श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २०० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| लिये पितामह ब्रह्माको आदेश दिया॥ ३१-३२ १/२॥ | |
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| सर्वकार्यविधिं कर्तुमादिदेश पितामहम्।<br>पितामहोऽपि भगवान् नियोगादेव तस्य तु॥ ३३<br><br>चकार सर्वं भगवानभिषेकं समाहितः।<br>अर्चयित्वा ततो ब्रह्मा स्वयमेवाभ्यषेचयत्॥ ३४<br><br>ततो विष्णुस्ततः शक्रो लोकपालास्तथैव च।<br>अभ्यषिञ्चन्त विधिवद् गणेन्द्रं शिवशासनात्॥ ३५ | तब उनका आदेश पाते ही भगवान् ब्रह्माने भी ध्यानपूर्वक सम्पूर्ण अभिषेक-कर्म सम्पन्न कराया। तत्पश्चात् भगवान् ब्रह्माने पूजन करके स्वयं उनका अभिषेक किया। इसके बाद शिवके आदेशसे विष्णुने, फिर इन्द्रने और लोकपालोंने गणेन्द्रका विधिपूर्वक अभिषेक किया॥ ३३-३५॥ |
| ऋषयस्तुष्टुवुश्चैव पितामहपुरोगमाः।<br>स्तुतवत्सु ततस्तेषु विष्णुः सर्वजगत्पतिः॥ ३६<br><br>शिरस्यञ्जलिमादाय तुष्टाव च समाहितः।<br>प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा जयशब्दं चकार च॥ ३७ | तदनन्तर ऋषियों तथा पितामह आदिने उनकी स्तुति की। तब उन सभीके स्तुति कर लेनेपर समस्त जगत्के स्वामी विष्णुने सिरपर अंजलि बाँधकर एकाग्र-चित्त होकर उनकी स्तुति की और हाथ जोड़े हुए झुककर जय-जयकार किया। तत्पश्चात् सभी गणेश्वरों, देवताओं और असुरोंने भी क्रमसे सम्पूर्ण कृत्य किया॥ ३६-३७ १/२॥ |
| ततो गणाधिपाः सर्वे ततो देवास्ततोऽसुराः।<br>एवं स्तुतश्चाभिषिक्तो देवैः सब्रह्मकैस्तदा॥ ३८<br><br>उद्वाहश्च कृतस्तत्र नियोगात्परमेष्ठिनः।<br>मरुतां च सुता देवी सुयशाख्या बभूव या॥ ३९<br><br>लब्धं शशिप्रभं छत्रं तया तत्र विभूषितम्।<br>चामरे चामरासक्तहस्ताग्रैः स्त्रीगणैर्युता॥ ४०<br><br>सिंहासनं च परमं तया चाधिष्ठितं मया।<br>अलङ्कृता महालक्ष्म्या मुकुटाद्यैः सुभूषणैः॥ ४१ | इस प्रकार ब्रह्मसहित सभी देवताओंके द्वारा उनका अभिषेक तथा स्तवन हो जानेके बाद परमेष्ठीकी आज्ञासे उन्होंने विवाह किया। सुयशा नामक जो मरुतोंकी पुत्री थी, वह उनकी भार्या हुई। उस सुयशाको चन्द्रमाके समान प्रभायुक्त और विशेष शोभासम्पन्न एक छत्र भेंट किया गया। हाथोंमें चामर लिये हुए स्त्रियोंसे युक्त उस सुयशाको दो चामर भी प्रदान किये गये। मेरे साथ उसने भी एक अत्यन्त सुन्दर सिंहासन ग्रहण किया। भगवती महालक्ष्मीने मुकुट आदि सुन्दर आभूषणोंसे उसे अलंकृत किया॥ ३८-४१॥ |
| लब्धो हारश्च परमो देव्याः कण्ठगतस्तथा।<br>वृषेन्द्रश्च सितो नागः सिंहः सिंहध्वजस्तथा॥ ४२<br><br>रथश्च हेमच्छत्रं च चन्द्रबिम्बसमप्रभम्।<br>अद्यापि सदृशः कश्चिन्मया नास्ति विभुः क्वचित्॥ ४३ | उसे देवीके गलेका अति सुन्दर हार भी प्राप्त हुआ। वृषेन्द्र, श्वेत हाथी, सिंह, सिंहध्वज, रथ और चन्द्रमण्डलके समान प्रभाववाला स्वर्णछत्र भी भेंट किया गया। अब मेरे समान कहीं भी कोई प्रभु नहीं था॥ ४२-४३॥ |
| सान्वयं च गृहीत्वेशस्तथा सम्बन्धिबान्धवैः।<br>आरुह्य वृषमीशानो मया देव्या गतः शिवः॥ ४४ | मुझको परिवारसहित लेकर सम्बन्धियों तथा बान्धवोंको भी साथ लेकर देवीके साथ भगवान् महेश्वर वृषभपर आरूढ़ हो चल पड़े॥ ४४॥ |
| तदा देवीं भवं दृष्ट्वा मया च प्रार्थयन् गणैः।<br>मुनिदेवर्षयः सिद्धा आज्ञां पाशुपतीं द्विजाः॥ ४५ | तब मेरे तथा गणोंके साथ शिव एवं पार्वतीको देखकर मुनियों, देवर्षियों, सिद्धों और द्विजोंने शिवकी आज्ञाहेतु प्रार्थना की॥ ४५॥ |
| अथाज्ञां प्रददौ तेषामर्हाणामाज्ञया विभोः।<br>नन्दिको नगजाभर्तुस्तेषां पाशुपतीं शुभाम्॥ ४६ | तत्पश्चात् हिमालयकी पुत्रीके पति प्रभु शिवकी |