श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| मन्वन्तराणां सर्वेषामेतदेव तु लक्षणम्॥ ९२ । <br><br> यथा युगानां परिवर्तनानि <br> चिरप्रवृत्तानि युगस्वभावात्। <br> तथा तु सन्तिष्ठति जीवलोकः <br> क्षयोदयाभ्यां परिवर्तमानः॥ ९३ | हैं; वे ही जैसे सदा उत्पन्न होते हैं और इससे कम या अधिक नहीं। उसी प्रकार युगोंके साथ-साथ लक्षणोंसहित कल्प भी होते हैं। सभी मन्वन्तरोंका भी यही लक्षण है॥ ९०–९२॥ <br> युगोंके स्वभावके अनुसार जिस प्रकार चिरकालसे प्रवृत्त होनेवाले युगोंमें परिवर्तन होता है, उसी प्रकार युगोंके अनुरूप क्षय तथा उदयसे यह जीवलोक भी संस्थित रहता है और इसमें भी युगोंके अनुरूप परिवर्तन होता रहता है॥ ९३॥ | | इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं युगानां वै समासतः। <br> अतीतानागतानां हि सर्वमन्वन्तरेषु वै॥ ९४ | इस प्रकार सभी मन्वन्तरोंमें बीते हुए तथा आनेवाले युगोंके लक्षण संक्षेपमें कहे गये हैं॥ ९४॥ | | मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि च। <br> व्याख्यातानि न सन्देहः कल्पः कल्पेन चैव हि॥ ९५ | इसी तरह एक मन्वन्तरसे सभी मन्वन्तरोंकी व्याख्या की गयी है। एक कल्पके लक्षणोंसे सभी कल्पोंके लक्षण समझ लेना चाहिये। इस विषयमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है॥ ९५॥ | | अनागतेषु तद्वच्च तर्कः कार्यो विजानता। <br> मन्वन्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेष्विह॥ ९६ | उसी भाँति ज्ञानी पुरुषको इस लोकमें बीते हुए तथा आनेवाले सभी मन्वन्तरोंके विषयमें कल्पना कर लेनी चाहिये॥ ९६॥ | | तुल्याभिमानिनः सर्वे नामरूपैर्भवन्त्युत। <br> देवा ह्यष्टविधा ये च ये च मन्वन्तरेश्वराः॥ ९७ <br><br> ऋषयो मनवश्चैव सर्वे तुल्यप्रयोजनाः। <br> एवं वर्णाश्रमाणां तु प्रविभागो युगे युगे॥ ९८ | जो आठ प्रकारके देवता*, मन्वन्तरोंके स्वामी, ऋषिगण, मनुगण आदि हैं, वे सब तुल्य अभिमान-नाम-रूपवाले हुआ करते हैं; साथ ही उन सभीका समान प्रकारका प्रयोजन भी होता है॥ ९७½॥ | | युगस्वभावश्च तथा विधत्ते वै तदा प्रभुः। <br> वर्णाश्रमविभागांश्च युगानि युगसिद्धयः॥ ९९ <br><br> युगानां परिमाणं ते कथितं हि प्रसङ्गतः। <br> वदामि देवि पुत्रत्वं पद्मयोनेः समासतः॥ १०० | इस प्रकार मैंने युग, उनके धर्म, वर्णाश्रमोंके विभाग, युगोंकी सिद्धियाँ, युगोंके परिमाण जिन्हें युग-युगमें परमात्मा धारण करते हैं—इन सबके विषयमें आपसे प्रसंगके अनुसार कह दिया। अब मैं आपसे पद्मयोन ब्रह्माजीके देवीके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेके विषयमें संक्षेपमें कह रहा हूँ॥ ९८–१००॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे चतुर्युगपरिमाणं नाम चत्वारिंश्शोऽध्यायः ॥ ४० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'चतुर्युगपरिमाण' नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४०॥
* यहाँ गणदेवताओंका वर्ग आठ प्रकारका बताया गया है, किंतु अमरकोष (१।१।१०) तथा वाचस्पतिकोषमें गणदेवताओंके नौ वर्ग कहे गये हैं और एक-एक वर्गमें परिगणित देवताओंकी संख्याको इस प्रकार बताया गया है—
आदित्या द्वादशप्रोक्ता विश्वेदेवा दशस्मृताः। वसवश्चाष्ट संख्याताः षट्त्रिंशत् तुषिता मताः॥
आभास्वराश्चतुष्षष्टिर्वाताः पञ्चाशदूनकाः। महाराजिकानामानो द्वे शते विंशतिस्तथा॥
साध्या द्वादशविख्याता रुद्राश्चैकादशस्मृताः।
अर्थात् आदित्य १२, विश्वेदेव १०, वसु ८, तुषित ३६, आभास्वर ६४, मरुत् ४९, महाराजिक २२०, साध्य १२ और रुद्र ११ होते हैं।