता-पूर्वक] दाँत दिखाते हुए गेरुआ वस्त्र तथा रुद्राक्ष धारणकर एवं मुण्डित सिरवाले होकर यतियोंके धर्मका आचरण करेंगे॥ ३४॥ |
| सस्यचौरा भविष्यन्ति दृढचैलाभिलाषिणः।<br>चौराश्चोरस्वहर्तारो हर्तुर्हर्ता तथापरः॥ ३५<br><br>योग्यकर्मण्युपरते लोके निष्क्रियतां गते।<br>कीटमूषकसर्पाश्च धर्षयिष्यन्ति मानवान्॥ ३६ | कलियुगमें लोग धान्यका हरण करनेवाले तथा अत्यन्त दुष्ट लोगोंके संगकी अभिलाषा करनेवाले होंगे। चोर चोरोंका धन चुरायेंगे और उनके भी धनको कोई दूसरा हरण कर ले जायगा। मनुष्यके विधिसम्मत कर्मसे विरत होकर निष्क्रिय होनेपर कीट, मूषक तथा सर्प मनुष्योंको पीड़ित करेंगे॥ ३५-३६॥ |
| सुभिक्षं क्षेममारोग्यं सामर्थ्यं दुर्लभं तदा।<br>कौशिकीं प्रतिपत्स्यन्ते देशान् क्षुद्भयपीडिताः॥ ३७<br><br>दुःखेनाभिप्लुतानां च परमायुः शतं तदा। | उस समय सुभिक्ष, कल्याण, नीरोगता, सामर्थ्य आदि दुर्लभ हो जायँगे। लोग क्षुधापीड़ित होकर अपने देशसे आकर कौशिकी नदीके तटपर बसेंगे। लोग दुःखित होकर सौ वर्षकी पूर्ण आयु व्यतीत करेंगे॥ ३७ १/२॥ |
| दृश्यन्ते न च दृश्यन्ते वेदाः कलियुगेऽखिलाः॥ ३८<br><br>उत्सीदन्ति तदा यज्ञा केवलाधर्मपीडिताः। | कलियुगमें सभी वेदोंका प्रचार-प्रसार कहीं दिखायी देगा और कहीं नहीं। समस्त यज्ञ अधर्मसे पीड़ित होकर विनष्ट हो जायँगे॥ ३८ १/२॥ |
| काषायिणोऽप्यनिर्ग्रन्थाः कापालीबहुलास्त्विह॥ ३९<br><br>वेदविक्रयिणश्चान्ये तीर्थविक्रयिणः परे।<br>वर्णाश्रमाणां ये चान्ये पाषण्डाः परिपन्थिनः॥ ४०<br><br>उत्पद्यन्ते तदा ते वै सम्प्राप्ते तु कलौ युगे। | संन्यासी शास्त्रज्ञानसे रहित होंगे तथा कापालिक बहुत-से होंगे। कुछ लोग वेद बेचेंगे, तो अन्य लोग तीर्थोंका विक्रय करेंगे। अन्य पाखण्डी लोग वर्णाश्रमधर्मके प्रतिकूल आचरण करेंगे। कलियुगके उपस्थित होनेपर इस प्रकारके लोग उत्पन्न होंगे॥ ३९-४० १/२॥ |
| अधीयन्ते तदा वेदान् शूद्रा धर्मार्थकोविदाः॥ ४१<br><br>यजन्ते चाश्वमेधेन राजानः शूद्रयोनयः।<br>स्त्रीबालगोवधं कृत्वा हत्वा चैव परस्परम्॥ ४२ | धर्म तथा अर्थके पण्डित बनकर शूद्रलोग वेदोंका अध्ययन करेंगे एवं शूद्र जातिके राजा अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करेंगे। उस समय सभी प्राणी स्त्रियों, बालकों |
| १८० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तथा गायोंका वध करके परस्पर नानाविध उपद्रव उत्पन्न करेंगे॥ ४१-४२^१/_२॥ | |
| उपद्रवांस्तथान्योऽन्यं साधयन्ति तदा प्रजाः।<br>दुःखप्रभूतमल्पायुर्देहोत्साहः सरोगता॥ ४३<br><br>अधर्माभिनिवेशित्वात्तमोवृत्तं कलौ स्मृतम्।<br>प्रजासु ब्रह्महत्यादि तदा वै सम्प्रवर्तते॥ ४४ | उस समय अपार दुःख, अल्प आयु, शारीरिक कष्ट तथा व्याधियोंसे लोग पीड़ित होंगे। ऐसा कहा गया है कि कलियुगमें अधर्मके प्रति अत्यन्त आसक्ति होनेके कारण लोगोंका आचरण तमोगुणप्रधान होगा। उस समय प्रजाओंमें ब्रह्महत्या आदि महापापकर्म करनेकी विशेष तत्परता होगी॥ ४३-४४॥ |
| तस्मादायुर्बलं रूपं कलिं प्राप्य प्रहीयते।<br>तदा त्वल्पेन कालेन सिद्धिं गच्छन्ति मानवाः॥ ४५ | अतएव कलियुगको प्राप्तकर प्रजाओंकी आयु, बल, रूप आदिका क्षय होगा। उस समय अल्पकालके धर्माचरणसे ही मनुष्य सिद्धिको प्राप्त होंगे॥ ४५॥ |
| धन्या धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते द्विजसत्तमाः।<br>श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं ये चरन्त्यनसूयकाः॥ ४६ | उस कलियुगमें जो श्रेष्ठ ब्राह्मण द्वेषरहित होकर वेदों तथा स्मृतियोंमें प्रतिपादित धर्मोंका आचरण करेंगे, वे धन्य होंगे॥ ४६॥ |
| त्रेतायां वार्षिको धर्मो द्वापरे मासिकः स्मृतः।<br>यथाक्लेशं चरन् प्राज्ञस्तदह्ना प्राप्नुते कलौ॥ ४७ | त्रेतामें वर्षभर तथा द्वापरमें मासभर धर्माचरण करनेसे जिस फलका प्राप्त होना बताया गया है, ज्ञानवान् व्यक्ति कलियुगमें वही फल यथाशक्ति एक दिन धर्माचरण करके प्राप्त कर लेता है॥ ४७॥ |
| एषा कलियुगावस्था संध्यांशं तु निबोध मे।<br>युगे युगे च हीयन्ते त्रींस्त्रीन् पादांस्तु सिद्धयः॥ ४८ | यह कलियुगकी दशाका वर्णन किया गया है। अब आप उसका सन्ध्यांश मुझसे जान लीजिये। युग-युगमें सिद्धियोंके तीन पादोंका ह्रास होता है॥ ४८॥ |
| युगस्वभावाः सन्ध्यास्तु तिष्ठन्तीह तु पादशः।<br>सन्ध्यास्वभावाः स्वांशेषु पादशस्ते प्रतिष्ठिताः॥ ४९ | युगके स्वभाववाली सन्ध्याएँ यहाँ पादसे न्यून होकर रहती हैं। इस प्रकार सन्ध्याके स्वभाव अपने अंशोंमें अर्थात् सन्ध्यांशोंमें एक चतुर्थांशसे न्यून होकर प्रतिष्ठित रहते हैं॥ ४९॥ |
| एवं सन्ध्यांशके काले सम्प्राप्ते तु युगान्तिके।<br>तेषां शास्ता ह्यसाधूनां भूतानां निधनोत्थितः॥ ५० | इस प्रकार युगान्तमें सन्ध्यांशकालके उपस्थित होनेपर दुष्ट प्राणियोंके संहारके लिये उनका एक महान् शासक आविर्भूत होगा॥ ५०॥ |
| गोत्रेऽस्मिन् वै चन्द्रमसो नाम्ना प्रमितिरुच्यते।<br>मानवस्य तु सोऽंशेन पूर्वं स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ५१ | पूर्वकालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरमें जो प्रमिति नामसे विख्यात रहे हैं, वे मनुपुत्रके अंशसे इस कलियुगके समाप्तिकालमें चन्द्रमाके गोत्रमें सोमशर्मा नामक ब्राह्मणके रूपमें उत्पन्न होंगे॥ ५१॥ |
| समाः सविंशतिः पूर्णा पर्यटन् वै वसुन्धराम्।<br>अनुकर्षन् स वै सेनां सवाजिरथकुञ्जराम्॥ ५२<br><br>प्रगृहीतायुधैर्विप्रैः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>स तदा तैः परिवृतो म्लेच्छान् हन्ति सहस्रशः॥ ५३ | शस्त्रधारी ब्राह्मणोंसे निरन्तर परिवृत वे हाथी, घोड़े तथा रथसे युक्त विशाल सेना साथमें लेकर पूरे बीस वर्षतक पृथ्वीपर घूम-घूमकर सैकड़ों और हजारों बार म्लेच्छोंका वध करेंगे॥ ५२-५३॥ |
अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास... पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स हत्वा सर्वशश्चैव राज्ञस्तान् शूद्रयोनिजान्।<br>पाखण्डांस्तु ततः सर्वान्निःशेषं कृतवान् प्रभुः॥ ५४ | परम ऐश्वर्यसम्पन्न वे ब्राह्मणपुत्र शूद्रयोनिमें उत्पन्न उन सभी पाखण्डी राजाओंको मारकर पृथ्वीको उनसे पूर्णतः विहीन कर देंगे॥ ५४॥ |
