भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 196
संस्कृतहिन्दी
वरुण नामक दो दिव्य मुनिश्रेष्ठ उनके (मेरे पिताके) आश्रममें गये॥ ७-८॥
ऊचतुश्च महात्मानौ मां निरीक्ष्य मुहुर्मुहुः।<br>तात नन्द्ययमल्पायुः सर्वशास्त्रार्थपारगः॥ ९मुझको बार-बार देखकर उन दोनों महात्माओंने कहा—हे तात! यह नन्दी सभी शास्त्रोंके ज्ञानमें पारंगत होगा, किंतु यह अल्प आयुवाला है। ऐसा आश्चर्य तो कभी नहीं देखा गया है, इसकी आयु आजसे मात्र एक वर्षकी है॥ ९ १/२॥
न दृष्टमेवमाश्चर्यमायुर्वर्षादतः परम्।<br>इत्युक्तवति विप्रेन्द्रः शिलादः पुत्रवत्सलः॥ १०<br><br>समालिङ्ग्य च दुःखार्तो रुरोदातीव विस्वरम्।<br>हा पुत्र पुत्र पुत्रेति पपात च समन्ततः॥ ११<br><br>अहो बलं दैवविधेर्विधातुश्चेति दुःखितः।उनके ऐसा कहनेपर पुत्रसे स्नेह रखनेवाले विप्रवर शिलाद मेरा आलिंगन करके दुःखसे व्याकुल होकर करुण स्वरमें अत्यधिक रुदन करने लगे—हा पुत्र! हा पुत्र! हा पुत्र! अहो, दैवविधि तथा विधाताका ऐसा बल! [यह कहकर] वे दुःखित होकर भूमिपर गिर पड़े॥ १०-११ १/२॥
तस्य चार्तस्वरं श्रुत्वा तदाश्रमनिवासिनः॥ १२<br><br>निपेतुर्विह्वलात्यर्थं रक्षाश्चक्रुश्च मङ्गलम्।<br>तुष्टुवुश्च महादेवं त्रियम्बकमुमापतिम्॥ १३<br><br>हुत्वा त्रियम्बकेनैव मधुनाव च सम्प्लुताम्।<br>दूर्वामयुतसंख्यातां सर्वद्रव्यसमन्विताम्॥ १४तब उनकी दुःखभरी वाणी सुनकर आश्रमवासी इकट्ठे हो गये। वे [इस अशुभके लिये] विह्वल होकर मंगल रक्षाकृत्य करने लगे। उन्होंने अन्य सभी सामग्रियोंसहित मधुलिप्त दस हजार दूर्वाकी त्रियम्बक मन्त्रसे आहुति देकर उमापति त्रियम्बक महादेवको सन्तुष्ट किया॥ १२—१४॥
पिता विगतसंज्ञश्च तथा चैव पितामहः।<br>विचेष्टश्च ललापासौ मृतवन्निपपात च॥ १५पिताजी संज्ञाशून्य हो गये। पितामहने भी बहुत विलाप किया, वे भी चेतनारहित हो मृतकी भाँति पड़े रहे॥ १५॥
मृत्योर्भीतोऽहमचिराच्छिरसा चाभिवन्द्य तम्।<br>मृतवत्पतितं साक्षात्पितरं च पितामहम्॥ १६<br><br>प्रदक्षिणीकृत्य च तं रुद्रजाप्यरतोऽभवम्।<br>हृत्पुण्डरीके सुषिरे ध्यात्वा देवं त्रियम्बकम्॥ १७<br><br>त्र्यक्षं दशभुजं शान्तं पञ्चवक्त्रं सदाशिवम्।<br>सरितश्चान्तरे पुण्ये स्थितं मां परमेश्वरः॥ १८मैं मृत्युसे भयभीत हो गया और साक्षात् मृतककी भाँति [भूमिपर पड़े हुए] अपने पिता तथा पितामहको शीघ्रतापूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम करके एवं उनकी प्रदक्षिणा करके रुद्रजपमें संलग्न हो गया। त्रिनेत्र, दस भुजाओंवाले, शान्त, पाँच मुखोंवाले, सदाशिव भगवान् त्रियम्बकका अपने हृदयकमलमें ध्यान करके मैं जप कर रहा था; [तब मैंने देखा कि] नदीके पुण्यतटपर मैं स्थित हूँ और अर्धचन्द्रमाको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले महादेव उमासहित प्रसन्न होकर [प्रकट हुए और] मुझसे कहने लगे—॥ १६—१८ १/२॥
तुष्टोऽब्रवीन्महादेवः सोमः सोमार्धभूषणः।<br>वत्स नन्दिन् महाबाहो मृत्योर्भीतिः कुतस्तव॥ १९<br><br>मयैव प्रेषितौ विप्रौ मत्समस्त्वं न संशयः।<br>वत्सैतत्तव देहं च लौकिकं परमार्थतः॥ २०हे वत्स! हे नन्दिन्! हे महाबाहो! तुमको भला मृत्युसे भय कहाँ, मैंने ही उन दोनों विप्रोंको भेजा
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