भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१९६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| उक्त्वा नदी भवस्वेति उत्ससर्ज वृषध्वजः।<br>ततः सा दिव्यतोया च पूर्णासितजला शुभा॥ ३३<br><br>पद्मोत्पलवनोपेता प्रावर्तत महानदी। | जलको [हाथमें] लेकर कहा—नदी हो जाओ—ऐसा कहकर उन्होंने जलको छोड़ दिया। तब दिव्य जलवाली, श्याम जलसे परिपूर्ण, कमल तथा उत्पलके वनोंसे युक्त शुभ महानदी बन गयी॥ ३१—३३१/२ ॥ | | तामाह च महादेवे नदीं परमशोभनाम्॥ ३४<br><br>यस्माज्जटोदकादेव प्रवृत्ता त्वं महानदी।<br>तस्माज्जतोदका पुण्या भविष्यसि सरिद्वरा॥ ३५<br><br>त्वयि स्नात्वा नरः कश्चित्सर्वपापैः प्रमुच्यते। | तदनन्तर महादेवने उस परम सुन्दर नदीसे कहा—चूँकि तुम जटाके जलसे महानदीके रूपमें निकली हो, अतः तुम्हारा नाम जटोदका होगा। तुम पवित्र तथा नदियोंमें श्रेष्ठ होओगी। कोई भी मनुष्य तुम्हारे जलमें स्नान करके सभी पापोंसे मुक्त हो जायगा॥ ३४-३५१/२ ॥ | | ततो देव्या महादेवः शिलादतनयं प्रभुः॥ ३६<br><br>पुत्रस्तेऽयमिति प्रोच्य पादयोः संन्यपातयत्।<br>सा मामाघ्राय शिरसि पाणिभ्यां परिमार्जती॥ ३७<br><br>पुत्रप्रेम्णाभ्यषिञ्चच्च स्रोतोभिस्तनयैस्त्रिभिः।<br>पयसा शङ्खगौरेण देवदेवं निरीक्ष्य सा॥ ३८<br><br>तानि स्रोतांसि त्रीण्यस्याः स्रोतस्विन्योऽभवंस्तदा।<br>नदीं त्रिस्रोतसं देवो भगवानवदद्भवः॥ ३९ | तत्पश्चात् प्रभु महादेवने 'यह तुम्हारा पुत्र है'—ऐसा कहकर मुझ शिलादतनयको देवी पार्वतीके चरणोंमें डाल दिया। तब उन्होंने मेरा सिर सूंघकर दोनों हाथोंसे मुझे [स्नेहपूर्वक] सहलाते हुए पुनः देवदेव शंकरकी ओर देखकर पुत्रप्रेममें तीन पुत्ररूप स्रोतोंके द्वारा शंखके समान श्वेतवर्णवाले जलरूप अश्रुबिन्दुओंसे मुझे अभिसींचित कर दिया। इनके वे ही तीनों स्रोत तीन नदियाँ बन गयीं। भगवान् भव महादेवने इसे त्रिस्रोतस् (तीन धाराओंवाली) नदीकी संज्ञा प्रदान की॥ ३६—३९॥ | | त्रिस्रोतसं नदीं दृष्ट्वा वृषः परमहर्षितः।<br>ननाद नादात्तस्माच्च सरिदन्या ततोऽभवत्॥ ४०<br><br>वृषध्वनिरिति ख्याता देवदेवेन सा नदी। | उस त्रिस्रोतस् नदीको देखकर वृषने अत्यन्त प्रसन्न होकर नाद किया, तब उस ध्वनिसे एक दूसरी नदी आविर्भूत हो गयी। देवदेव शंकरने उस नदीका नाम वृषध्वनि रखा॥ ४०१/२ ॥ | | जाम्बूनदमयं चित्रं सर्वरत्नमयं शुभम्॥ ४१<br><br>स्वं देवश्चाद्भुतं दिव्यं निर्मितं विश्वकर्मणा।<br>मुकुटं चाबबन्धेशो मम मूर्ध्नि वृषध्वजः॥ ४२<br><br>कुण्डले च शुभे दिव्ये वज्रवैडूर्यभूषिते।<br>आबबन्ध महादेवः स्वयमेव महेश्वरः॥ ४३ | इसके बाद भगवान् वृषध्वजने विश्वकर्माके द्वारा निर्मित, स्वर्णमय, सभी रत्नोंसे जटिल, अलौकिक, शुभ, अद्भुत तथा दिव्य अपने मुकुटको मेरे सिरपर बाँध दिया। उन महेश्वर महादेवने हीरे तथा वैडूर्यमणिसे मण्डित दो शुभ तथा दिव्य कुण्डल [मेरे कानोंमें] स्वयं पहना दिये॥ ४१—४३॥ | | मां तथाभ्यर्चितं व्योम्नि दृष्ट्वा मेघैः प्रभाकरः।<br>मेघाम्भसा चाभ्यषिञ्चच्छिलादनमथो मुने॥ ४४<br><br>तस्याभिषिक्तस्य तदा प्रवृत्ता स्रोतसा भृशम्।<br>यस्मात्सुवर्णान्निःसृत्य नद्येषा सम्प्रवर्तते॥ ४५<br><br>स्वर्णोदकेति तामाह देवदेवस्त्रियम्बकः।<br>जाम्बूनदमयाद्यस्माद् द्वितीया मुकुटाच्छुभा॥ ४६ | हे मुने! मुझको इस प्रकार पूजित देखकर सूर्यने आकाशमें मेघोंके जलसे मुझ नन्दीका अभिसेचन किया। तब उस अभिषेकके जलसे सोनेकी नदी बन गयी। उस स्वर्णजलसे निकलकर यह नदी बनी, इसलिये देवोंके देव त्रियम्बक शिवने उसे स्वर्णोदका (स्वर्ण जलवाली) कहा। उसी प्रकार सोनेके मुकुटसे |