| नात्यर्थं धार्मिका ये च तान् सर्वान् हन्ति सर्वतः।<br>वर्णव्यत्यासजाताश्च ये च ताननुजीविनः॥ ५५ | अधर्मका आचरण करनेवाले, वर्णव्यवस्थाके प्रतिकूल चलनेवाले तथा इनके जो अनुजीवी हैं, उन सभीको वे मार डालेंगे॥ ५५॥ |
| प्रवृत्तचक्रो बलवान् म्लेच्छानामन्तकृत् तु।<br>अधृष्यः सर्वभूतानां चचाराथ वसुन्धराम्॥ ५६ | सभी प्राणियोंके लिये अजेय, म्लेच्छोंके संहारक, अत्यन्त बलशाली तथा प्रवृत्त-आज्ञामण्डलवाले वे समग्र भूमण्डलपर विचरण करेंगे॥ ५६॥ |
| मानवस्य तु सोऽशेन देवस्येह विजज्ञिवान्।<br>पूर्वजन्मनि विष्णोस्तु प्रमितिर्नाम वीर्यवान्॥ ५७<br><br>गोत्रतो वै चन्द्रमसः पूर्णे कलियुगे प्रभुः।<br>द्वात्रिंशेऽभ्युदिते वर्षे प्रक्रान्तो विंशतिः समाः॥ ५८<br><br>विनिघ्नन् सर्वभूतानि शतशोऽथ सहस्रशः।<br>कृत्वा बीजावशेषां तु पृथिवीं क्रूरकर्मणः॥ ५९<br><br>परस्परनिमित्तेन कोपेनाकस्मिकेन तु।<br>स साधयित्वा वृषलान् प्रायस्तानधार्मिकान्॥ ६०<br><br>गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्थितिं प्राप्तः सहानुगः।<br>ततो व्यतीते काले तु सामात्यः सह सैनिकः॥ ६१ | पूर्वजन्ममें वीर्यवान् प्रमिति नामवाले वे इस कलिमें मनुपुत्र विष्णुदेवके अंशसे सोम-गोत्रमें कलियुगे पूर्ण होनेपर उत्पन्न होंगे। बीस वर्षतक पराक्रम प्रदर्शित करनेवाले वे सैकड़ों-हजारों विधर्मी प्राणियोंको नष्ट करते हुए पृथ्वीको क्रूरकर्मा जनोंसे शून्यप्राय-सा करके आकस्मिक तथा पारस्परिक समुत्पादित कोपके द्वारा उन अधार्मिक वृषलप्राय जनोंको मारकर बत्तीसवें वर्षके उदित होते ही मन्त्रियों, सहचरों तथा सैनिकोंसहित गंगा-यमुनाके मध्य स्वयंको संस्थापित कर लेंगे॥ ५७–६१॥ |
| उत्साद्य पार्थिवान् सर्वान् म्लेच्छांश्चैव सहस्रशः।<br>तत्र सन्ध्यांशके काले सम्प्राप्ते तु युगान्तिके॥ ६२<br><br>स्थितास्त्वल्पावशिष्टासु प्रजास्विह क्वचित्क्वचित्।<br>अप्रग्रहास्ततस्ता वै लोभाविष्टास्तु कृत्स्नशः॥ ६३ | धर्मच्युत सभी पार्थिवों तथा हजारों म्लेच्छोंको नष्ट करके उस कलियुगमें सन्ध्यांशके समुपस्थित होनेपर यत्र-तत्र थोड़ी ही प्रजाएँ बची रहेंगी। वे आत्मनियन्त्रण खोकर तथा पूर्ण रूपसे लोभके वशीभूत होकर एक-दूसरेसे कृत्रिम नम्रता प्रदर्शित करती हुई उन्हें विश्वासमें लेकर उनकी हिंसा कर डालेंगी॥ ६२–६३ १/२॥ |
| उपहिंसन्ति चान्योन्यं प्रणिपत्य परस्परम्।<br>अराजके युगवशात्संशये समुपस्थिते॥ ६४<br><br>प्रजास्ता वै ततः सर्वाः परस्परभयार्दिताः।<br>व्याकुलाश्च परिभ्रान्तास्त्यक्त्वा दारान् गृहाणि च॥ ६५ | युगके प्रभावके कारण अराजकताकी स्थिति उत्पन्न होनेपर वे सभी प्रजाएँ परस्पर भयसे ग्रस्त होकर व्याकुल तथा भ्रमित हो जायेंगी। लोग अत्यन्त दुःखित एवं करुणाशून्य होकर अपनी पत्नियों तथा घरोंको छोड़कर अपने प्राणोंकी भी परवाह न करनेवाले होंगे॥ ६४–६५ १/२॥ |
| स्वान् प्राणाननपेक्षन्तो निष्कारुण्याः सुदुःखिताः।<br>नष्टे श्रौते स्मार्तधर्मे परस्परहतास्तदा॥ ६६ | श्रौत तथा स्मार्तधर्मके नष्ट हो जानेपर सभी प्रजाएँ मर्यादाहीन, अत्यन्त क्रूर, स्नेहरहित तथा निर्लज्ज होकर एक-दूसरेकी हिंसा करानेमें तत्पर रहेंगी॥ ६६ १/२॥ |
| निर्मर्यादा निराक्रान्ता निःस्नेहा निरपत्रपाः।<br>नष्टे धर्मे प्रतिहताः ह्रस्वकाः पञ्चविंशकाः॥ ६७ | धर्मके नष्ट हो जानेपर पतनको प्राप्त हुए लोग लघु आकारवाले तथा पच्चीस वर्षकी आयुवाले होंगे। |
| १८२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हित्वा पुत्रांश्च दारांश्च विवादव्याकुलेन्द्रियाः।<br>अनावृष्टिहताश्चैव वार्त्तामुत्सृज्य दूरतः॥ ६८ | आपसी कलहसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले लोग अपनी पत्नियों एवं पुत्रोंका त्यागतक कर देंगे॥ ६७ १/२ ॥ |
| प्रत्यन्तानुपसेवन्ते हित्वा जनपदान् स्वकान्।<br>सरित्सागरकूपांस्ते सेवन्ते पर्वतांस्तथा॥ ६९ | वृष्टि न होनेके कारण दुःखित प्रजाएँ कृषिकर्मका पूर्ण रूपसे त्याग करके अपने-अपने देशोंको छोड़कर म्लेच्छ देशों, नदी, समुद्र, कुएँ, पर्वत आदि स्थानोंपर शरण लेंगी॥ ६८-६९॥ |
| मधुमांसैर्मूलफलैर्वर्तयन्ति सुदुःखिताः।<br>चीरपत्राजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः॥ ७० | प्रजाएँ अत्यन्त दुःखित होकर मधु, मांस, कन्दमूल तथा फलोंपर जीवन-निर्वाह करेंगी। वे परिग्रहरहित एवं निष्क्रिय होकर वृक्षोंकी छाल तथा उनके पत्ते वस्त्ररूपमें धारण करेंगी॥ ७०॥ |
| वर्णाश्रमपरिभ्रष्टाः सङ्कटं घोरमास्थिताः।<br>एवं कष्टमनुप्राप्ता अल्पशेषाः प्रजास्तदा॥ ७१ | वर्ण तथा आश्रमव्यवस्थासे भ्रष्ट हुए लोग घोर कष्टमें पड़ जायँगे और इस प्रकार भीषण दुःख आ जानेके कारण थोड़ी ही प्रजा बच पायेगी॥ ७१॥ |
| जराव्याधिक्षुधाविष्टा दुःखान्निर्वेदमानसाः।<br>विचारणा तु निर्वेदात्साम्यावस्था विचारणा॥ ७२ | बुढ़ापा, रोग तथा क्षुधासे पीड़ित लोगोंके मनमें उस दुःखसे निर्वेद उत्पन्न होगा। पुनः उस निर्वेदसे साम्यावस्थावाली विचारणा, विचारणासे साम्यावस्थात्मक बोध |
| साम्यावस्थात्मको बोधः सम्बोधाद्धर्मशीलता।<br>अरूपशमयुक्तास्तु कलिशिष्टा हि वै स्वयम्॥ ७३ | और अन्तमें उस बोधसे धर्माचरणके प्रति प्रवृत्ति जाग्रत् होगी। कलियुगकी बची हुई वे प्रजाएँ स्वयं शक्ति-सामर्थ्यके अभावमें शान्तियुक्त हो जायँगी॥ ७२-७३॥ |
| अहोरात्रात्तदा तासां युगं तु परिवर्तते।<br>चित्तसम्मोहनं कृत्वा तासां वै सुप्तमत्तवत्॥ ७४ | इसके बाद सुप्त तथा मत्तकी भाँति उन प्रजाओंका चित्त-सम्मोहन करके एक दिन-रातमें ही कलियुग परिवर्तित हो जायगा और इस प्रकार कालधर्मके अनुसार कलियुगको दबाकर सत्ययुग प्रवृत्त हो जायगा॥ ७४ १/२ ॥ |
| भाविनोऽर्थस्य च बलात्ततः कृतमवर्तत।<br>प्रवृत्ते तु ततस्तस्मिन् पुनः कृतयुगे तु वै॥ ७५ | तदनन्तर उस सत्ययुगके प्रवृत्त होनेपर कलियुगकी बची हुई प्रजाओंमें सत्ययुगके आचार-विचार उत्पन्न होंगे॥ ७५ १/२ ॥ |
| उत्पन्नाः कलिशिष्टास्तु प्रजाः कार्तयुगास्तदा।<br>तिष्ठन्ति चेह ये सिद्धा अदृष्टा विचरन्ति च॥ ७६ | इस लोकमें उस समय जो सप्तसिद्ध¹ लोग रहते हैं, वे अदृश्य रूपमें सप्तर्षियों²के साथ व्यवस्थित होकर विचरण करते हैं॥ ७६ १/२ ॥ |
