भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ४४ ] भगवान् शिवद्वारा नन्दिकेश्वरको गणोंके अधिपतिके रूपमें प्रतिष्ठित करना १९९


श्लोकअर्थ
तस्य सर्वाश्रयं दिव्यं जाम्बूनदमयं शुभम्।<br>आसनं मेरुसङ्काशं मनोहरमुपाहरन्॥ १९<br><br>नैकस्तम्भमयं चापि चामीकरवरप्रभम्।<br>मुक्तादामावलम्बं च मणिरत्नावभासितम्॥ २०<br><br>स्तम्भैश्च वैडूर्यमयैः किङ्किणीजालसंवृतम्।<br>चारुरत्नकसंयुक्तं मण्डपं विश्वतोमुखम्॥ २१<br><br>कृत्वा विन्यस्य तन्मध्ये तदासनवरं शुभम्।<br>तस्याग्रतः पादपीठं नीलवज्रावभासितम्॥ २२<br><br>चक्रुः पादप्रतिष्ठार्थं कलशौ चास्य पार्श्वगौ।<br>सम्पूर्णौ परमाम्भोभिररविन्दावृताननौ॥ २३<br><br>कलशानां सहस्रं तु सौवर्णं राजतं तथा।<br>ताम्रजं मृण्मयं चैव सर्वतीर्थाम्बुपूरितम्॥ २४गणेश्वर 'ऐसा ही होगा'—यह कहकर आपसमें परामर्श करके सामग्रियाँ एकत्र करने लगे॥ १८॥<br><br>वे स्वर्णनिर्मित, दिव्य, सुन्दर, मेरुसदृश तथा मनोहर सिंहासन ले आये। उन्होंने अनेक स्तम्भोंवाले, उत्तम स्वर्णकी प्रभासे युक्त, लटकती हुई मोतियोंकी झालरोंसे सुशोभित, मणियों एवं रत्नोंसे जटिल, वैडूर्यमणिके स्तम्भोंवाले, किंकिणियोंसे सुशोभित, सुन्दर रत्नोंसे समन्वित तथा सभी ओर मुखवाले एक मण्डपका निर्माण करके उसके मध्यमें उस सुन्दर आसनको स्थापितकर पादप्रतिष्ठाके लिये उसके आगे नीलवज्रसे जटिल एक पादपीठ रखा। उसके दोनों ओर उन्होंने दो कलश रखे, जो सुगन्धित जलसे भरे हुए थे तथा उनके मुख कमलपुष्पोंसे ढँके हुए थे। सोने, चाँदी, ताँबे और मिट्टीके हजारों कलश वहाँ रखे थे, जो सभी तीर्थोंके जलसे परिपूर्ण थे॥ १९–२४॥
वासोयुगं तथा दिव्यं गन्धं दिव्यं तथैव च।<br>केयूरे कुण्डले चैव मुकुटं हारमेव च॥ २५<br><br>छत्रं शतशलाकं च बालव्यजनमेव च।<br>दत्तं महात्मना तेन ब्रह्मणा परमेष्ठिना॥ २६महात्मा परमेष्ठी ब्रह्माने दिव्य वस्त्रयुगल, दिव्य गन्ध, केयूर, कुण्डल, मुकुट, हार, सौ शलाकाओं (तीलियों)-वाला छत्र और एक बालव्यजन प्रदान किया॥ २५–२६॥
शङ्खहाराङ्गगौरेण पृष्ठेनापि विराजितम्।<br>व्यजनं चन्द्रशुभ्रं च हेमदण्डं सुचामरम्॥ २७<br><br>ऐरावतः सुप्रतीको गजावेतौ सुपूजितौ।<br>मुकुटं काञ्चनं चैव निर्मितं विश्वकर्मणा॥ २८<br><br>कुण्डले चामले दिव्ये वज्रं चैव वरायुधम्।<br>जाम्बूनदमयं सूत्रं केयूरद्वयमेव च॥ २९<br><br>सम्भाराणि तथान्यानि विविधानि बहून्यपि।<br>समन्तान्निन्युरव्यग्रा गणपा देवसम्मताः॥ ३०शंख तथा मोतियोंकी मालाके समान गौरवर्णवाले दण्डसे सुशोभित और चन्द्रमाके समान शुभ्र व्यजन, स्वर्णका दण्ड (मूठ) लगा हुआ चामर, भलीभाँति पूजित ऐरावत तथा सुप्रतीक—ये दो हाथी, विश्वकर्माके द्वारा बनाया हुआ एक सोनेका मुकुट, दो स्वच्छ तथा दिव्य कुण्डल, श्रेष्ठ आयुध वज्र, सोनेका सूत्र तथा दो केयूर वहाँ रखे गये। देवताओंके द्वारा पूजित उन गणेश्वरोंने चारों ओर अनेक प्रकारकी अन्य आवश्यक सामग्रियोंको सावधान होकर वहाँ उपस्थित कर दिया॥ २७–३०॥
ततो देवाश्च सेन्द्राश्च नारायणमुखास्तथा।<br>मुनयो भगवान् ब्रह्मा नवब्रह्माण एव च॥ ३१<br><br>देवैश्च लोकाः सर्वे ते ततो जग्मुर्मुदा युताः।<br>तेष्वागतेषु सर्वेषु भगवान् परमेश्वरः॥ ३२तदनन्तर इन्द्रसहित विष्णु आदि देवता, मुनिगण, भगवान् ब्रह्मा, नवब्रह्माण*, देवताओंसहित सभी लोकपाल प्रसन्नतापूर्वक वहाँ गये। उन सभीके वहाँ आ जानेपर भगवान् परमेश्वरने समस्त संस्कारविधि सम्पन्न करानेके

* मरीचि, भृगु, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, दक्ष, अत्रि तथा वसिष्ठ—ये नौ ऋषि ब्रह्माजीके मनसे उत्पन्न होनेके कारण तथा ब्रह्मवादी और ब्रह्मात्मक होनेसे 'नवब्रह्माण' कहलाते हैं। (लिङ्गपु० पू० ७०। १८१–१८३)