भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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| १८८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
भगवान् ब्रह्माने प्रजाओंकी सृष्टि करनेके विचारसे अत्यन्त उग्र तप आरम्भ कर दिया ॥ ३७-३८ ॥
तस्यैवं तप्यमानस्य न किञ्चित्समवर्तत ।<br>ततो दीर्घेण कालेन दुःखात्क्रोधो व्यजायत ॥ ३९<br>क्रोधाविष्टस्य नेत्राभ्यां प्रापतन्नश्रुबिन्दवः ।<br>ततस्तेभ्योऽश्रुबिन्दुभ्यो भूताः प्रेतास्तदाभवन् ॥ ४०इस प्रकार तप करते हुए उन ब्रह्माको जब कोई सफलता प्राप्त न हुई; तब दीर्घकालतक तप करनेसे उत्पन्न दुःखके कारण उन्हें क्रोध आ गया। तब क्रोधाविष्ट उन ब्रह्माके नेत्रोंसे अश्रुबिन्दु गिरने लगे। तदनन्तर उन अश्रुबिन्दुओंसे भूत-प्रेत प्रादुर्भूत हो गये ॥ ३९-४० ॥
सर्वांस्तानग्रजान् दृष्ट्वा भूतप्रेतनिशाचरान् ।<br>अनिन्दत तदा देवो ब्रह्मात्मानमजो विभुः ॥ ४१<br>जहौ प्राणांश्च भगवान् क्रोधाविष्टः प्रजापतिः ।तब उन सभी भूत-प्रेत-निशाचरोंको पहले उत्पन्न हुआ देखकर अजन्मा तथा परम ऐश्वर्यशाली भगवान् ब्रह्मा अपनेको कोसने लगे। इससे उन भगवान् पितामहने कोपाविष्ट होकर अपने प्राण त्याग दिये ॥ ४१ १/२ ॥
ततः प्राणमयो रुद्रः प्रादुरासीत्प्रभोर्मुखात् ॥ ४२<br>अर्धनारीश्वरो भूत्वा बालार्कसदृशद्युतिः ।<br>तदैकादशधात्मानं प्रविभज्य व्यवस्थितः ॥ ४३<br>अर्धेनांशेन सर्वात्मा ससर्जासौ शिवामुमाम् ।तत्पश्चात् उन प्रभुके मुखसे उदयकालीन सूर्यके समान कान्तिवाले अर्धनारीश्वरके रूपमें होकर प्राणमय रुद्र प्रकट हुए। तब वे अपनेको ग्यारह स्वरूपोंमें* विभक्त करके व्यवस्थित हो गये। उन सर्वात्मा रुद्रने अपने आधे अंशसे कल्याणकारिणी उमाको आविर्भूत किया ॥ ४२-४३ १/२ ॥
सा चासृजत्तदा लक्ष्मीं दुर्गां श्रेष्ठां सरस्वतीम् ॥ ४४<br>वामां रौद्रीं महामायां वैष्णवीं वारिजेक्षणाम् ।<br>कलां विकरिणीं चैव कालीं कमलवासिनीम् ॥ ४५<br>बलविकरिणीं देवीं बलप्रमथिनीं तथा ।<br>सर्वभूतस्य दमनीं ससृजे च मनोन्मनीम् ॥ ४६<br>तथान्या बहवः सृष्टास्तया नार्यः सहस्रशः ।तत्पश्चात् उमाने लक्ष्मी, दुर्गा तथा श्रेष्ठ सरस्वतीका सृजन किया; पुनः उन्होंने वामा, रौद्री, महामाया, कमलके समान नेत्रोंवाली वैष्णवी, कल-विकरिणी, काली, कमल-वासिनी, बलविकरिणी, देवी बलप्रमथिनी, सर्वभूतदमनी और मनोन्मनीका सृजन किया। इसी प्रकार उन्होंने अन्य बहुत-सी हजारों नारियोंकी सृष्टि की ॥ ४४-४६ १/२ ॥
रुद्रैश्चैव महादेवस्ताभिस्त्रिभुवनेश्वरः ॥ ४७<br>सर्वात्मनश्च तस्याग्रे ह्यतिष्ठत्परमेश्वरः ।<br>मृतस्य तस्य देवस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥ ४८<br>घृणी ददौ पुनः प्राणान् ब्रह्मपुत्रो महेश्वरः ।<br>ब्रह्मणः प्रददौ प्राणानात्मस्थांस्तु तदा प्रभुः ॥ ४९<br>प्रहृष्टोऽभूत्ततो रुद्रः किञ्चित्प्रत्यागतासवम् ।<br>अभ्यभाषत देवेशो ब्रह्माणं परमं वचः ॥ ५०<br>मा भैर्देव महाभाग विरिञ्च जगतां गुरो ।<br>मयेह स्थापिताः प्राणास्तस्मादुत्तिष्ठ वै प्रभो ॥ ५१तब तीनों लोकोंके स्वामी परमेश्वर महादेव समस्त रुद्रों तथा उन देवियोंके साथ उन सर्वात्मा ब्रह्माके समक्ष खड़े हो गये। तदनन्तर ब्रह्मपुत्र दयालु महेश्वर शिवने उन मरे हुए परमेष्ठी भगवान् ब्रह्माको पुनः प्राण प्रदान कर दिये। जब प्रभु शिवने ब्रह्मामें आत्मस्थित प्राणोंका संचार किया, तब उन्हें कुछ-कुछ चेतनायुक्त देखकर भगवान् रुद्र अत्यन्त प्रसन्न हुए। इसके बाद देवेश्वर शिवने ब्रह्माजीसे यह श्रेष्ठ वचन कहा—हे देव! डरिये मत! हे महाभाग! हे विरिञ्च! हे जगद्गुरो! मैंने आपमें प्राण स्थापित कर दिये हैं; अतः हे प्रभो! अब उठिये ॥ ४७-५१ ॥

* भगवान् रुद्रके ग्यारह नामोंका वर्णन विभिन्न पुराणोंमें आया है, किंतु नामोंमें अन्तर है, लिङ्गपुराण पूर्वभाग अ० ६३में ११ रुद्रोंके नाम इस प्रकार बताये गये हैं—अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, भैरव, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी तथा अपराजित।