श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१९८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| गायन्तश्च द्रवन्तश्च नृत्यन्तश्च महाबलाः।<br>मुखाडम्बरवाद्यानि वादयन्तस्तथैव च॥ ४<br>रथैर्नागैर्हयैश्चैव सिंहमर्कटवाहनाः।<br>विमानेषु तथारूढा हेमचित्रेषु वै गणाः॥ ५ | वे महान् बलसे सम्पन्न गण गाते, दौड़ते, भागते, नाचते तथा अनेक मुखवाद्योंको बजाते हुए आये। वे रथों, हाथियों, घोड़ों, सिंहों और बन्दरोंपर सवार थे। कुछ गण स्वर्णचित्रित विमानोंपर भी आरूढ़ थे॥ ४-५॥ |
| भेरीमृदङ्गाद्यैश्च पणवानकगोमुखैः।<br>वादित्रैर्विविधैश्चान्यैः पटहैरेकपुष्करैः॥ ६<br>भेरीमुरजसंनादैराडम्बरकडिण्डिमैः ।<br>मर्दलैर्वेणुवीणाभिर्विविधैस्तालनिःस्वनैः ॥ ७<br>दर्दुरैस्तलघातैश्च कच्छपैः पणवैरपि।<br>वाद्यमानैर्महायोग्या आजग्मुर्देवसंसदम्॥ ८ | महायोगसे सम्पन्न वे गणेश्वर भेरी, मृदंग, पणव, आनक, गोमुख, पटह, एकपुष्कर, मुरज, आडम्बर, डिण्डिम, मर्दल, वेणु, वीणा, दर्दुर, तलघात, कच्छप, पणव एवं अन्य प्रकारके वाद्योंको बजाते हुए तथा विविध तालध्वनियाँ करते हुए भगवान् शिवकी सभामें आये॥ ६-८॥ |
| ते गणेशा महासत्त्वाः सर्वदेवेश्वरेश्वराः।<br>प्रणम्य देवं देवीं च इदं वचनमब्रुवन्॥ ९<br>भगवन् देवदेवेश त्र्यम्बक वृषध्वज।<br>किमर्थं च स्मृता देव आज्ञापय महाद्युते॥ १० | महान् शक्तिसे युक्त तथा सभी देवेश्वरोंके ईश्वर उन गणेश्वरोंने महादेव एवं पार्वतीको प्रणाम करके यह वचन कहा—हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्र्यम्बक! हे वृषध्वज! आपने हमलोगोंका स्मरण किसलिये किया है? हे देव! हे महाद्युते! आदेश दीजिये॥ ९-१०॥ |
| किं सागरान् शोषयामो यमं वा सह किङ्करैः।<br>हन्मो मृत्युसुतां मृत्युं पशुवद्धन्म पद्मजम्॥ ११<br>बद्ध्वेन्द्रं सह देवैश्च सह विष्णुं च वायुना।<br>आनयामः सुसङ्क्रुद्धा दैत्यान् वा सह दानवैः॥ १२<br>कस्याद्य व्यसनं घोरं करिष्यामस्तवाज्ञया।<br>कस्य वाद्योत्सवो देव सर्वकामसमृद्धये॥ १३ | क्या हमलोग समुद्रोंको सोख लें? क्या यमको उनके सेवकोंसहित मार डालें अथवा मृत्युपुत्री (जरा) तथा मृत्युको मार डालें अथवा पद्मयोनि ब्रह्माका पशुकी भाँति वध कर दें। क्या अत्यन्त कुपित होकर हमलोग देवताओंसहित इन्द्रको, वायुसहित विष्णुको अथवा दानवोंसहित दैत्योंको बाँधकर यहाँ ले आयें? हमलोग आपकी आज्ञासे आज किसका घोर अनर्थ कर डालें? हे देव! सभी कामनाओंकी समृद्धिके लिये आज किसका उत्सव है?॥ ११-१३॥ |
| तांस्तथावादिनः सर्वान् गणेशान् सर्वसम्मतान्।<br>उवाच देवः सम्पूज्य कोटिकोटिशतान् प्रभुः॥ १४<br>शृणुध्वं यत्कृते यूयमिहाहूता जगद्धिताः।<br>श्रुत्वा च प्रयतात्मानः कुरुध्वं तदशङ्किताः॥ १५<br>नन्दीश्वरोऽयं पुत्रो नः सर्वेषामीश्वरेश्वरः।<br>विप्रोऽयं नायकश्चैव सेनानीर्वः समृद्धिमान्॥ १६<br>तमिमं मम सन्देशाद्यूयं सर्वेऽपि सम्मताः।<br>सेनान्यमभिषिञ्चध्वं महायोगपतिं पतिम्॥ १७ | भगवान् शंकरने वैसा कहनेवाले उन करोड़ों-करोड़ों सभी सर्वपूज्य गणेश्वरोंका सम्मान करके उनसे कहा—हे जगत्के हितकारको! सुनिये, जिसलिये मैंने तुमलोगोंको यहाँ बुलाया है, उसे सुन करके हे शुद्धात्माओ [गणेश्वरो]! निःशंक होकर कीजिये। यह नन्दी हमारा पुत्र है। यह सभीका ईश्वर है। यह समृद्धिशाली विप्र तुमलोगोंका नायक तथा सेनानी है। अतः मेरे आदेशसे तुम सभी लोग अपना स्वामी एवं सेनानी मानकर इस महायोगपतिका अभिषेक करो॥ १४-१७॥ |
| एवमुक्ता भगवता गणपाः सर्व एव ते।<br>एवमस्त्विति सम्मन्त्र्य सम्भारानाहरंस्ततः॥ १८ | भगवान् शिवके इस प्रकार कहनेपर वे सभी |