श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| १८६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| महादेव अर्धनारीश्वरके रूपमें प्रतिष्ठित हुए। तब उन्होंने जगद्गुरु ब्रह्मसहित सब कुछ दग्ध कर दिया॥ ६-१०॥ | |
| अथार्धमात्रां कल्याणीमात्मनः परमेश्वरीम्।<br>बुभुजे योगमार्गेण वृद्ध्यर्थं जगतां शिवः॥ ११<br><br>तस्यां हरिं च ब्रह्माणं ससर्ज परमेश्वरः।<br>विश्वेश्वरस्तु विश्वात्मा चास्त्रं पाशुपतं तथा॥ १२<br><br>तस्माद् ब्रह्मा महादेव्याश्चांशजश्च हरिस्तथा।<br>अण्डजः पद्मजश्चैव भवाङ्गभव एव च॥ १३<br><br>एतत्त्ते कथितं सर्वमितिहासं पुरातनम्।<br>परार्धं ब्रह्मणो यावत्तावद्भूतिः समासतः॥ १४ | इसके बाद शिवजीने समग्र जगत्की वृद्धिके लिये योगमार्गके द्वारा कल्याणमयी अर्धमात्रास्वरूपिणी अपनी अर्धांगिनी परमेश्वरीके साथ संसर्ग किया। विश्वेश्वर विश्वात्मा परमेश्वर शिवने उन परमेश्वरीसे विष्णु, ब्रह्मा और पाशुपत अस्त्रका सृजन किया। इसीलिये ब्रह्मा तथा विष्णुको महादेवीके अंशसे उत्पन्न कहा गया है और उन ब्रह्माको अण्डज, पद्मज और भवांगभव भी कहा जाता है। मैंने आपसे यह सम्पूर्ण पुरातन इतिहास कह दिया। जबतक ब्रह्माका परार्ध रहता है, तबतकके उनके ऐश्वर्य तथा तमोगुणसे प्रादुर्भूत उनके वैराग्यके विषयमें मैं संक्षेपमें कहूँगा॥ ११-१४ १/२॥ |
| वैराग्यं ब्रह्मणो वक्ष्ये तमोद्भूतं समासतः।<br>नारायणोऽपि भगवान् द्विधा कृत्वात्मनस्तनुम्॥ १५<br><br>ससर्ज सकलं तस्मात्स्वाङ्गादेव चराचरम्।<br>ततो ब्रह्माणमसृजद् ब्रह्मा रुद्रं पितामहः॥ १६<br><br>मुने कल्पान्तरे रुद्रो हरिं ब्रह्माणमीश्वरम्।<br>ततो ब्रह्माणमसृजन्मुने कल्पान्तरे हरिः॥ १७<br><br>नारायणं पुनर्ब्रह्मा ब्रह्माणं च पुनर्भवः।<br>तदा विचार्य वै ब्रह्मा दुःखं संसार इत्यजः॥ १८<br><br>सर्गं विसृज्य चात्मानमात्मन्येव नियोज्य च।<br>संहृत्य प्राणसञ्चारं पाषाण इव निश्चलः॥ १९ | भगवान् नारायणने भी अपने शरीरको दो भागोंमें विभक्त करके अपने उसी अंगसे सम्पूर्ण चराचरकी सृष्टि की। तब उन्होंने ब्रह्माका सृजन किया और पितामह ब्रह्माने रुद्रका सृजन किया। हे मुने! दूसरे कल्पमें रुद्रने विष्णु, ब्रह्मा और ईश्वर (शिव)-को उत्पन्न किया। हे मुने! तदनन्तर दूसरे कल्पमें हरि (विष्णु)-ने ब्रह्माका सृजन किया। पुनः [दूसरे कल्पमें] ब्रह्माने नारायणको और फिर भव (रुद्र)-ने ब्रह्माकी सृष्टि की। तत्पश्चात् अजन्मा भगवान् ब्रह्मा 'यह संसार दुःखरूप है'—ऐसा सोचकर सृष्टिकार्य छोड़ करके अपनेको आत्मतत्त्वमें अवस्थितकर प्राण-संचारको निरुद्ध करके पाषाणकी भाँति अचल होकर दस हजार वर्षोंतक समाधिमें स्थित रहे॥ १५-१९ १/२॥ |
| दशवर्षसहस्राणि समाधिस्थोऽभवत्प्रभुः।<br>अधोमुखं तु यत्पद्मं हृदि संस्थं सुशोभनम्॥ २०<br><br>पूरितं पूरकेणैव प्रबुद्धं चाभवत्तदा।<br>तदूर्ध्ववक्त्रमभवत्कुम्भकेन निरोधितम्॥ २१<br><br>तत्पद्मकर्णिकामध्ये स्थापयामास चेश्वरम्।<br>तदोमिति शिवं देवमर्धमात्रापरं परम्॥ २२<br><br>मृणालत्तन्तुभागैकशतभागे व्यवस्थितम्।<br>यमी यमविशुद्धात्मा नियम्यैवं हृदीश्वरम्॥ २३ | तब उनके हृदयमें जो नीचेकी ओर मुखवाला सुन्दर कमल विराजमान था, वह पूरक प्राणायामद्वारा वायुपूरित होकर विकसित हो उठा और पुनः कुम्भक प्राणायामद्वारा वायुनिरुद्ध होकर ऊर्ध्वमुखवाला हो गया। तब उन्होंने परमेश्वरको उसी कमलकी कर्णिकाके मध्यमें स्थापित कर दिया। तदनन्तर आत्मनियन्त्रण करनेवाले, संयमके द्वारा विशुद्ध आत्मावाले तथा पूजनके योग्य ब्रह्माने ओंकार शब्दसे सम्बन्ध रखनेवाली अर्धमात्रासे परे जो नाद है, उससे भी परे ब्रह्मसंज्ञक नादस्वरूप, मृणाल-तन्तुके शतभागके एक भागमें अवस्थित परम सूक्ष्म पीतवर्ण अग्निशिखा- |