श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ४४ ] | भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना | १९७ |
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| प्रावर्तत नदी पुण्या ऊचुर्जाम्बूनदीति ताम्।<br>एतत्पञ्चनदं नाम जप्येश्वरसमीपगम्॥ ४७<br><br>यः पञ्चनदमासाद्य स्नात्वा जप्येश्वरेश्वरम्।<br>पूजयेच्छिवसायुज्यं प्रयात्येव न संशयः॥ ४८ | दूसरी पवित्र तथा शुभ नदी उत्पन्न हुई, अतः उसे जाम्बूनदी कहा जाता है। इस प्रकार ये पाँच नदियाँ भगवान् जप्येश्वरके समीप जानेवाली हैं। जो पंचनदपर पहुँचकर इसमें स्नान करके भगवान् जप्येश्वरेश्वरकी पूजा करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४७-४८॥ |
| अथ देवो महादेवः सर्वभूतपतिर्भवः।<br>देवीमुवाच शर्वाणीमुमां गिरिसुतामजाम्॥ ४९<br><br>देवि नन्दीश्वरं देवमभिषिञ्चामि भूतपम्।<br>गणेन्द्रं व्याहरिष्यामि किं वा त्वं मन्यसेऽव्यये॥ ५० | इसके बाद सभी भूतोंके स्वामी भगवान् महादेवने हिमालयपुत्री, अजन्मा, शर्वाणी, उमा देवीसे कहा—हे देवि! मैं भूतोंके स्वामी देव नन्दीश्वरका अभिषेचन करता हूँ और उन्हें गणेन्द्र नामवाला कहूँगा, हे अव्यये! [इस विषयमें] तुम क्या सोचती हो?॥ ४९-५०॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भवानी हर्षितानना।<br>स्मयन्ती वरदं प्राह भवं भूतपतिं पतिम्॥ ५१<br><br>सर्वलोकाधिपत्यं च गणेशत्वं तथैव च।<br>दातुमर्हसि देवेश शैलादिस्तनयो मम॥ ५२ | उनका यह वचन सुनकर हर्षयुक्त मुखवाली भवानीने वर प्रदान करनेवाले तथा भूतोंके स्वामी अपने पति शिवसे मुसकराते हुए इस प्रकार कहा—हे देवेश! शैलादि मेरा पुत्र है, अतः आप इसे सभी लोकोंका स्वामित्व और गणेशत्व प्रदान करनेकी कृपा कीजिये॥ ५१-५२॥ |
| ततः स भगवान् शर्वः सर्वलोकेश्वरेश्वरः।<br>सस्मार गणपान् दिव्यान् देवदेवो वृषध्वजः॥ ५३ | तत्पश्चात् सभी लोकेश्वरोंके भी ईश्वर, देवोंके देव, शर्व, भगवान् वृषध्वजने अपने दिव्य गणेश्वरोंका स्मरण किया॥ ५३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नन्दिकेश्वरप्रादुर्भावनन्दिकेश्वराभिषेकमन्त्रो नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'नन्दिकेश्वरप्रादुर्भाव तथा नन्दिकेश्वराभिषेकमन्त्र' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४३॥
चौवालीसवाँ अध्याय
भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना एवं सभी देवोंके द्वारा नन्दिकेश्वरका अभिषेक तथा शिवनाममन्त्रकी महिमा
| शैलादिरुवाच<br>स्मरणादेव रुद्रस्य सम्प्राप्ताश्च गणेश्वराः।<br>सर्वे सहस्रहस्ताश्च सहस्रायुधपाणयः॥ १<br><br>त्रिनेत्राश्च महात्मानस्त्रिदशैरपि वन्दिताः।<br>कोटिकालाग्निसङ्काशा जटामुकुटधारिणः॥ २<br><br>दंष्ट्राकरालवदना नित्या बुद्धाश्च निर्मलाः।<br>कोटिकोटिगणैस्तुल्यैरात्मना च गणेश्वराः।<br>असंख्याता महात्मानस्तत्राजग्मुर्मुदा युताः॥ ३ | **शैलादि बोले—**रुद्रके स्मरण करते ही गणेश्वर लोग उपस्थित हो गये। उन सभीकी हजार-हजार भुजाएँ थीं, उन्होंने हाथोंमें हजार अस्त्र धारण कर रखे थे, उनके तीन नेत्र थे, वे महान् गण देवताओंसे वन्दित हो रहे थे, वे करोड़ों कालाग्निके समान थे, वे जटामुकुट धारण किये हुए थे, दाढ़ोंके कारण वे विकराल मुखवाले थे, वे शाश्वत, शुद्ध तथा प्रबुद्ध थे, वे अपने ही समान करोड़ों-करोड़ों अनुचरोंसे युक्त थे—ऐसे असंख्य महात्मा गणेश्वर प्रसन्नताके साथ वहाँ आये॥ १–३॥ |