भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ४३ ] शिलादद्वारा पुत्र नन्दिकेश्वरको वेदादिकी शिक्षा प्रदान करना [ १९५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नास्त्येव दैविकं दृष्टं शिलादेन पुरा तव।<br>देवैश्च मुनिभिः सिद्धैर्गन्धर्वैर्दानवोत्तमैः॥ २१<br>पूजितं यत्पुरा वत्स दैविकं नन्दिकेश्वर।<br>संसारस्य स्वभावोऽयं सुखं दुःखं पुनः पुनः॥ २२<br>नृणां योनिपरित्यागः सर्वथैव विवेकिनः।था, तुम मेरे ही समान हो, इसमें सन्देह नहीं है। हे वत्स! वास्तवमें तुम्हारा यह देह लौकिक नहीं है, यह दिव्य है। हे वत्स! पूर्वमें शिलाद, देवताओं, मुनियों, सिद्धों, गन्धर्वों तथा श्रेष्ठ दानवोंने तुम्हारे जिस शरीरका दर्शन किया था और जिसका पूजन किया था, वह दिव्य था। हे नन्दिकेश्वर! संसारका यह स्वभाव है कि सुख-दुःख बार-बार आते रहते हैं। मनुष्योंके लिये स्त्रीभोगका परित्याग ही सर्वथा उचित है—ऐसा विवेकी पुरुष कहते हैं॥ १९—२२ १/२॥
एवमुक्त्वा तु मां साक्षात्सर्वदेवमहेश्वरः॥ २३<br>कराभ्यां सुशुभाभ्यां च उभाभ्यां परमेश्वरः।<br>पस्पर्श भगवान् रुद्रः परमार्तिहरो हरः॥ २४<br>उवाच च महादेवस्तुष्टात्मा वृषभध्वजः।<br>निरीक्ष्य गणपांश्चैव देवीं हिमवतः सुताम्॥ २५मुझसे ऐसा कहकर महान् कष्टोंको दूर करनेवाले, सभी देवताओंके महेश्वर, भगवान् रुद्र, हर, वृषभध्वज तथा परमेश्वर महादेवने अपने दोनों अत्यन्त शुभ हाथोंसे मुझे स्पर्श किया और उनका मन प्रसन्न हो गया। तदनन्तर गणेश्वरोंको एवं हिमालयपुत्री पार्वतीको भलीभाँति देखकर वे सुरेश्वर महादेव प्रसन्नचित्त होकर मेरी ओर देखकर कहने लगे—॥ २३—२५ १/२॥
समालोक्य च तुष्टात्मा महादेवः सुरेश्वरः।<br>अजरो जरया त्यक्तो नित्यं दुःखविवर्जितः॥ २६<br>अक्षयश्चाव्ययश्चैव सपिता ससुहृज्जनः।<br>ममेष्टो गणपश्चैव मद्वीर्यो मत्पराक्रमः॥ २७<br>इष्टो मम सदा चैव मम पार्श्वगतः सदा।<br>मद्बलश्चैव भविता महायोगबलान्वितः॥ २८तुम अपने पिता तथा सुहृज्जनोंसहित अजर-अमर, बुढ़ापारहित, दुःखसे हीन, क्षयरहित एवं अव्यय रहोगे। तुम मेरे प्रिय गणेश्वर होओ, तुम मेरे समान तेज तथा पराक्रमवाले होओ। तुम सदा मेरे इष्ट बनकर सदा मेरे समीप विराजमान रहोगे। तुम मेरे सदृश बलशाली एवं महान् योगबलसे सम्पन्न होओगे॥ २६—२८॥
एवमुक्त्वा च मां देवो भगवान् सगणस्तदा।<br>कुशेशयमयीं मालां समुन्मुच्यात्मनस्तदा॥ २९<br>आबबन्ध महातेजा मम देवो वृषध्वजः।<br>तयाहं मालया जातः शुभया कण्ठसक्तया॥ ३०मुझसे ऐसा कहकर गणोंसहित महातेजस्वी वृषभध्वज भगवान् महादेवने कुशेशयमयी अर्थात् शतदलकमलसे निर्मित अपनी माला उतारकर मेरे कण्ठमें बाँध दी। कण्ठमें बँधी हुई उस सुन्दर मालासे मैं तीन नेत्रोंवाले तथा दस भुजाओंवाले दूसरे शंकरके समान हो गया॥ २९—३० १/२॥
त्र्यक्षो दशभुजश्चैव द्वितीय इव शङ्करः।<br>तत एव समादाय हस्तेन परमेश्वरः॥ ३१<br>उवाच ब्रूहि किं तेऽद्य ददामि वरमुत्तमम्।<br>ततो जटाश्रितं वारि गृहीत्वा चातिनिर्मलम्॥ ३२तत्पश्चात् परमेश्वरने मुझको हाथसे पकड़कर कहा—बोलो, मैं तुम्हें कौन-सा उत्तम वर प्रदान करूँ? तब उन वृषभध्वजने अपनी जटामें समाहित अति निर्मल