| सप्तसप्तर्षिभिश्चैव तत्र ते तु व्यवस्थिताः।<br>ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्रा बीजार्थं ये स्मृता इह॥ ७७ | जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र बीजके लिये कहे गये हैं, वे सब कलियुगमें उत्पन्न होनेवालोंके साथ उस समय विशेषता-रहित होकर रहते थे॥ ७७ १/२ ॥ |
| कलिजैः सह ते सर्वे निर्विशेषास्तदाभवन्।<br>तेषां सप्तर्षयो धर्मं कथयन्तीत्तरेऽपि च॥ ७८ | वर्णाश्रमके आचारवाला जो श्रौत तथा स्मार्त दो |
¹ १. मन्त्रज्ञ, मन्त्रविद्, प्राज्ञ, मन्त्रराट्, सिद्धपूजित, सिद्धवत् और परमसिद्ध—ये सात सप्तसिद्ध कहे गये हैं। (लिङ्गपुराण पू० ८२।५१)
² २. कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, वसिष्ठ तथा जमदग्नि—ये सप्तर्षि कहे गये हैं।
| अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास... पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति | १८३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वर्णाश्रमाचारयुतं श्रौतं स्मार्तं द्विधा तु यम्।<br>ततस्तेषु क्रियावत्सु वर्धन्ते वै प्रजाः कृते ॥ ७९ | प्रकारका धर्म होता है; उस धर्मको उन लोगोंके लिये सप्तर्षि एवं सप्तसिद्ध लोग उपदेश करते हैं। इस प्रकार उन लोगोंके कर्मनिष्ठ हो जानेपर कृतयुगमें प्रजाएँ बढ़ने लगती हैं॥ ७८-७९॥ |
| श्रौतस्मार्तकृतानां च धर्मे सप्तर्षिदर्शिते।<br>केचिद्धर्मव्यवस्थार्थं तिष्ठन्तीह युगक्षये ॥ ८० | उन सप्तर्षियोंके द्वारा श्रौत-स्मार्तसम्बन्धी धर्मोंका उपदेश करनेसे कुछ लोग युगके क्षयके समय इस पृथ्वीलोकमें धर्मकी व्यवस्थाके लिये रह जाते हैं॥ ८०॥ |
| मन्वन्तराधिकारेषु तिष्ठन्ति मुनयस्तु वै।<br>यथा दावप्रदग्धेषु तृणेष्विह ततः क्षितौ ॥ ८१<br>वनानां प्रथमं वृष्ट्या तेषां मूलेषु सम्भवः।<br>तथा कार्त्तयुगानां तु कलिजेष्विह सम्भवः ॥ ८२ | वे मुनिगण मन्वन्तरोंके अधिकारोंमें स्थित रहते हैं। जिस प्रकार इस पृथ्वीपर दावानलसे वनोंके तृण आदिके जल जानेपर बादमें प्रथम वृष्टिसे उनके मूलोंमें पुनः अंकुरण होता है; उसी प्रकार कलियुगमें उत्पन्न हुए लोगोंसे ही कृतयुगके प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है॥ ८१-८२॥ |
| एवं युगाद्युगस्येह सन्तानं तु परस्परम्।<br>वर्तते ह्यव्यवच्छेदाद्यावन्मन्वन्तरक्षयः ॥ ८३ | इस प्रकार अव्यवच्छिन्न रूपसे इस लोकमें मन्वन्तरके क्षयतक एक युगके कुछ संतान दूसरे युगमें विद्यमान रहते हैं॥ ८३॥ |
| सुखमायुर्बलं रूपं धर्मोऽर्थः काम एव च।<br>युगेष्वेतानि हीयन्ते त्रींस्त्रीन् पादान् क्रमेण तु॥ ८४ | प्रत्येक चतुर्युगीमें सुख, आयु, बल, रूप, धर्म, अर्थ तथा काम—ये सभी क्रमसे तीन-तीन पादोंके ह्रासको प्राप्त होते हैं, अर्थात् प्रत्येक युगके अन्ततक इनके एक-एक पादका ह्रास होता जाता है॥ ८४॥ |
| ससन्ध्यांशेषु हीयन्ते युगानां धर्मसिद्धयः।<br>इत्येषा प्रतिसिद्धिवैं कीर्त्तितैषा क्रमेण तु॥ ८५ | इसी प्रकार युगके सन्ध्यांशमें प्रत्येक युगकी धर्म सिद्धियोंका भी ह्रास होता है। इस तरह मैंने क्रमसे प्रत्येक सिद्धिका वर्णन कर दिया॥ ८५॥ |
| चतुर्युगानां सर्वेषामनेनैव तु साधनम्।<br>एषा चतुर्युगावृत्तिरासहस्राद्गुणीकृता॥ ८६ | इसी प्रकार सभी चारों युगोंकी स्थिति बनती है। चारों युगोंकी एक आवृत्तिका जो एक हजार गुना है; वही ब्रह्माजीका एक दिन कहा गया है और उतनी ही बड़ी उनकी एक रात कही जाती है॥ ८६ १/२॥ |
| ब्रह्मणस्तदहः प्रोक्तं रात्रिश्चैतावती स्मृता।<br>अनार्जवं जडीभावो भूतानामायुगक्षयात्॥ ८७ | ज्यों-ज्यों युगका क्षय होता है, प्राणियोंमें जड़ता-भाव तथा स्वभावकी सरलताका अभाव बढ़ता जाता है। यही सभी युगोंका लक्षण कहा गया है॥ ८७ १/२॥ |
| एतदेव तु सर्वेषां युगानां लक्षणं स्मृतम्।<br>एषां चतुर्युगाणां च गुणिता ह्येकसप्ततिः॥ ८८<br>क्रमेण परिवृत्ता तु मनोरन्तरमुच्यते।<br>चतुर्युगे यथैकस्मिन् भवतीह यदा तु यत्॥ ८९ | क्रमसे एक चतुर्युगका इकहत्तर (७१ ६/१४) बार आवर्तन एक मन्वन्तर कहा जाता है। जो व्यवहार इस चतुर्युगमें घटित होता है, वही क्रमशः दूसरे चतुर्युगोंमें भी होता है॥ ८८-८९ १/२॥ |
| तथा चान्येषु भवति पुनस्तद्वै यथाक्रमम्।<br>सर्गे सर्गे यथा भेदा उत्पद्यन्ते तथैव तु॥ ९०<br>पञ्चविंशत्परिमिता न न्यूना नाधिकास्तथा।<br>तथा कल्पा युगैः सार्धं भवन्ति सह लक्षणैः॥ ९१ | प्रत्येक सर्गमें पचीस प्रकारके भेदोंवाले जो तत्त्व होते |
| १८४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| मन्वन्तराणां सर्वेषामेतदेव तु लक्षणम्॥ ९२ । <br><br> यथा युगानां परिवर्तनानि <br> चिरप्रवृत्तानि युगस्वभावात्। <br> तथा तु सन्तिष्ठति जीवलोकः <br> क्षयोदयाभ्यां परिवर्तमानः॥ ९३ | हैं; वे ही जैसे सदा उत्पन्न होते हैं और इससे कम या अधिक नहीं। उसी प्रकार युगोंके साथ-साथ लक्षणोंसहित कल्प भी होते हैं। सभी मन्वन्तरोंका भी यही लक्षण है॥ ९०–९२॥ <br> युगोंके स्वभावके अनुसार जिस प्रकार चिरकालसे प्रवृत्त होनेवाले युगोंमें परिवर्तन होता है, उसी प्रकार युगोंके अनुरूप क्षय तथा उदयसे यह जीवलोक भी संस्थित रहता है और इसमें भी युगोंके अनुरूप परिवर्तन होता रहता है॥ ९३॥ | | इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै समासतः। <br> अतीतानागतानां हि सर्वमन्वन्तरेषु वै॥ ९४ | इस प्रकार सभी मन्वन्तरोंमें बीते हुए तथा आनेवाले युगोंके लक्षण संक्षेपमें कहे गये हैं॥ ९४॥ | | मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि च। <br> व्याख्यातानि न सन्देहः कल्पः कल्पेन चैव हि॥ ९५ | इसी तरह एक मन्वन्तरसे सभी मन्वन्तरोंकी व्याख्या की गयी है। एक कल्पके लक्षणोंसे सभी कल्पोंके लक्षण समझ लेना चाहिये। इस विषयमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है॥ ९५॥ | | अनागतेषु तद्वच्च तर्कः कार्यो विजानता। <br> मन्वन्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेष्विह॥ ९६ | उसी भाँति ज्ञानी पुरुषको इस लोकमें बीते हुए तथा आनेवाले सभी मन्वन्तरोंके विषयमें कल्पना कर लेनी चाहिये॥ ९६॥ | | तुल्याभिमानिनः सर्वे नामरूपैर्भवन्त्युत। <br> देवा ह्यष्टविधा ये च ये च मन्वन्तरेश्वराः॥ ९७ <br><br> ऋषयो मनवश्चैव सर्वे तुल्यप्रयोजनाः। <br> एवं वर्णाश्रमाणां तु प्रविभागो युगे युगे॥ ९८ | जो आठ प्रकारके देवता*, मन्वन्तरोंके स्वामी, ऋषिगण, मनुगण आदि हैं, वे सब तुल्य अभिमान-नाम-रूपवाले हुआ करते हैं; साथ ही उन सभीका समान प्रकारका प्रयोजन भी होता है॥ ९७½॥ | | युगस्वभावश्च तथा विधत्ते वै तदा प्रभुः। <br> वर्णाश्रमविभागांश्च युगानि युगसिद्धयः॥ ९९ <br><br> युगानां परिमाणं ते कथितं हि प्रसङ्गतः। <br> वदामि देवि पुत्रत्वं पद्मयोनेः समासतः॥ १०० | इस प्रकार मैंने युग, उनके धर्म, वर्णाश्रमोंके विभाग, युगोंकी सिद्धियाँ, युगोंके परिमाण जिन्हें युग-युगमें परमात्मा धारण करते हैं—इन सबके विषयमें आपसे प्रसंगके अनुसार कह दिया। अब मैं आपसे पद्मयोन ब्रह्माजीके देवीके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेके विषयमें संक्षेपमें कह रहा हूँ॥ ९८–१००॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुर्युगपरिमाणं नाम चत्वारिंश्शोऽध्यायः ॥ ४० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'चतुर्युगपरिमाण' नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४०॥
* यहाँ गणदेवताओंका वर्ग आठ प्रकारका बताया गया है, किंतु अमरकोष (१।१।१०) तथा वाचस्पतिकोषमें गणदेवताओंके नौ वर्ग कहे गये हैं और एक-एक वर्गमें परिगणित देवताओंकी संख्याको इस प्रकार बताया गया है—
आदित्या द्वादशप्रोक्ता विश्वेदेवा दशस्मृताः। वसवश्चाष्ट संख्याताः षट्त्रिंशत् तुषिता मताः॥
आभास्वराश्चतुष्षष्टिर्वाताः पञ्चाशदूनकाः। महाराजिकानामानो द्वे शते विंशतिस्तथा॥
साध्या द्वादशविख्याता रुद्राश्चैकादशस्मृताः।
अर्थात् आदित्य १२, विश्वेदेव १०, वसु ८, तुषित ३६, आभास्वर ६४, मरुत् ४९, महाराजिक २२०, साध्य १२ और रुद्र ११ होते हैं।
४१- विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य तथा ब्रह्माद्वारा महेश्वरकी नामाष्टकस्तुतिका वर्णन
अध्याय ४१ ] विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य तथा नामाष्टकस्तुतिका वर्णन १८५
इकतालीसवाँ अध्याय
विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य तथा ब्रह्माद्वारा महेश्वरकी नामाष्टकस्तुतिका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इन्द्र उवाच<br>पुनः ससर्ज भगवान् प्रभ्रष्टाः पूर्ववत्प्रजाः।<br>सहस्रयुगपर्यन्ते प्रभाते तु पितामहः॥ १<br><br>एवं परार्धे विप्रेन्द्र द्विगुणे तु तथा गते।<br>तदा धराम्भसि व्याप्ता ह्यापो वह्नौ समीरणे॥ २<br><br>वह्निः समीरणश्चैव व्योम्नि तन्मात्रसंयुतः।<br>इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्राणि द्विजोत्तम॥ ३<br><br>अहङ्कारमनुप्राप्य प्रलीनास्तत्क्षणादहो।<br>अभिमानस्तदा तत्र महान्तं व्याप्य वै क्षणात्॥ ४<br><br>महानपि तथा व्यक्तं प्राप्य लीनोऽभवद् द्विज।<br>अव्यक्तं स्वगुणैः सार्धं प्रलीनमभवद्द्भवे॥ ५<br><br>ततः सृष्टिर्भूतस्मात्पूर्ववत्पुरुषाच्छिवात्। | इन्द्र बोले—तत्पश्चात् एक हजार चतुर्युगीके व्यतीत हो जानेपर प्रभात वेलामें भगवान् ब्रह्माने नष्ट हुई प्रजाओंका पुनः पूर्ववत् सृजन किया। हे विप्रेन्द्र! इस प्रकार ब्रह्माके परार्धका दूना समय बीत जानेपर पृथ्वी जलमें, जल अग्निमें, अग्नि वायुमें और वायु आकाशमें अपनी-अपनी तन्मात्रासहित व्याप्त हो गये। हे द्विजश्रेष्ठ! दसों इन्द्रियाँ, मन तथा तन्मात्राएँ अहंकारको प्राप्तकर तत्क्षण उसीमें विलीन हो गयीं। अहंकार उस महत्को व्याप्त करके एवं महत् भी अव्यक्तको व्याप्त करके उसी क्षण उनमें विलीन हो गया। हे द्विज! अव्यक्त भी अपने गुणोंके साथ महेश्वरमें समाहित हो गया। इसके अनन्तर उन्हीं परम पुरुष शिवसे पूर्वकी भाँति सृष्टि होने लगी॥ १-५ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥ |
| अथ सृष्टास्तदा तस्य मनसा तेन मानसाः॥ ६<br><br>न व्यवर्धन्त लोकेऽस्मिन् प्रजाः कमलयोनिना।<br>वृद्ध्यर्थं भगवान् ब्रह्मा पुत्रैर्वै मानसैः सह॥ ७<br><br>दुश्चरं विचचारेशं समुद्दिश्य तपः स्वयम्।<br>तुष्टस्तु तपसा तस्य भवो ज्ञात्वा स वाञ्छितम्॥ ८<br><br>ललाटमध्यं निर्भिद्य ब्रह्मणः पुरुषस्य तु।<br>पुत्रस्नेहमिति प्रोच्य स्त्रीपुंरूपोऽभवत्तदा॥ ९ | एतदनन्तर पद्मयोनि ब्रह्माजीने अपने मनसे मानस पुत्रोंका सृजन किया। इस लोकमें जब प्रजाओंकी वृद्धि न हो सकी, तब प्रजा-वृद्धिके लिये स्वयं भगवान् ब्रह्मा अपने मानस पुत्रोंके साथ महेश्वरके निमित्त कठोर तप करने लगे। तब उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर वे महेश्वर शिव उनकी कामना समझकर उन पुरुषरूप ब्रह्माके ललाटके मध्य-भागका भेदन करके ‘मैं आपका पुत्र हूँ’—ऐसा कहकर स्त्री-पुरुषरूपमें प्रकट हो गये। |
| तस्य पुत्रो महादेवो ह्यर्धनारीश्वरोऽभवत्।<br>ददाह भगवान् सर्वं ब्रह्माणं च जगद्गुरुम्॥ १० | उनके पुत्र वे |
| १८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| महादेव अर्धनारीश्वरके रूपमें प्रतिष्ठित हुए। तब उन्होंने जगद्गुरु ब्रह्मसहित सब कुछ दग्ध कर दिया॥ ६-१०॥ | |
| अथार्धमात्रां कल्याणीमात्मनः परमेश्वरीम्।<br>बुभुजे योगमार्गेण वृद्ध्यर्थं जगतां शिवः॥ ११<br><br>तस्यां हरिं च ब्रह्माणं ससर्ज परमेश्वरः।<br>विश्वेश्वरस्तु विश्वात्मा चास्त्रं पाशुपतं तथा॥ १२<br><br>तस्माद् ब्रह्मा महादेव्याश्चांशजश्च हरिस्तथा।<br>अण्डजः पद्मजश्चैव भवाङ्गभव एव च॥ १३<br><br>एतत्त्ते कथितं सर्वमितिहासं पुरातनम्।<br>परार्धं ब्रह्मणो यावत्तावद्भूतिः समासतः॥ १४ | इसके बाद शिवजीने समग्र जगत्की वृद्धिके लिये योगमार्गके द्वारा कल्याणमयी अर्धमात्रास्वरूपिणी अपनी अर्धांगिनी परमेश्वरीके साथ संसर्ग किया। विश्वेश्वर विश्वात्मा परमेश्वर शिवने उन परमेश्वरीसे विष्णु, ब्रह्मा और पाशुपत अस्त्रका सृजन किया। इसीलिये ब्रह्मा तथा विष्णुको महादेवीके अंशसे उत्पन्न कहा गया है और उन ब्रह्माको अण्डज, पद्मज और भवांगभव भी कहा जाता है। मैंने आपसे यह सम्पूर्ण पुरातन इतिहास कह दिया। जबतक ब्रह्माका परार्ध रहता है, तबतकके उनके ऐश्वर्य तथा तमोगुणसे प्रादुर्भूत उनके वैराग्यके विषयमें मैं संक्षेपमें कहूँगा॥ ११-१४ १/२॥ |
