भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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१९०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

बयालीसवाँ अध्याय

शिलादद्वारा तप करनेसे भगवान् महेश्वरका नन्दी नामसे उनके पुत्रके रूपमें प्रकट होना और शिलादद्वारा नन्दिकेश्वर शिवकी स्तुति

सूत उवाचसूतजी बोले—
गते पुण्ये च वरदे सहस्राक्षे शिलाशनः।<br>आराधयन् महादेवं तपसातोषयद्भवम्॥ १वर प्रदान करनेवाले पुण्यशाली सहस्रनेत्र इन्द्रके चले जानेपर वे शिलाद महादेव शिवकी आराधना करते हुए तपके द्वारा उन्हें सन्तुष्ट करने लगे॥ १॥
अथ तस्यैवमनिशं तत्परस्य द्विजस्य तु।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु गतं क्षणमिवाद्भुतम्॥ २इस प्रकार निरन्तर तपस्यामें संलग्न उन द्विज शिलादके एक हजार दिव्य वर्ष एक क्षणकी भाँति अद्भुतरूपसे व्यतीत हो गये॥ २॥
वल्मीकेनावृताङ्गश्च लक्ष्यः कीटगणैर्मुनिः।<br>वज्रसूचीमुखैश्चान्यै रक्तकीटैश्च सर्वतः॥ ३<br><br>निर्मांसरुधिरत्वग्वै निर्लेपः कुड्यवत्स्थितः।<br>अस्थिशेषोऽभवत्पश्चात्तम्मन्यत शङ्करः॥ ४<br><br>यदा स्पृष्टो मुनिस्तेन करेण च स्मरारिणा।<br>तदैव मुनिशार्दूलश्चोत्ससर्ज क्लमं द्विजः॥ ५उनका शरीर वल्मीक (बाँबी)-से ढँक गया, वे मुनि वज्रसूची (वज्र तथा सूईके समान) मुखवाले तथा अन्य रक्तभोजी कीटोंसे लिपटे शरीरवाले परिलक्षित हो रहे थे, वे मांस-रुधिर-त्वचासे विहीन होकर अस्थिमात्र शरीरवाले हो गये थे; फिर भी वे निर्लिप्त भावसे भित्तिकी भाँति निश्चल खड़े थे। तब उन्हें [इस रूपमें तप करते हुए] भगवान् शंकरने जान लिया। [वहाँ प्रकट होकर] कामरिपु शिवने ज्यों ही अपने हाथसे मुनिका स्पर्श किया, त्यों ही मुनिश्रेष्ठ द्विज शिलादका [तपस्याजनित] क्लेश समाप्त हो गया॥ ३–५॥
तपतस्तस्य तपसा प्रभुस्तुष्टोऽथ शङ्करः।<br>तुष्टस्तवेत्यथोवाच सगणश्चोमया सह॥ ६<br><br>तपसानेन किं कार्यं भवतस्ते महामते।<br>ददामि पुत्रं सर्वज्ञं सर्वशास्त्रार्थपारगम्॥ ७तदनन्तर तपस्यारत उन मुनिके तपसे सन्तुष्ट होकर भगवान् शंकरने उनसे कहा—मैं अपने गणों तथा उमासहित आपपर प्रसन्न हूँ। हे महामते! इस तपस्यासे आपका क्या प्रयोजन! मैं आपको सर्वज्ञ तथा समस्त शास्त्रोंके रहस्योंका पारगामी विद्वान् पुत्र प्रदान करता हूँ॥ ६-७॥
ततः प्रणम्य देवेशं स्तुत्वोवाच शिलाशनः।<br>हर्षगद्गदया वाचा सोमं सोमविभूषणम्॥ ८तब देवेश शिवको प्रणाम करके और उनकी स्तुति करके शिलादमुनि हर्षपूर्ण गद्गद वाणीमें चन्द्रभूषण शिवसे कहने लगे॥ ८॥
शिलाद उवाच<br>भगवन् देवदेवेश त्रिपुरार्दन शङ्कर।<br>अयोनिजं मृत्युहीनं पुत्रमिच्छामि सत्तम॥ ९**शिलाद बोले—**हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्रिपुरार्दन! हे शंकर! हे सत्तम! मैं अयोनिज तथा मृत्युहीन पुत्र चाहता हूँ॥ ९॥
सूत उवाच<br>पूर्वमाराधितः प्राह तपसा परमेश्वरः।<br>शिलादं ब्रह्मणा रुद्रः प्रीत्या परमया पुनः॥ १०**सूतजी बोले—**पूर्वमें ब्रह्माजीके द्वारा तपस्यासे आराधित परमेश्वर रुद्रने परम प्रसन्नताके साथ मुनि शिलादसे कहा॥ १०॥