श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ४१ ] विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य...नामाष्टकस्तुतिका वर्णन १८९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रुत्वा वचस्ततस्तस्य स्वप्नभूतं मनोगतम्।<br>पितामहः प्रसन्नात्मा नेत्रैः फुल्लाम्बुजप्रभैः॥ ५२<br>ततः प्रत्यागतप्राणः समुदैक्षन्महेश्वरम्।<br>स उद्वीक्ष्य चिरं कालं स्निग्धगम्भीरया गिरा॥ ५३<br>उवाच भगवान् ब्रह्मा समुत्थाय कृताञ्जलिः।<br>भो भो वद महाभाग आनन्दयसि मे मनः॥ ५४<br>को भवानष्टमूर्तिर्वै स्थित एकादशात्मकः। | तब उनका स्वप्नभूत मनोगत वचन सुनकर पितामह प्रसन्नचित्त हो गये। तदनन्तर लब्धप्राण ब्रह्माजीने अपने खिले हुए कमलके समान नेत्रोंसे महेश्वरको देखा। बहुत समयतक उन्हें देखते रहनेके पश्चात् भगवान् ब्रह्माने उठ करके दोनों हाथ जोड़कर स्नेहयुक्त गम्भीर वाणीमें उनसे कहा—हे महाभाग! आप मेरे मनको आनन्दित कर रहे हैं; एकादश रूपोंमें प्रतिष्ठित अष्टमूर्ति आप कौन हैं?॥ ५२—५४ १/२ ॥ |
| इन्द्र उवाच<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा व्याजहार महेश्वरः॥ ५५<br>स्पृशन् कराभ्यां ब्रह्माणं सुखाभ्यां स सुरारिहा। | **इन्द्र बोले—**उनका वचन सुनकर देवशत्रुओंका संहार करनेवाले महेश्वर अपने सुखप्रद हाथोंसे ब्रह्माजीका स्पर्श करते हुए उनसे कहने लगे॥ ५५ १/२ ॥ |
| श्रीशङ्कर उवाच<br>मां विद्धि परमात्मानमेनां मायामजामिति॥ ५६<br>एते वै संस्थिता रुद्रास्त्वां रक्षितुमिहागताः। | **श्रीशंकर बोले—**मुझे परमात्मा तथा इन्हें अजन्मा माया समझिये और सामने खड़े ये रुद्र आपकी रक्षा करनेके लिये यहाँ आये हैं॥ ५६ १/२ ॥ |
| ततः प्रणम्य तं ब्रह्मा देवदेवमुवाच ह॥ ५७<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा हर्षगद्गदया गिरा।<br>भगवन् देवदेवेश दुःखैराकुलितो ह्यहम्॥ ५८<br>संसारान्मोक्तुमीशान मामिहार्हसि शङ्कर।<br>ततः प्रहस्य भगवान् पितामहमुमापतिः॥ ५९<br>तदा रुद्रैर्जगन्नाथस्तया चान्तर्दधे विभुः। | तदनन्तर उन देवाधिदेवको प्रणाम करके ब्रह्माने हाथ जोड़कर हर्षपूर्ण गद्गद वाणीमें कहा—हे भगवन्! हे देवदेवेश! मैं दुःखोंसे अत्यन्त व्याकुल हूँ। हे ईशान! हे शंकर! मुझे इस संसारसे मुक्त करनेमें आप समर्थ हैं॥ ५७-५८ १/२ ॥<br>तत्पश्चात् पितामह ब्रह्माकी इस बातपर हँसकर सर्व-व्यापी तथा जगत्के स्वामी उमापति भगवान् शिव रुद्रों एवं उन भगवती उमाके साथ अन्तर्धान हो गये॥ ५९ १/२ ॥ |
| इन्द्र उवाच<br>तस्माच्छिलाद लोकेषु दुर्लभो वै त्वयोनिजः॥ ६०<br>मृत्युहीनः पुमान् विद्धि समृत्युः पद्मजोऽपि सः।<br>किन्तु देवेश्वरो रुद्रः प्रसीदति यदीश्वरः॥ ६१<br>न दुर्लभो मृत्युहीनस्तव पुत्रो ह्ययोनिजः।<br>मया च विष्णुना चैव ब्रह्मणा च महात्मना॥ ६२<br>अयोनिजं मृत्युहीनमसमर्थं निवेदितुम्। | **इन्द्र बोले—**हे शिलाद! अतः समस्त लोकोंमें अयोनिज तथा मृत्युरहित पुरुष सर्वथा दुर्लभ है। [यहाँतक कि] वे पद्मयोनि ब्रह्मा भी मृत्युयुक्त हैं—ऐसा जानिये। किंतु यदि देवेश्वर भगवान् रुद्र प्रसन्न हो जायें, तो आपके लिये मृत्युरहित तथा अयोनिज पुत्र दुर्लभ नहीं है। मैं, विष्णु एवं महात्मा ब्रह्मा भी मृत्युहीन तथा अयोनिज पुत्र देनेमें असमर्थ हैं॥ ६०—६२ १/२ ॥ |
| शैलादिरुवाच<br>एवं व्याहृत्य विप्रेन्द्रमनुगृह्य च तं घृणी॥ ६३<br>देवैर्वृतो ययौ देवः सितेनेभेन वै प्रभुः॥ ६४ | **शैलादि बोले—**इस प्रकार विप्रेन्द्रसे कहकर तथा उनपर अनुग्रह करके वे दयालु इन्द्र देवताओंके साथ श्वेतवर्णवाले ऐरावतपर आरूढ़ होकर चले गये॥ ६३-६४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे इन्द्रवाक्यं नामैकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'इन्द्रवाक्य' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४१ ॥