| वैराग्यं ब्रह्मणो वक्ष्ये तमोद्भूतं समासतः।<br>नारायणोऽपि भगवान् द्विधा कृत्वात्मनस्तनुम्॥ १५<br><br>ससर्ज सकलं तस्मात्स्वाङ्गादेव चराचरम्।<br>ततो ब्रह्माणमसृजद् ब्रह्मा रुद्रं पितामहः॥ १६<br><br>मुने कल्पान्तरे रुद्रो हरिं ब्रह्माणमीश्वरम्।<br>ततो ब्रह्माणमसृजन्मुने कल्पान्तरे हरिः॥ १७<br><br>नारायणं पुनर्ब्रह्मा ब्रह्माणं च पुनर्भवः।<br>तदा विचार्य वै ब्रह्मा दुःखं संसार इत्यजः॥ १८<br><br>सर्गं विसृज्य चात्मानमात्मन्येव नियोज्य च।<br>संहृत्य प्राणसञ्चारं पाषाण इव निश्चलः॥ १९ | भगवान् नारायणने भी अपने शरीरको दो भागोंमें विभक्त करके अपने उसी अंगसे सम्पूर्ण चराचरकी सृष्टि की। तब उन्होंने ब्रह्माका सृजन किया और पितामह ब्रह्माने रुद्रका सृजन किया। हे मुने! दूसरे कल्पमें रुद्रने विष्णु, ब्रह्मा और ईश्वर (शिव)-को उत्पन्न किया। हे मुने! तदनन्तर दूसरे कल्पमें हरि (विष्णु)-ने ब्रह्माका सृजन किया। पुनः [दूसरे कल्पमें] ब्रह्माने नारायणको और फिर भव (रुद्र)-ने ब्रह्माकी सृष्टि की। तत्पश्चात् अजन्मा भगवान् ब्रह्मा 'यह संसार दुःखरूप है'—ऐसा सोचकर सृष्टिकार्य छोड़ करके अपनेको आत्मतत्त्वमें अवस्थितकर प्राण-संचारको निरुद्ध करके पाषाणकी भाँति अचल होकर दस हजार वर्षोंतक समाधिमें स्थित रहे॥ १५-१९ १/२॥ |
| दशवर्षसहस्राणि समाधिस्थोऽभवत्प्रभुः।<br>अधोमुखं तु यत्पद्मं हृदि संस्थं सुशोभनम्॥ २०<br><br>पूरितं पूरकेणैव प्रबुद्धं चाभवत्तदा।<br>तदूर्ध्ववक्त्रमभवत्कुम्भकेन निरोधितम्॥ २१<br><br>तत्पद्मकर्णिकामध्ये स्थापयामास चेश्वरम्।<br>तदोमिति शिवं देवमर्धमात्रापरं परम्॥ २२<br><br>मृणालत्तन्तुभागैकशतभागे व्यवस्थितम्।<br>यमी यमविशुद्धात्मा नियम्यैवं हृदीश्वरम्॥ २३ | तब उनके हृदयमें जो नीचेकी ओर मुखवाला सुन्दर कमल विराजमान था, वह पूरक प्राणायामद्वारा वायुपूरित होकर विकसित हो उठा और पुनः कुम्भक प्राणायामद्वारा वायुनिरुद्ध होकर ऊर्ध्वमुखवाला हो गया। तब उन्होंने परमेश्वरको उसी कमलकी कर्णिकाके मध्यमें स्थापित कर दिया। तदनन्तर आत्मनियन्त्रण करनेवाले, संयमके द्वारा विशुद्ध आत्मावाले तथा पूजनके योग्य ब्रह्माने ओंकार शब्दसे सम्बन्ध रखनेवाली अर्धमात्रासे परे जो नाद है, उससे भी परे ब्रह्मसंज्ञक नादस्वरूप, मृणाल-तन्तुके शतभागके एक भागमें अवस्थित परम सूक्ष्म पीतवर्ण अग्निशिखा- |
अध्याय ४१] विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य... नामाष्टकस्तुतिका वर्णन १८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यमपुष्पादिभिः पूज्यं याज्यं ह्याजयदव्ययम्।<br>तस्य हृत्कमलस्थस्य नियोगाच्चांशजो विभुः॥ २४<br>ललाटमस्य निर्भिद्य प्रादुरासीत्पितामहात्।<br>लोहितोऽभूत्स्वयं नीलः शिवस्य हृदयोद्भवः॥ २५<br>वह्नेश्चैव तु संयोगात्प्रकृत्या पुरुषः प्रभुः।<br>नीलश्च लोहितश्चैव यतः कालाकृतिः पुमान्॥ २६<br>नीललोहित इत्युक्तस्तेन देवेन वै प्रभुः।<br>ब्रह्मणा भगवान् कालः प्रीतात्मा चाभवद्विभुः॥ २७<br>सुप्रीतमनसं देवं तुष्टाव च पितामहः।<br>नामाष्टकेन विश्वात्मा विश्वात्मानं महामुने॥ २८ | सदृश, यम-नियम आदि योगांग पुष्पोंके द्वारा पूजनीय तथा अविनाशी ईश्वरको अपने हृदयमें ध्यानावस्थित करके उनकी पूजा की॥ २०—२३ १/२॥<br><br>तब हृदयकमलमें विराजमान रहनेवाले उन ब्रह्माके अंशसे जायमान सर्वव्यापी रुद्र उनके ललाटका भेदन करके पितामहसे उत्पन्न हुए। शिवके हृदयसे प्रादुर्भूत पुरुष रुद्र स्वभावतः स्वयं नील होते हुए भी अग्निके संयोगके कारण लोहित (रक्त) वर्णके हो गये। चूँकि वे कालाकृति पुरुष रुद्र नील और लोहित वर्णके हुए, अतः वे ब्रह्मदेव प्रभु रुद्रको 'नीललोहित'—ऐसा कहने लगे। कालरूप भगवान् रुद्र ब्रह्माजीसे अत्यन्त प्रसन्न हुए। हे महामुने! तदनन्तर विश्वात्मा पितामह ब्रह्मा नामाष्टक स्तोत्रसे प्रसन्नचित्त विश्वात्मा भगवान् रुद्रकी स्तुति करने लगे॥ २४—२८॥ |
| पितामह उवाच<br>नमस्ते भगवन् रुद्र भास्करामिततेजसे।<br>नमो भवाय देवाय रसायाम्बुमयाय ते॥ २९<br>शर्वाय क्षितिरूपाय सदा सुरभिणे नमः।<br>ईशाय वायवे तुभ्यं संस्पर्शाय नमो नमः॥ ३०<br>पशूनां पतये चैव पावकायातितेजसे।<br>भीमाय व्योमरूपाय शब्दमात्राय ते नमः॥ ३१<br>महादेवाय सोमाय अमृताय नमोऽस्तु ते।<br>उग्राय यजमानाय नमस्ते कर्मयोगिने॥ ३२<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि पैतामहमिमं स्तवम्।<br>रुद्राय कथितं विप्रान् श्रावयेद्वा समाहितः॥ ३३<br>अष्टमूर्तेस्तु सायुज्यं वर्षादेकादवाप्नुयात्।<br>एवं स्तुत्वा महादेवमवैक्षत पितामहः॥ ३४ | **पितामह बोले—**हे भगवन्! हे रुद्र! हे भास्कर! अमित तेजस्वी आपको नमस्कार है; अम्बुमय तथा रस-स्वरूप आप भगवान् भवको नमस्कार है। गन्धमय पृथिवीरूप शर्वको नित्य नमस्कार है; स्पर्शगुणयुक्त वायुरूप ईशको बार-बार नमस्कार है। अमित तेजस्वी अग्नि-रूप पशुपतिको नमस्कार है। शब्दतन्मात्रावाले व्योमरूप आप भीमको नमस्कार है। आप अमृतमय चन्द्रस्वरूप महादेवको नमस्कार है; आप कर्मयोगी यजमानरूप उग्रको नमस्कार है। जो मनुष्य समाहितचित्त होकर पितामह ब्रह्माके द्वारा रुद्रके लिये कहे गये इस स्तोत्रका पाठ करता है या श्रवण करता है अथवा विप्रोंको सुनाता है, वह एक वर्षमें ही अष्टमूर्ति भगवान् रुद्रका सायुज्य प्राप्त कर लेता है॥ २९—३३ १/२॥ |
| तदाष्टधा महादेवः समातिष्ठत्समन्ततः।<br>तदा प्रकाशते भानुः कृष्णवर्त्मा निशाकरः॥ ३५<br>क्षितिर्वायुः पुमानम्भः सुशिरं सर्वगं तथा।<br>तदाप्रभृति तं प्राहुरष्टमूर्तिरितीश्वरम्॥ ३६ | इस प्रकार स्तुति करके जब पितामहने महादेवकी ओर देखा, तब वे सभी ओर आठ प्रकारसे विभक्त होकर सुशोभित होने लगे। उसी समयसे सूर्य, चन्द्र, अग्नि प्रकाश करने लगे और पृथिवी, वायु, यजमानरूप पुरुष, जल तथा सर्वव्यापी गगन अपने-अपने गुणधर्मसे समन्वित हुए। उसी समयसे लोग उन ईश्वरको 'अष्टमूर्ति' इस नामसे कहने लगे॥ ३४—३६॥ |
| अष्टमूर्तेः प्रसादेन विरञ्चिश्चासृजत्पुनः।<br>सृष्ट्वैतदखिलं ब्रह्मा पुनः कल्पान्तरे प्रभुः॥ ३७<br>सहस्रयुगपर्यन्तं संसुप्ते च चराचरे।<br>प्रजाः स्रष्टुमनास्तेपे तत उग्रं तपो महत्॥ ३८ | उन्हीं अष्टमूर्तिके अनुग्रहसे ब्रह्माजी पुनः सृष्टि करने लगे। इस सम्पूर्ण जगत्का सृजन करके पुनः दूसरे कल्पमें हजार युगपर्यन्त चराचर संसारके सुप्त रहनेपर |
