श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ४० ] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास... पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति | १८३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वर्णाश्रमाचारयुतं श्रौतं स्मार्तं द्विधा तु यम्।<br>ततस्तेषु क्रियावत्सु वर्धन्ते वै प्रजाः कृते ॥ ७९ | प्रकारका धर्म होता है; उस धर्मको उन लोगोंके लिये सप्तर्षि एवं सप्तसिद्ध लोग उपदेश करते हैं। इस प्रकार उन लोगोंके कर्मनिष्ठ हो जानेपर कृतयुगमें प्रजाएँ बढ़ने लगती हैं॥ ७८-७९॥ |
| श्रौतस्मार्तकृतानां च धर्मे सप्तर्षिदर्शिते।<br>केचिद्धर्मव्यवस्थार्थं तिष्ठन्तीह युगक्षये ॥ ८० | उन सप्तर्षियोंके द्वारा श्रौत-स्मार्तसम्बन्धी धर्मोंका उपदेश करनेसे कुछ लोग युगके क्षयके समय इस पृथ्वीलोकमें धर्मकी व्यवस्थाके लिये रह जाते हैं॥ ८०॥ |
| मन्वन्तराधिकारेषु तिष्ठन्ति मुनयस्तु वै।<br>यथा दावप्रदग्धेषु तृणेष्विह ततः क्षितौ ॥ ८१<br>वनानां प्रथमं वृष्ट्या तेषां मूलेषु सम्भवः।<br>तथा कार्त्तयुगानां तु कलिजेष्विह सम्भवः ॥ ८२ | वे मुनिगण मन्वन्तरोंके अधिकारोंमें स्थित रहते हैं। जिस प्रकार इस पृथ्वीपर दावानलसे वनोंके तृण आदिके जल जानेपर बादमें प्रथम वृष्टिसे उनके मूलोंमें पुनः अंकुरण होता है; उसी प्रकार कलियुगमें उत्पन्न हुए लोगोंसे ही कृतयुगके प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है॥ ८१-८२॥ |
| एवं युगाद्युगस्येह सन्तानं तु परस्परम्।<br>वर्तते ह्यव्यवच्छेदाद्यावन्मन्वन्तरक्षयः ॥ ८३ | इस प्रकार अव्यवच्छिन्न रूपसे इस लोकमें मन्वन्तरके क्षयतक एक युगके कुछ संतान दूसरे युगमें विद्यमान रहते हैं॥ ८३॥ |
| सुखमायुर्बलं रूपं धर्मोऽर्थः काम एव च।<br>युगेष्वेतानि हीयन्ते त्रींस्त्रीन् पादान् क्रमेण तु॥ ८४ | प्रत्येक चतुर्युगीमें सुख, आयु, बल, रूप, धर्म, अर्थ तथा काम—ये सभी क्रमसे तीन-तीन पादोंके ह्रासको प्राप्त होते हैं, अर्थात् प्रत्येक युगके अन्ततक इनके एक-एक पादका ह्रास होता जाता है॥ ८४॥ |
| ससन्ध्यांशेषु हीयन्ते युगानां धर्मसिद्धयः।<br>इत्येषा प्रतिसिद्धिवैं कीर्त्तितैषा क्रमेण तु॥ ८५ | इसी प्रकार युगके सन्ध्यांशमें प्रत्येक युगकी धर्म सिद्धियोंका भी ह्रास होता है। इस तरह मैंने क्रमसे प्रत्येक सिद्धिका वर्णन कर दिया॥ ८५॥ |
| चतुर्युगानां सर्वेषामनेनैव तु साधनम्।<br>एषा चतुर्युगावृत्तिरासहस्राद्गुणीकृता॥ ८६ | इसी प्रकार सभी चारों युगोंकी स्थिति बनती है। चारों युगोंकी एक आवृत्तिका जो एक हजार गुना है; वही ब्रह्माजीका एक दिन कहा गया है और उतनी ही बड़ी उनकी एक रात कही जाती है॥ ८६ १/२॥ |
| ब्रह्मणस्तदहः प्रोक्तं रात्रिश्चैतावती स्मृता।<br>अनार्जवं जडीभावो भूतानामायुगक्षयात्॥ ८७ | ज्यों-ज्यों युगका क्षय होता है, प्राणियोंमें जड़ता-भाव तथा स्वभावकी सरलताका अभाव बढ़ता जाता है। यही सभी युगोंका लक्षण कहा गया है॥ ८७ १/२॥ |
| एतदेव तु सर्वेषां युगानां लक्षणं स्मृतम्।<br>एषां चतुर्युगाणां च गुणिता ह्येकसप्ततिः॥ ८८<br>क्रमेण परिवृत्ता तु मनोरन्तरमुच्यते।<br>चतुर्युगे यथैकस्मिन् भवतीह यदा तु यत्॥ ८९ | क्रमसे एक चतुर्युगका इकहत्तर (७१ ६/१४) बार आवर्तन एक मन्वन्तर कहा जाता है। जो व्यवहार इस चतुर्युगमें घटित होता है, वही क्रमशः दूसरे चतुर्युगोंमें भी होता है॥ ८८-८९ १/२॥ |
| तथा चान्येषु भवति पुनस्तद्वै यथाक्रमम्।<br>सर्गे सर्गे यथा भेदा उत्पद्यन्ते तथैव तु॥ ९०<br>पञ्चविंशत्परिमिता न न्यूना नाधिकास्तथा।<br>तथा कल्पा युगैः सार्धं भवन्ति सह लक्षणैः॥ ९१ | प्रत्येक सर्गमें पचीस प्रकारके भेदोंवाले जो तत्त्व होते |