श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ४१] विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य... नामाष्टकस्तुतिका वर्णन १८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यमपुष्पादिभिः पूज्यं याज्यं ह्याजयदव्ययम्।<br>तस्य हृत्कमलस्थस्य नियोगाच्चांशजो विभुः॥ २४<br>ललाटमस्य निर्भिद्य प्रादुरासीत्पितामहात्।<br>लोहितोऽभूत्स्वयं नीलः शिवस्य हृदयोद्भवः॥ २५<br>वह्नेश्चैव तु संयोगात्प्रकृत्या पुरुषः प्रभुः।<br>नीलश्च लोहितश्चैव यतः कालाकृतिः पुमान्॥ २६<br>नीललोहित इत्युक्तस्तेन देवेन वै प्रभुः।<br>ब्रह्मणा भगवान् कालः प्रीतात्मा चाभवद्विभुः॥ २७<br>सुप्रीतमनसं देवं तुष्टाव च पितामहः।<br>नामाष्टकेन विश्वात्मा विश्वात्मानं महामुने॥ २८ | सदृश, यम-नियम आदि योगांग पुष्पोंके द्वारा पूजनीय तथा अविनाशी ईश्वरको अपने हृदयमें ध्यानावस्थित करके उनकी पूजा की॥ २०—२३ १/२॥<br><br>तब हृदयकमलमें विराजमान रहनेवाले उन ब्रह्माके अंशसे जायमान सर्वव्यापी रुद्र उनके ललाटका भेदन करके पितामहसे उत्पन्न हुए। शिवके हृदयसे प्रादुर्भूत पुरुष रुद्र स्वभावतः स्वयं नील होते हुए भी अग्निके संयोगके कारण लोहित (रक्त) वर्णके हो गये। चूँकि वे कालाकृति पुरुष रुद्र नील और लोहित वर्णके हुए, अतः वे ब्रह्मदेव प्रभु रुद्रको 'नीललोहित'—ऐसा कहने लगे। कालरूप भगवान् रुद्र ब्रह्माजीसे अत्यन्त प्रसन्न हुए। हे महामुने! तदनन्तर विश्वात्मा पितामह ब्रह्मा नामाष्टक स्तोत्रसे प्रसन्नचित्त विश्वात्मा भगवान् रुद्रकी स्तुति करने लगे॥ २४—२८॥ |
| पितामह उवाच<br>नमस्ते भगवन् रुद्र भास्करामिततेजसे।<br>नमो भवाय देवाय रसायाम्बुमयाय ते॥ २९<br>शर्वाय क्षितिरूपाय सदा सुरभिणे नमः।<br>ईशाय वायवे तुभ्यं संस्पर्शाय नमो नमः॥ ३०<br>पशूनां पतये चैव पावकायातितेजसे।<br>भीमाय व्योमरूपाय शब्दमात्राय ते नमः॥ ३१<br>महादेवाय सोमाय अमृताय नमोऽस्तु ते।<br>उग्राय यजमानाय नमस्ते कर्मयोगिने॥ ३२<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि पैतामहमिमं स्तवम्।<br>रुद्राय कथितं विप्रान् श्रावयेद्वा समाहितः॥ ३३<br>अष्टमूर्तेस्तु सायुज्यं वर्षादेकादवाप्नुयात्।<br>एवं स्तुत्वा महादेवमवैक्षत पितामहः॥ ३४ | **पितामह बोले—**हे भगवन्! हे रुद्र! हे भास्कर! अमित तेजस्वी आपको नमस्कार है; अम्बुमय तथा रस-स्वरूप आप भगवान् भवको नमस्कार है। गन्धमय पृथिवीरूप शर्वको नित्य नमस्कार है; स्पर्शगुणयुक्त वायुरूप ईशको बार-बार नमस्कार है। अमित तेजस्वी अग्नि-रूप पशुपतिको नमस्कार है। शब्दतन्मात्रावाले व्योमरूप आप भीमको नमस्कार है। आप अमृतमय चन्द्रस्वरूप महादेवको नमस्कार है; आप कर्मयोगी यजमानरूप उग्रको नमस्कार है। जो मनुष्य समाहितचित्त होकर पितामह ब्रह्माके द्वारा रुद्रके लिये कहे गये इस स्तोत्रका पाठ करता है या श्रवण करता है अथवा विप्रोंको सुनाता है, वह एक वर्षमें ही अष्टमूर्ति भगवान् रुद्रका सायुज्य प्राप्त कर लेता है॥ २९—३३ १/२॥ |
| तदाष्टधा महादेवः समातिष्ठत्समन्ततः।<br>तदा प्रकाशते भानुः कृष्णवर्त्मा निशाकरः॥ ३५<br>क्षितिर्वायुः पुमानम्भः सुशिरं सर्वगं तथा।<br>तदाप्रभृति तं प्राहुरष्टमूर्तिरितीश्वरम्॥ ३६ | इस प्रकार स्तुति करके जब पितामहने महादेवकी ओर देखा, तब वे सभी ओर आठ प्रकारसे विभक्त होकर सुशोभित होने लगे। उसी समयसे सूर्य, चन्द्र, अग्नि प्रकाश करने लगे और पृथिवी, वायु, यजमानरूप पुरुष, जल तथा सर्वव्यापी गगन अपने-अपने गुणधर्मसे समन्वित हुए। उसी समयसे लोग उन ईश्वरको 'अष्टमूर्ति' इस नामसे कहने लगे॥ ३४—३६॥ |
| अष्टमूर्तेः प्रसादेन विरञ्चिश्चासृजत्पुनः।<br>सृष्ट्वैतदखिलं ब्रह्मा पुनः कल्पान्तरे प्रभुः॥ ३७<br>सहस्रयुगपर्यन्तं संसुप्ते च चराचरे।<br>प्रजाः स्रष्टुमनास्तेपे तत उग्रं तपो महत्॥ ३८ | उन्हीं अष्टमूर्तिके अनुग्रहसे ब्रह्माजी पुनः सृष्टि करने लगे। इस सम्पूर्ण जगत्का सृजन करके पुनः दूसरे कल्पमें हजार युगपर्यन्त चराचर संसारके सुप्त रहनेपर |