| १८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| भगवान् ब्रह्माने प्रजाओंकी सृष्टि करनेके विचारसे अत्यन्त उग्र तप आरम्भ कर दिया ॥ ३७-३८ ॥ | |
| तस्यैवं तप्यमानस्य न किञ्चित्समवर्तत ।<br>ततो दीर्घेण कालेन दुःखात्क्रोधो व्यजायत ॥ ३९<br>क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः ।<br>ततस्तेभ्योऽश्रुबिन्दुभ्यो भूताः प्रेतास्तदाभवन् ॥ ४० | इस प्रकार तप करते हुए उन ब्रह्माको जब कोई सफलता प्राप्त न हुई; तब दीर्घकालतक तप करनेसे उत्पन्न दुःखके कारण उन्हें क्रोध आ गया। तब क्रोधाविष्ट उन ब्रह्माके नेत्रोंसे अश्रुबिन्दु गिरने लगे। तदनन्तर उन अश्रुबिन्दुओंसे भूत-प्रेत प्रादुर्भूत हो गये ॥ ३९-४० ॥ |
| सर्वांस्तानग्रजान् दृष्ट्वा भूतप्रेतनिशाचरान् ।<br>अनिन्दत तदा देवो ब्रह्मात्मानमजो विभुः ॥ ४१<br>जहौ प्राणांश्च भगवान् क्रोधाविष्टः प्रजापतिः । | तब उन सभी भूत-प्रेत-निशाचरोंको पहले उत्पन्न हुआ देखकर अजन्मा तथा परम ऐश्वर्यशाली भगवान् ब्रह्मा अपनेको कोसने लगे। इससे उन भगवान् पितामहने कोपाविष्ट होकर अपने प्राण त्याग दिये ॥ ४१ १/२ ॥ |
| ततः प्राणमयो रुद्रः प्रादुरासीत्प्रभोर्मुखात् ॥ ४२<br>अर्धनारीश्वरो भूत्वा बालार्कसदृशद्युतिः ।<br>तदैकादशधात्मानं प्रविभज्य व्यवस्थितः ॥ ४३<br>अर्धेनांशेन सर्वात्मा ससर्जासौ शिवामुमाम् । | तत्पश्चात् उन प्रभुके मुखसे उदयकालीन सूर्यके समान कान्तिवाले अर्धनारीश्वरके रूपमें होकर प्राणमय रुद्र प्रकट हुए। तब वे अपनेको ग्यारह स्वरूपोंमें* विभक्त करके व्यवस्थित हो गये। उन सर्वात्मा रुद्रने अपने आधे अंशसे कल्याणकारिणी उमाको आविर्भूत किया ॥ ४२-४३ १/२ ॥ |
| सा चासृजत्तदा लक्ष्मीं दुर्गां श्रेष्ठां सरस्वतीम् ॥ ४४<br>वामां रौद्रीं महामायां वैष्णवीं वारिजेक्षणाम् ।<br>कलां विकरिणीं चैव कालीं कमलवासिनीम् ॥ ४५<br>बलविकरिणीं देवीं बलप्रमथिनीं तथा ।<br>सर्वभूतस्य दमनीं ससृजे च मनोन्मनीम् ॥ ४६<br>तथान्या बहवः सृष्टास्तया नार्यः सहस्रशः । | तत्पश्चात् उमाने लक्ष्मी, दुर्गा तथा श्रेष्ठ सरस्वतीका सृजन किया; पुनः उन्होंने वामा, रौद्री, महामाया, कमलके समान नेत्रोंवाली वैष्णवी, कल-विकरिणी, काली, कमल-वासिनी, बलविकरिणी, देवी बलप्रमथिनी, सर्वभूतदमनी और मनोन्मनीका सृजन किया। इसी प्रकार उन्होंने अन्य बहुत-सी हजारों नारियोंकी सृष्टि की ॥ ४४-४६ १/२ ॥ |
| रुद्रैश्चैव महादेवस्ताभिस्त्रिभुवनेश्वरः ॥ ४७<br>सर्वात्मनश्च तस्याग्रे ह्यतिष्ठत्परमेश्वरः ।<br>मृतस्य तस्य देवस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥ ४८<br>घृणी ददौ पुनः प्राणान् ब्रह्मपुत्रो महेश्वरः ।<br>ब्रह्मणः प्रददौ प्राणानात्मस्थांस्तु तदा प्रभुः ॥ ४९<br>प्रहृष्टोऽभूत्ततो रुद्रः किञ्चित्प्रत्यागतासवम् ।<br>अभ्यभाषत देवेशो ब्रह्माणं परमं वचः ॥ ५०<br>मा भैर्देव महाभाग विरिञ्च जगतां गुरो ।<br>मयेह स्थापिताः प्राणास्तस्मादुत्तिष्ठ वै प्रभो ॥ ५१ | तब तीनों लोकोंके स्वामी परमेश्वर महादेव समस्त रुद्रों तथा उन देवियोंके साथ उन सर्वात्मा ब्रह्माके समक्ष खड़े हो गये। तदनन्तर ब्रह्मपुत्र दयालु महेश्वर शिवने उन मरे हुए परमेष्ठी भगवान् ब्रह्माको पुनः प्राण प्रदान कर दिये। जब प्रभु शिवने ब्रह्मामें आत्मस्थित प्राणोंका संचार किया, तब उन्हें कुछ-कुछ चेतनायुक्त देखकर भगवान् रुद्र अत्यन्त प्रसन्न हुए। इसके बाद देवेश्वर शिवने ब्रह्माजीसे यह श्रेष्ठ वचन कहा—हे देव! डरिये मत! हे महाभाग! हे विरिञ्च! हे जगद्गुरो! मैंने आपमें प्राण स्थापित कर दिये हैं; अतः हे प्रभो! अब उठिये ॥ ४७-५१ ॥ |
* भगवान् रुद्रके ग्यारह नामोंका वर्णन विभिन्न पुराणोंमें आया है, किंतु नामोंमें अन्तर है, लिङ्गपुराण पूर्वभाग अ० ६३में ११ रुद्रोंके नाम इस प्रकार बताये गये हैं—अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, भैरव, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी तथा अपराजित।
अध्याय ४१ ] विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य...नामाष्टकस्तुतिका वर्णन १८९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रुत्वा वचस्ततस्तस्य स्वप्नभूतं मनोगतम्।<br>पितामहः प्रसन्नात्मा नेत्रैः फुल्लाम्बुजप्रभैः॥ ५२<br>ततः प्रत्यागतप्राणः समुदैक्षन्महेश्वरम्।<br>स उद्वीक्ष्य चिरं कालं स्निग्धगम्भीरया गिरा॥ ५३<br>उवाच भगवान् ब्रह्मा समुत्थाय कृताञ्जलिः।<br>भो भो वद महाभाग आनन्दयसि मे मनः॥ ५४<br>को भवानष्टमूर्तिर्वै स्थित एकादशात्मकः। | तब उनका स्वप्नभूत मनोगत वचन सुनकर पितामह प्रसन्नचित्त हो गये। तदनन्तर लब्धप्राण ब्रह्माजीने अपने खिले हुए कमलके समान नेत्रोंसे महेश्वरको देखा। बहुत समयतक उन्हें देखते रहनेके पश्चात् भगवान् ब्रह्माने उठ करके दोनों हाथ जोड़कर स्नेहयुक्त गम्भीर वाणीमें उनसे कहा—हे महाभाग! आप मेरे मनको आनन्दित कर रहे हैं; एकादश रूपोंमें प्रतिष्ठित अष्टमूर्ति आप कौन हैं?॥ ५२—५४ १/२ ॥ |
| इन्द्र उवाच<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा व्याजहार महेश्वरः॥ ५५<br>स्पृशन् कराभ्यां ब्रह्माणं सुखाभ्यां स सुरारिहा। | **इन्द्र बोले—**उनका वचन सुनकर देवशत्रुओंका संहार करनेवाले महेश्वर अपने सुखप्रद हाथोंसे ब्रह्माजीका स्पर्श करते हुए उनसे कहने लगे॥ ५५ १/२ ॥ |
| श्रीशङ्कर उवाच<br>मां विद्धि परमात्मानमेनां मायामजामिति॥ ५६<br>एते वै संस्थिता रुद्रास्त्वां रक्षितुमिहागताः। | **श्रीशंकर बोले—**मुझे परमात्मा तथा इन्हें अजन्मा माया समझिये और सामने खड़े ये रुद्र आपकी रक्षा करनेके लिये यहाँ आये हैं॥ ५६ १/२ ॥ |
| ततः प्रणम्य तं ब्रह्मा देवदेवमुवाच ह॥ ५७<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा हर्षगद्गदया गिरा।<br>भगवन् देवदेवेश दुःखैराकुलितो ह्यहम्॥ ५८<br>संसारान्मोक्तुमीशान मामिहार्हसि शङ्कर।<br>ततः प्रहस्य भगवान् पितामहमुमापतिः॥ ५९<br>तदा रुद्रैर्जगन्नाथस्तया चान्तर्दधे विभुः। | तदनन्तर उन देवाधिदेवको प्रणाम करके ब्रह्माने हाथ जोड़कर हर्षपूर्ण गद्गद वाणीमें कहा—हे भगवन्! हे देवदेवेश! मैं दुःखोंसे अत्यन्त व्याकुल हूँ। हे ईशान! हे शंकर! मुझे इस संसारसे मुक्त करनेमें आप समर्थ हैं॥ ५७-५८ १/२ ॥<br>तत्पश्चात् पितामह ब्रह्माकी इस बातपर हँसकर सर्व-व्यापी तथा जगत्के स्वामी उमापति भगवान् शिव रुद्रों एवं उन भगवती उमाके साथ अन्तर्धान हो गये॥ ५९ १/२ ॥ |
