भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१९२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
लक्ष्मीः साक्षाच्छची ज्येष्ठा देवी चैव सरस्वती।<br>अदितिश्च दितिश्चैव श्रद्धा लज्जा धृतिस्तथा॥ २३<br>नन्दा भद्रा च सुरभी सुशीला सुमनास्तथा।<br>वृषेन्द्रश्च महातेजा धर्मो धर्मात्मजस्तथा॥ २४<br>आवृत्य मां तथालिङ्ग्य तुष्टुवुर्मुनिसत्तम।<br>शिलादोऽपि मुनिर्दृष्ट्वा पिता मे तादृशं तदा॥ २५<br>प्रीत्या प्रणम्य पुण्यात्मा तुष्टावेष्टप्रदं सुतम्।सभी रुद्र, महाबली वसुगण, साक्षात् लक्ष्मी, इन्द्राणी, देवी ज्येष्ठा, सरस्वती, अदिति, दिति, श्रद्धा, लज्जा, धृति, नन्दा, भद्रा, सुरभी, सुशीला, सुमना, वृषेन्द्र, महातेजस्वी धर्म तथा धर्मपुत्र मुझे घेरकर मेरा आलिङ्गन करके मेरी स्तुति करने लगे। हे मुनिश्रेष्ठ! उस समय पुण्य आत्मावाले मेरे पिता मुनि शिलाद भी उस प्रकारके रूपवाले इष्टप्रद पुत्रको देखकर प्रेमपूर्वक प्रणाम करके मेरी स्तुति करने लगे॥ २१-२५ १/२॥
शिलाद उवाच<br>भगवन् देवदेवेश त्र्यम्बक ममाव्यय॥ २६<br>पुत्रोऽसि जगतां यस्मात्त्राता दुःखाद्वि किं पुनः।<br>रक्षको जगतां यस्मात्पिता मे पुत्र सर्वग॥ २७<br>अयोनिज नमस्तुभ्यं जगद्योने पितामह।<br>पिता पुत्र महेशान जगतां च जगद्गुरो॥ २८<br>वत्स वत्स महाभाग पाहि मां परमेश्वर।<br>त्वयाहं नन्दितो यस्मान्नन्दी नाम्ना सुरेश्वर॥ २९**शिलाद बोले—**हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्र्यम्बक! हे अव्यय! आप मेरे पुत्र हैं और जगत्‌के रक्षक हैं, अतः अब मुझे दुःख किस बातका! हे पुत्र! हे सर्वग (सर्वव्यापी)! आप जगत्‌के रक्षक हैं, अतः मेरे भी पिता हैं। हे अयोनिज! आपको नमस्कार है। हे जगद्योने! हे पितामह! हे पुत्र! हे महेशान! हे जगद्गुरो! आप जगत्‌के पिता हैं। हे वत्स! हे वत्स! हे महाभाग! हे परमेश्वर! मेरी रक्षा कीजिये। हे सुरेश्वर! आपने मुझे आनन्दित किया है, अतः आप ‘नन्दी’ नामसे विख्यात होंगे; हे नन्दिन्! मुझे आनन्द प्रदान कीजिये, मैं आप जगदीश्वरको प्रणाम करता हूँ॥ २६-२९ १/२॥
तस्मान्नन्दय मां नन्दिन्नमामि जगदीश्वरम्।<br>प्रसीद पितरौ मेऽद्य रुद्रलोकं गतौ विभो॥ ३०<br>पितामहाश्च भो नन्दिन्नवतीर्णे महेश्वरे।<br>ममैव सफलं लोके जन्म वै जगतां प्रभो॥ ३१<br>अवतीर्णे सुते नन्दिन् रक्षार्थं महामीश्वर।<br>तुभ्यं नमः सुरेशान नन्दीश्वर नमोऽस्तु ते॥ ३२<br>पुत्र पाहि महाबाहो देवदेव जगद्गुरो।<br>पुत्रत्वमेव नन्दीश मत्वा यत्कीर्तितं मया॥ ३३<br>त्वया तत्क्षम्यतां वत्स स्तवस्तव्य सुरारैः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि मम पुत्र प्रभाषितम्॥ ३४हे विभो! आप प्रसन्न होइये। हे नन्दिन्! आप महेश्वरके [मेरे यहाँ] अवतीर्ण होनेपर आज मेरे माता-पिता रुद्रलोक चले गये; पितामह, प्रपितामह आदि भी रुद्रलोक चले गये। हे जगत्प्रभो! मेरे रक्षार्थ पुत्र-रूपमें आपके अवतार लेनेपर आज संसारमें मेरा जन्म सफल हो गया। हे सुरेशान! आपको नमस्कार है। हे नन्दीश्वर! आपको नमस्कार है। हे पुत्र! हे महाबाहो! हे देवदेव! हे जगद्गुरो! मेरी रक्षा कीजिये। हे नन्दीश! देवताओं तथा दानवोंके द्वारा स्तुतियोंसे स्तवनके योग्य हे वत्स! आपके प्रति पुत्रभाव समझकर मैंने जो भी कहा है, उसे आप क्षमा करें। हे पुत्र! जो मेरेद्वारा कहे गये इस स्तवनका भक्तिपूर्वक पाठ या श्रवण करता है अथवा द्विजोंको इसे सुनाता है, वह मेरे साथ आनन्द प्राप्त करता है॥ ३०-३४ १/२॥
श्रावयेद्वा द्विजान् भक्त्या मया सार्धं स मोदते।<br>एवं स्तुत्वा सुतं बालं प्रणम्य बहुमानतः॥ ३५इस प्रकार बालरूप पुत्र नन्दीकी स्तुति करके अत्यन्त आदरपूर्वक उन्हें प्रणामकर उत्तम व्रत धारण