श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 193, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 193
अध्याय ४२ ] भगवान् महेश्वरका नन्दी नामसे शिलादपुत्रके रूपमें प्रकट होना १९१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रीदेवदेव उवाच<br>पूर्वमाराधितो विप्र ब्रह्माणांहं तपोधन।<br>तपसा चावतारार्थं मुनिभिश्च सुरोत्तमैः ॥ ११<br><br>तव पुत्रो भविष्यामि नन्दिनाम्ना त्वयोनिजः।<br>पिता भविष्यसि मम पितुर्वै जगतां मुने ॥ १२ | **श्रीदेवदेव शिव बोले—**हे विप्र! हे तपोधन! मुनियों तथा श्रेष्ठ देवताओंसहित ब्रह्माजीने अवतार ग्रहण करनेके लिये पूर्वकालमें तपस्याके द्वारा मेरी आराधना की थी। अतः मैं नन्दी नामसे तुम्हारे अयोनिज पुत्रके रूपमें जन्म लूँगा। हे मुने! आप मुझ जगत्पिताके भी पिता होंगे॥ ११-१२॥ |
| एवमुक्त्वा मुनिं प्रेक्ष्य प्रणिपत्य स्थितं घृणी।<br>सोमः सोमोपमः प्रीतस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १३ | ऐसा कहकर सम्मुख स्थित मुनिकी ओर प्रेमपूर्वक देखकर उन्हें प्रणाम करके अमृततुल्य भगवान् शिव उमासहित वहीं अन्तर्धान हो गये॥ १३॥ |
| लब्धपुत्रः पिता रुद्रात्प्रीतो मम महामुने।<br>यज्ञाङ्गणं महत्प्राप्य यज्ञार्थं यज्ञवित्तमः ॥ १४<br><br>तदङ्गणादहं शम्भोस्तनुजस्तस्य चाज्ञया।<br>सञ्जातः पूर्वमेवाहं युगान्ताग्निसमप्रभः ॥ १५ | हे महामुने! भगवान् रुद्रसे पुत्रप्राप्तिका वरदान पाकर यज्ञविदोंमें श्रेष्ठ मेरे पिताजी यज्ञ करनेके लिये प्रसन्नतापूर्वक विशाल यज्ञशालामें पहुँचे; तब मैं पूर्व ही भगवान् रुद्रकी आज्ञासे उनके पुत्रके रूपमें उस अंगणमें प्रादुर्भूत हो गया, उस समय मैं प्रलयाग्निके समान प्रभासे समन्वित था॥ १४-१५॥ |
| ववर्षुस्तदा पुष्करावर्तकाद्या<br>जगुः खेचराः किन्नराः सिद्धसाध्याः।<br>शिलादात्मजत्वं गते मय्युपेन्द्रः<br>ससर्जाथ वृष्टिं सुपुष्पौघमिश्राम् ॥ १६ | उस समय शिलादमुनिके पुत्ररूपमें मेरे आविर्भूत होनेपर पुष्कर, आवर्तक आदि मेघ बरसने लगे; किन्नर, सिद्ध, साध्य आदि गगनचारी देवतागण गान करने लगे और इन्द्र पुष्पराशिमिश्रित वृष्टि करने लगे॥ १६॥ |
| मां दृष्ट्वा कालसूर्याभं जटामुकुटधारिणम्।<br>त्र्यक्षं चतुर्भुजं बालं शूलटङ्कगदाधरम् ॥ १७<br><br>वज्रिणं वज्रदंष्ट्रं च वज्रिणाराधितं शिशुम्।<br>वज्रकुण्डलिनं घोरं नीरदोपमनिःस्वनम् ॥ १८<br><br>ब्रह्माद्यास्तुष्टुवुः सर्वे सुरेन्द्रश्च मुनीश्वराः।<br>नेदुः समन्ततः सर्वे ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ १९ | उस समय कालसूर्यके समान आभावाले, जटा-मुकुट धारण किये, तीन नेत्रोंसे युक्त, चार भुजाओंवाले, हाथोंमें शूल-टंक-गदा धारण करनेवाले, वज्र लिये हुए, हीरेके सदृश उज्ज्वल दाँतोंवाले, इन्द्रके द्वारा आराधित, कानोंमें हीरेका कुण्डल धारण किये हुए, घोर विग्रहवाले तथा मेघसदृश गम्भीर ध्वनिसे सम्पन्न मुझ बाल-शिशुको देखकर ब्रह्मा आदि, इन्द्र तथा सभी मुनीश्वर स्तुति करने लगे और सभी अप्सराएँ चारों ओरसे वाद्ययन्त्र बजाने लगीं तथा नृत्य करने लगीं ॥ १७-१९॥ |
| ऋषयो मुनिशार्दूल ऋग्यजुःसामसम्भवैः।<br>मन्त्रैर्माहेश्वरैः स्तुत्वा सम्प्रणेमुर्मुदान्विताः ॥ २० | हे मुनिश्रेष्ठ! ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदके माहेश्वर मन्त्रोंके द्वारा आनन्दपूर्वक मेरी स्तुति करके ऋषियोंने मुझे प्रणाम किया॥ २०॥ |
| ब्रह्मा हरिश्च रुद्रश्च शक्रः साक्षाच्छिवाम्बिका।<br>जीवश्चेन्दुर्महातेजा भास्करः पवनोऽनलः ॥ २१<br><br>ईशानो निर्ऋतिर्यक्षो यमो वरुण एव च।<br>विश्वेदेवास्तथा रुद्रा वसवश्च महाबलाः ॥ २२ | ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, साक्षात् अम्बिका शिवा, देवगुरु बृहस्पति, चन्द्रमा, महातेजस्वी सूर्य, वायु, अग्नि, ईशान, निर्ऋति, यक्ष, यम, वरुण, विश्वेदेव, |