| इन्द्र उवाच<br>तस्माच्छिलाद लोकेषु दुर्लभो वै त्वयोनिजः॥ ६०<br>मृत्युहीनः पुमान् विद्धि समृत्युः पद्मजोऽपि सः।<br>किन्तु देवेश्वरो रुद्रः प्रसीदति यदीश्वरः॥ ६१<br>न दुर्लभो मृत्युहीनस्तव पुत्रो ह्ययोनिजः।<br>मया च विष्णुना चैव ब्रह्मणा च महात्मना॥ ६२<br>अयोनिजं मृत्युहीनमसमर्थं निवेदितुम्। | **इन्द्र बोले—**हे शिलाद! अतः समस्त लोकोंमें अयोनिज तथा मृत्युरहित पुरुष सर्वथा दुर्लभ है। [यहाँतक कि] वे पद्मयोनि ब्रह्मा भी मृत्युयुक्त हैं—ऐसा जानिये। किंतु यदि देवेश्वर भगवान् रुद्र प्रसन्न हो जायें, तो आपके लिये मृत्युरहित तथा अयोनिज पुत्र दुर्लभ नहीं है। मैं, विष्णु एवं महात्मा ब्रह्मा भी मृत्युहीन तथा अयोनिज पुत्र देनेमें असमर्थ हैं॥ ६०—६२ १/२ ॥ |
| शैलादिरुवाच<br>एवं व्याहृत्य विप्रेन्द्रमनुगृह्य च तं घृणी॥ ६३<br>देवैर्वृतो ययौ देवः सितेनेभेन वै प्रभुः॥ ६४ | **शैलादि बोले—**इस प्रकार विप्रेन्द्रसे कहकर तथा उनपर अनुग्रह करके वे दयालु इन्द्र देवताओंके साथ श्वेतवर्णवाले ऐरावतपर आरूढ़ होकर चले गये॥ ६३-६४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे इन्द्रवाक्यं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'इन्द्रवाक्य' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४१ ॥
४२- शिलादद्वारा तप करनेसे भगवान् महेश्वरका नन्दी नामसे उनके पुत्रके रूपमें प्रकट होना और शिलादद्वारा नन्दिकेश्वर शिवकी स्तुति
| १९० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
बयालीसवाँ अध्याय
शिलादद्वारा तप करनेसे भगवान् महेश्वरका नन्दी नामसे उनके पुत्रके रूपमें प्रकट होना और शिलादद्वारा नन्दिकेश्वर शिवकी स्तुति
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| गते पुण्ये च वरदे सहस्राक्षे शिलाशनः।<br>आराधयन् महादेवं तपसातोषयद्भवम्॥ १ | वर प्रदान करनेवाले पुण्यशाली सहस्रनेत्र इन्द्रके चले जानेपर वे शिलाद महादेव शिवकी आराधना करते हुए तपके द्वारा उन्हें सन्तुष्ट करने लगे॥ १॥ |
| अथ तस्यैवमनिशं तत्परस्य द्विजस्य तु।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु गतं क्षणमिवाद्भुतम्॥ २ | इस प्रकार निरन्तर तपस्यामें संलग्न उन द्विज शिलादके एक हजार दिव्य वर्ष एक क्षणकी भाँति अद्भुतरूपसे व्यतीत हो गये॥ २॥ |
| वल्मीकेनावृताङ्गश्च लक्ष्यः कीटगणैर्मुनिः।<br>वज्रसूचीमुखैश्चान्यै रक्तकीटैश्च सर्वतः॥ ३<br><br>निर्मांसरुधिरत्वग्वै निर्लेपः कुड्यवत्स्थितः।<br>अस्थिशेषोऽभवत्पश्चात्तम्मन्यत शङ्करः॥ ४<br><br>यदा स्पृष्टो मुनिस्तेन करेण च स्मरारिणा।<br>तदैव मुनिशार्दूलश्चोत्ससर्ज क्लमं द्विजः॥ ५ | उनका शरीर वल्मीक (बाँबी)-से ढँक गया, वे मुनि वज्रसूची (वज्र तथा सूईके समान) मुखवाले तथा अन्य रक्तभोजी कीटोंसे लिपटे शरीरवाले परिलक्षित हो रहे थे, वे मांस-रुधिर-त्वचासे विहीन होकर अस्थिमात्र शरीरवाले हो गये थे; फिर भी वे निर्लिप्त भावसे भित्तिकी भाँति निश्चल खड़े थे। तब उन्हें [इस रूपमें तप करते हुए] भगवान् शंकरने जान लिया। [वहाँ प्रकट होकर] कामरिपु शिवने ज्यों ही अपने हाथसे मुनिका स्पर्श किया, त्यों ही मुनिश्रेष्ठ द्विज शिलादका [तपस्याजनित] क्लेश समाप्त हो गया॥ ३–५॥ |
| तपतस्तस्य तपसा प्रभुस्तुष्टोऽथ शङ्करः।<br>तुष्टस्तवेत्यथोवाच सगणश्चोमया सह॥ ६<br><br>तपसानेन किं कार्यं भवतस्ते महामते।<br>ददामि पुत्रं सर्वज्ञं सर्वशास्त्रार्थपारगम्॥ ७ | तदनन्तर तपस्यारत उन मुनिके तपसे सन्तुष्ट होकर भगवान् शंकरने उनसे कहा—मैं अपने गणों तथा उमासहित आपपर प्रसन्न हूँ। हे महामते! इस तपस्यासे आपका क्या प्रयोजन! मैं आपको सर्वज्ञ तथा समस्त शास्त्रोंके रहस्योंका पारगामी विद्वान् पुत्र प्रदान करता हूँ॥ ६-७॥ |
| ततः प्रणम्य देवेशं स्तुत्वोवाच शिलाशनः।<br>हर्षगद्गदया वाचा सोमं सोमविभूषणम्॥ ८ | तब देवेश शिवको प्रणाम करके और उनकी स्तुति करके शिलादमुनि हर्षपूर्ण गद्गद वाणीमें चन्द्रभूषण शिवसे कहने लगे॥ ८॥ |
| शिलाद उवाच<br>भगवन् देवदेवेश त्रिपुरार्दन शङ्कर।<br>अयोनिजं मृत्युहीनं पुत्रमिच्छामि सत्तम॥ ९ | **शिलाद बोले—**हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्रिपुरार्दन! हे शंकर! हे सत्तम! मैं अयोनिज तथा मृत्युहीन पुत्र चाहता हूँ॥ ९॥ |
| सूत उवाच<br>पूर्वमाराधितः प्राह तपसा परमेश्वरः।<br>शिलादं ब्रह्मणा रुद्रः प्रीत्या परमया पुनः॥ १० | **सूतजी बोले—**पूर्वमें ब्रह्माजीके द्वारा तपस्यासे आराधित परमेश्वर रुद्रने परम प्रसन्नताके साथ मुनि शिलादसे कहा॥ १०॥ |
अध्याय ४२ ] भगवान् महेश्वरका नन्दी नामसे शिलादपुत्रके रूपमें प्रकट होना १९१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रीदेवदेव उवाच<br>पूर्वमाराधितो विप्र ब्रह्माणांहं तपोधन।<br>तपसा चावतारार्थं मुनिभिश्च सुरोत्तमैः ॥ ११<br><br>तव पुत्रो भविष्यामि नन्दिनाम्ना त्वयोनिजः।<br>पिता भविष्यसि मम पितुर्वै जगतां मुने ॥ १२ | **श्रीदेवदेव शिव बोले—**हे विप्र! हे तपोधन! मुनियों तथा श्रेष्ठ देवताओंसहित ब्रह्माजीने अवतार ग्रहण करनेके लिये पूर्वकालमें तपस्याके द्वारा मेरी आराधना की थी। अतः मैं नन्दी नामसे तुम्हारे अयोनिज पुत्रके रूपमें जन्म लूँगा। हे मुने! आप मुझ जगत्पिताके भी पिता होंगे॥ ११-१२॥ |
| एवमुक्त्वा मुनिं प्रेक्ष्य प्रणिपत्य स्थितं घृणी।<br>सोमः सोमोपमः प्रीतस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १३ | ऐसा कहकर सम्मुख स्थित मुनिकी ओर प्रेमपूर्वक देखकर उन्हें प्रणाम करके अमृततुल्य भगवान् शिव उमासहित वहीं अन्तर्धान हो गये॥ १३॥ |
