श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४३] शिलादद्वारा पुत्र नन्दिकेश्वरको वेदादिकी शिक्षा प्रदान करना १९३
| मुनीश्वरांश्च सम्प्रेक्ष्य शिलादोवाच सुव्रतः।<br>पश्यध्वं मुनयः सर्वे महाभाग्यं ममाव्ययः॥ ३६<br><br>नन्दी यज्ञाङ्गणे देवश्चावतीर्णो यतः प्रभुः।<br>मत्समः कः पुमाँल्लोके देवो वा दानवोऽपि वा॥ ३७<br><br>एष नन्दी यतो जातो यज्ञभूमौ हिताय मे॥ ३८ | करनेवाले मुनि शिलाद मुनीश्वरोंकी ओर देखकर बोले—हे मुनिगण! आप सभी लोग मेरे महान् अक्षुण्ण भाग्यको देख लें, जो कि मेरे यज्ञांगणमें अविनाशी भगवान् महेश्वर [मेरे पुत्र होकर] नन्दीके रूपमें अवतरित हुए हैं। सम्पूर्ण जगत्में कौन मनुष्य, देवता अथवा दानव मेरे समान है; क्योंकि मेरे हितार्थ ये नन्दी मेरी यज्ञभूमिमें प्रादुर्भूत हुए हैं॥ ३५—३८॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नन्दिकेश्वरोत्पत्तिर्नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'नन्दिकेश्वरोत्पत्ति' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४२॥
तैंतालीसवाँ अध्याय
शिलादद्वारा पुत्र नन्दिकेश्वरको वेदादिकी शिक्षा प्रदान करना, ऋषियोंद्वारा नन्दिकेश्वरकी आयु अल्प बतानेपर शिलादका दुःखी होना तथा नन्दिकेश्वरद्वारा त्र्यम्बकमन्त्रका जप एवं महेश्वर-पार्वतीद्वारा उन्हें अपने पुत्ररूपमें अमर होनेका वरदान देना
| नन्दिकेश्वर उवाच<br>मया सह पिता हृष्टः प्रणम्य च महेश्वरम्।<br>उटजं स्वं जगामाशु निधिं लब्ध्वेव निर्धनः॥ १ | नन्दिकेश्वर बोले—महेश्वरको प्रणाम करके पिताजी मुझको साथ लेकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी कुटीमें लौट गये, जैसे निर्धन व्यक्ति निधि पाकर हर्षित हो जाता है, वैसे ही वे उस समय हर्षयुक्त थे॥ १॥ | | यदागतोऽहमुटजं शिलादस्य महामुने।<br>तदा वै दैविकं रूपं त्यक्त्वा मानुष्यमास्थितः॥ २ | हे महामुने! जब मैं शिलादकी कुटीमें गया, तब अपना दैविक (दिव्य) रूप छोड़कर मैं मनुष्यरूपमें हो गया॥ २॥ | | नष्टा चैव स्मृतिर्दिव्या येन केनापि कारणात्।<br>मानुष्यमास्थितं दृष्ट्वा पिता मे लोकपूजितः॥ ३<br><br>विललापातिदुःखार्तः स्वजनैश्च समावृतः।<br>जातकर्मादिकांश्चैव चकार मम सर्ववित्॥ ४<br><br>शालङ्कायनपुत्रो वै शिलादः पुत्रवत्सलः।<br>उपदिष्टा हि तेनैव ऋक्शाखा यजुषस्तथा॥ ५ | [उस समय] किसी अज्ञात कारणवश मेरी दिव्य स्मृति नष्ट हो गयी। लोकपूजित मेरे पिताजीने मुझे मानवरूपमें देखकर अपने बन्धुओंसहित दुःखसे व्याकुल होकर अत्यधिक विलाप किया। पुत्रवत्सल तथा सर्वज्ञ शालंकायनपुत्र शिलादने मेरे जातकर्म आदि संस्कार किये॥ ३-४½॥ | | सामशाखासहस्रं च साङ्गोपाङ्गं महामुने।<br>आयुर्वेदं धनुर्वेदं गान्धर्वं चाश्वलक्षणम्॥ ६<br><br>हस्तिनां चरितं चैव नराणां चैव लक्षणम्।<br>सम्पूर्णे सप्तमे वर्षे ततोऽथ मुनिसत्तमौ॥ ७ | हे महामुने! उन्होंने ही मुझको ऋग्वेद तथा यजुर्वेदकी शाखाओं और सामवेदकी हजार शाखाओंका सांगोपांग उपदेश किया। साथ ही उन्होंने मुझे आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्वविद्या, अश्वलक्षण, हाथियोंके लक्षण, मनुष्योंके लक्षण आदिकी शिक्षा प्रदान की॥ ५-६½॥ | | मित्रावरुणनामानौ तपोयोगबलान्वितौ।<br>तस्याश्रमं गतौ दिव्यौ द्रष्टुं मां चाज्ञया विभोः॥ ८ | मेरा सातवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर परमेश्वरकी आज्ञासे मुझे देखनेके लिये तप तथा योगशक्तिसे सम्पन्न मित्र- |