श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ४१ ] विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य तथा नामाष्टकस्तुतिका वर्णन १८५
इकतालीसवाँ अध्याय
विभिन्न कल्पोंमें त्रिदेवोंका परस्पर प्राकट्य तथा ब्रह्माद्वारा महेश्वरकी नामाष्टकस्तुतिका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इन्द्र उवाच<br>पुनः ससर्ज भगवान् प्रभ्रष्टाः पूर्ववत्प्रजाः।<br>सहस्रयुगपर्यन्ते प्रभाते तु पितामहः॥ १<br><br>एवं परार्धे विप्रेन्द्र द्विगुणे तु तथा गते।<br>तदा धराम्भसि व्याप्ता ह्यापो वह्नौ समीरणे॥ २<br><br>वह्निः समीरणश्चैव व्योम्नि तन्मात्रसंयुतः।<br>इन्द्रियाणि दशैकं च तन्मात्राणि द्विजोत्तम॥ ३<br><br>अहङ्कारमनुप्राप्य प्रलीनास्तत्क्षणादहो।<br>अभिमानस्तदा तत्र महान्तं व्याप्य वै क्षणात्॥ ४<br><br>महानपि तथा व्यक्तं प्राप्य लीनोऽभवद् द्विज।<br>अव्यक्तं स्वगुणैः सार्धं प्रलीनमभवद्द्भवे॥ ५<br><br>ततः सृष्टिर्भूतस्मात्पूर्ववत्पुरुषाच्छिवात्। | इन्द्र बोले—तत्पश्चात् एक हजार चतुर्युगीके व्यतीत हो जानेपर प्रभात वेलामें भगवान् ब्रह्माने नष्ट हुई प्रजाओंका पुनः पूर्ववत् सृजन किया। हे विप्रेन्द्र! इस प्रकार ब्रह्माके परार्धका दूना समय बीत जानेपर पृथ्वी जलमें, जल अग्निमें, अग्नि वायुमें और वायु आकाशमें अपनी-अपनी तन्मात्रासहित व्याप्त हो गये। हे द्विजश्रेष्ठ! दसों इन्द्रियाँ, मन तथा तन्मात्राएँ अहंकारको प्राप्तकर तत्क्षण उसीमें विलीन हो गयीं। अहंकार उस महत्को व्याप्त करके एवं महत् भी अव्यक्तको व्याप्त करके उसी क्षण उनमें विलीन हो गया। हे द्विज! अव्यक्त भी अपने गुणोंके साथ महेश्वरमें समाहित हो गया। इसके अनन्तर उन्हीं परम पुरुष शिवसे पूर्वकी भाँति सृष्टि होने लगी॥ १-५ <sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥ |
| अथ सृष्टास्तदा तस्य मनसा तेन मानसाः॥ ६<br><br>न व्यवर्धन्त लोकेऽस्मिन् प्रजाः कमलयोनिना।<br>वृद्ध्यर्थं भगवान् ब्रह्मा पुत्रैर्वै मानसैः सह॥ ७<br><br>दुश्चरं विचचारेशं समुद्दिश्य तपः स्वयम्।<br>तुष्टस्तु तपसा तस्य भवो ज्ञात्वा स वाञ्छितम्॥ ८<br><br>ललाटमध्यं निर्भिद्य ब्रह्मणः पुरुषस्य तु।<br>पुत्रस्नेहमिति प्रोच्य स्त्रीपुंरूपोऽभवत्तदा॥ ९ | एतदनन्तर पद्मयोनि ब्रह्माजीने अपने मनसे मानस पुत्रोंका सृजन किया। इस लोकमें जब प्रजाओंकी वृद्धि न हो सकी, तब प्रजा-वृद्धिके लिये स्वयं भगवान् ब्रह्मा अपने मानस पुत्रोंके साथ महेश्वरके निमित्त कठोर तप करने लगे। तब उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर वे महेश्वर शिव उनकी कामना समझकर उन पुरुषरूप ब्रह्माके ललाटके मध्य-भागका भेदन करके ‘मैं आपका पुत्र हूँ’—ऐसा कहकर स्त्री-पुरुषरूपमें प्रकट हो गये। |
| तस्य पुत्रो महादेवो ह्यर्धनारीश्वरोऽभवत्।<br>ददाह भगवान् सर्वं ब्रह्माणं च जगद्गुरुम्॥ १० | उनके पुत्र वे |