| लब्धपुत्रः पिता रुद्रात्प्रीतो मम महामुने।<br>यज्ञाङ्गणं महत्प्राप्य यज्ञार्थं यज्ञवित्तमः ॥ १४<br><br>तदङ्गणादहं शम्भोस्तनुजस्तस्य चाज्ञया।<br>सञ्जातः पूर्वमेवाहं युगान्ताग्निसमप्रभः ॥ १५ | हे महामुने! भगवान् रुद्रसे पुत्रप्राप्तिका वरदान पाकर यज्ञविदोंमें श्रेष्ठ मेरे पिताजी यज्ञ करनेके लिये प्रसन्नतापूर्वक विशाल यज्ञशालामें पहुँचे; तब मैं पूर्व ही भगवान् रुद्रकी आज्ञासे उनके पुत्रके रूपमें उस अंगणमें प्रादुर्भूत हो गया, उस समय मैं प्रलयाग्निके समान प्रभासे समन्वित था॥ १४-१५॥ |
| ववर्षुस्तदा पुष्करावर्तकाद्या<br>जगुः खेचराः किन्नराः सिद्धसाध्याः।<br>शिलादात्मजत्वं गते मय्युपेन्द्रः<br>ससर्जाथ वृष्टिं सुपुष्पौघमिश्राम् ॥ १६ | उस समय शिलादमुनिके पुत्ररूपमें मेरे आविर्भूत होनेपर पुष्कर, आवर्तक आदि मेघ बरसने लगे; किन्नर, सिद्ध, साध्य आदि गगनचारी देवतागण गान करने लगे और इन्द्र पुष्पराशिमिश्रित वृष्टि करने लगे॥ १६॥ |
| मां दृष्ट्वा कालसूर्याभं जटामुकुटधारिणम्।<br>त्र्यक्षं चतुर्भुजं बालं शूलटङ्कगदाधरम् ॥ १७<br><br>वज्रिणं वज्रदंष्ट्रं च वज्रिणाराधितं शिशुम्।<br>वज्रकुण्डलिनं घोरं नीरदोपमनिःस्वनम् ॥ १८<br><br>ब्रह्माद्यास्तुष्टुवुः सर्वे सुरेन्द्रश्च मुनीश्वराः।<br>नेदुः समन्ततः सर्वे ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ १९ | उस समय कालसूर्यके समान आभावाले, जटा-मुकुट धारण किये, तीन नेत्रोंसे युक्त, चार भुजाओंवाले, हाथोंमें शूल-टंक-गदा धारण करनेवाले, वज्र लिये हुए, हीरेके सदृश उज्ज्वल दाँतोंवाले, इन्द्रके द्वारा आराधित, कानोंमें हीरेका कुण्डल धारण किये हुए, घोर विग्रहवाले तथा मेघसदृश गम्भीर ध्वनिसे सम्पन्न मुझ बाल-शिशुको देखकर ब्रह्मा आदि, इन्द्र तथा सभी मुनीश्वर स्तुति करने लगे और सभी अप्सराएँ चारों ओरसे वाद्ययन्त्र बजाने लगीं तथा नृत्य करने लगीं ॥ १७-१९॥ |
| ऋषयो मुनिशार्दूल ऋग्यजुःसामसम्भवैः।<br>मन्त्रैर्माहेश्वरैः स्तुत्वा सम्प्रणेमुर्मुदान्विताः ॥ २० | हे मुनिश्रेष्ठ! ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदके माहेश्वर मन्त्रोंके द्वारा आनन्दपूर्वक मेरी स्तुति करके ऋषियोंने मुझे प्रणाम किया॥ २०॥ |
| ब्रह्मा हरिश्च रुद्रश्च शक्रः साक्षाच्छिवाम्बिका।<br>जीवश्चेन्दुर्महातेजा भास्करः पवनोऽनलः ॥ २१<br><br>ईशानो निर्ऋतिर्यक्षो यमो वरुण एव च।<br>विश्वेदेवास्तथा रुद्रा वसवश्च महाबलाः ॥ २२ | ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, साक्षात् अम्बिका शिवा, देवगुरु बृहस्पति, चन्द्रमा, महातेजस्वी सूर्य, वायु, अग्नि, ईशान, निर्ऋति, यक्ष, यम, वरुण, विश्वेदेव, |
| १९२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| लक्ष्मीः साक्षाच्छची ज्येष्ठा देवी चैव सरस्वती।<br>अदितिश्च दितिश्चैव श्रद्धा लज्जा धृतिस्तथा॥ २३<br>नन्दा भद्रा च सुरभी सुशीला सुमनास्तथा।<br>वृषेन्द्रश्च महातेजा धर्मो धर्मात्मजस्तथा॥ २४<br>आवृत्य मां तथालिङ्ग्य तुष्टुवुर्मुनिसत्तम।<br>शिलादोऽपि मुनिर्दृष्ट्वा पिता मे तादृशं तदा॥ २५<br>प्रीत्या प्रणम्य पुण्यात्मा तुष्टावेष्टप्रदं सुतम्। | सभी रुद्र, महाबली वसुगण, साक्षात् लक्ष्मी, इन्द्राणी, देवी ज्येष्ठा, सरस्वती, अदिति, दिति, श्रद्धा, लज्जा, धृति, नन्दा, भद्रा, सुरभी, सुशीला, सुमना, वृषेन्द्र, महातेजस्वी धर्म तथा धर्मपुत्र मुझे घेरकर मेरा आलिङ्गन करके मेरी स्तुति करने लगे। हे मुनिश्रेष्ठ! उस समय पुण्य आत्मावाले मेरे पिता मुनि शिलाद भी उस प्रकारके रूपवाले इष्टप्रद पुत्रको देखकर प्रेमपूर्वक प्रणाम करके मेरी स्तुति करने लगे॥ २१-२५ १/२॥ |
| शिलाद उवाच<br>भगवन् देवदेवेश त्र्यम्बक ममाव्यय॥ २६<br>पुत्रोऽसि जगतां यस्मात्त्राता दुःखाद्वि किं पुनः।<br>रक्षको जगतां यस्मात्पिता मे पुत्र सर्वग॥ २७<br>अयोनिज नमस्तुभ्यं जगद्योने पितामह।<br>पिता पुत्र महेशान जगतां च जगद्गुरो॥ २८<br>वत्स वत्स महाभाग पाहि मां परमेश्वर।<br>त्वयाहं नन्दितो यस्मान्नन्दी नाम्ना सुरेश्वर॥ २९ | **शिलाद बोले—**हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्र्यम्बक! हे अव्यय! आप मेरे पुत्र हैं और जगत्के रक्षक हैं, अतः अब मुझे दुःख किस बातका! हे पुत्र! हे सर्वग (सर्वव्यापी)! आप जगत्के रक्षक हैं, अतः मेरे भी पिता हैं। हे अयोनिज! आपको नमस्कार है। हे जगद्योने! हे पितामह! हे पुत्र! हे महेशान! हे जगद्गुरो! आप जगत्के पिता हैं। हे वत्स! हे वत्स! हे महाभाग! हे परमेश्वर! मेरी रक्षा कीजिये। हे सुरेश्वर! आपने मुझे आनन्दित किया है, अतः आप ‘नन्दी’ नामसे विख्यात होंगे; हे नन्दिन्! मुझे आनन्द प्रदान कीजिये, मैं आप जगदीश्वरको प्रणाम करता हूँ॥ २६-२९ १/२॥ |
| तस्मान्नन्दय मां नन्दिन्नमामि जगदीश्वरम्।<br>प्रसीद पितरौ मेऽद्य रुद्रलोकं गतौ विभो॥ ३०<br>पितामहाश्च भो नन्दिन्नवतीर्णे महेश्वरे।<br>ममैव सफलं लोके जन्म वै जगतां प्रभो॥ ३१<br>अवतीर्णे सुते नन्दिन् रक्षार्थं महामीश्वर।<br>तुभ्यं नमः सुरेशान नन्दीश्वर नमोऽस्तु ते॥ ३२<br>पुत्र पाहि महाबाहो देवदेव जगद्गुरो।<br>पुत्रत्वमेव नन्दीश मत्वा यत्कीर्तितं मया॥ ३३<br>त्वया तत्क्षम्यतां वत्स स्तवस्तव्य सुरारैः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि मम पुत्र प्रभाषितम्॥ ३४ | हे विभो! आप प्रसन्न होइये। हे नन्दिन्! आप महेश्वरके [मेरे यहाँ] अवतीर्ण होनेपर आज मेरे माता-पिता रुद्रलोक चले गये; पितामह, प्रपितामह आदि भी रुद्रलोक चले गये। हे जगत्प्रभो! मेरे रक्षार्थ पुत्र-रूपमें आपके अवतार लेनेपर आज संसारमें मेरा जन्म सफल हो गया। हे सुरेशान! आपको नमस्कार है। हे नन्दीश्वर! आपको नमस्कार है। हे पुत्र! हे महाबाहो! हे देवदेव! हे जगद्गुरो! मेरी रक्षा कीजिये। हे नन्दीश! देवताओं तथा दानवोंके द्वारा स्तुतियोंसे स्तवनके योग्य हे वत्स! आपके प्रति पुत्रभाव समझकर मैंने जो भी कहा है, उसे आप क्षमा करें। हे पुत्र! जो मेरेद्वारा कहे गये इस स्तवनका भक्तिपूर्वक पाठ या श्रवण करता है अथवा द्विजोंको इसे सुनाता है, वह मेरे साथ आनन्द प्राप्त करता है॥ ३०-३४ १/२॥ |
| श्रावयेद्वा द्विजान् भक्त्या मया सार्धं स मोदते।<br>एवं स्तुत्वा सुतं बालं प्रणम्य बहुमानतः॥ ३५ | इस प्रकार बालरूप पुत्र नन्दीकी स्तुति करके अत्यन्त आदरपूर्वक उन्हें प्रणामकर उत्तम व्रत धारण |