श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ४५ ] भगवान् रुद्रके विराट् स्वरूप तथा सात पाताललोकोंका वर्णन २०१
| तस्माद्धि मुनयो लब्ध्वा तदाज्ञां मुनिपुङ्गवात्।<br>भवभक्तास्तदा चासंस्तस्माद्देवं समर्चयेत्॥ ४७ | आज्ञासे नन्दीने उन पूजनीय लोगोंके लिये शुभ पाशुपत आज्ञा प्रदान की॥ ४६॥<br><br>तब मुनिश्रेष्ठ (नन्दी)-से उन शिवकी आज्ञा (दीक्षा) पाकर वे मुनिलोग शिवभक्त हो गये। अतः सभीको शिवकी पूजा करनी चाहिये॥ ४७॥ |
| नमस्कारविहीनस्तु नाम उद्गिरयेद्द्रवे।<br>ब्रह्मघ्नदशसंतुल्यं तस्य पापं गरीयसम्॥ ४८<br><br>तस्मात्सर्वप्रकारेण नमस्कारादिमुच्चरेत्।<br>आदौ कुर्यान्नमस्कारं तदन्ते शिवतां व्रजेत्॥ ४९ | यदि कोई मनुष्य बिना नमस्कारके ही शिवके नामका उच्चारण करता है, तो उसे दस ब्रह्महत्याके समान घोर पाप लगता है। अतः सब प्रकारसे नामके आदिमें नमस्कार (नमः)-का उच्चारण करना चाहिये। आदिमें नमः अवश्य लगाना चाहिये, ऐसा करनेवाला शिवत्वको प्राप्त होता है* ॥ ४८-४९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे नन्दिकेश्वराभिषेको नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'नन्दिकेश्वराभिषेक' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४४॥
पैंतालीसवाँ अध्याय
भगवान् रुद्रके विराट् स्वरूप तथा सात पाताललोकोंका वर्णन
| ऋषय ऊचुः<br>सूत सुव्यक्तमखिलं कथितं शङ्करस्य तु।<br>सर्वात्मभावं रुद्रस्य स्वरूपं वक्तुमर्हसि॥ १ | ऋषिगण बोले—हे सूतजी! आपने शंकरजीके विषयमें सब कुछ स्पष्ट रूपसे कह दिया, अब आप रुद्रके सर्वात्मभाव तथा स्वरूपको बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>भूर्भुवः स्वर्महश्चैव जनः साक्षात्तपस्तथा।<br>सत्यलोकश्च पातालं नरकार्णवकोटयः॥ २<br><br>तारकाग्रहसोमार्कौ ध्रुवः सप्तर्षयस्तथा।<br>वैमानिकास्तथान्ये च तिष्ठन्त्यस्य प्रसादतः॥ ३ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य—ये लोक, पाताल, करोड़ों नरक-सागर, तारागण, ग्रहगण, चन्द्र, सूर्य, ध्रुव, सप्तर्षिगण, वैमानिक देवतागण तथा अन्य सभी उन्हीं शिवकी कृपासे प्रतिष्ठित हैं॥ २-३॥ |
| अनेन निर्मितास्त्वेवं तदात्मानो द्विजर्षभाः।<br>समष्टिरूपः सर्वात्मा संस्थितः सर्वदा शिवः॥ ४ | इन्हींके द्वारा ये सब बनाये गये हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो! ये सब उन्हींके आत्मस्वरूप हैं। वे सर्वात्मा शिव सभीमें सर्वदा समष्टिरूपसे स्थित हैं॥ ४॥ |
| सर्वात्मानं महात्मानं महादेवं महेश्वरम्।<br>न विजानन्ति सम्मूढा मायया तस्य मोहिताः॥ ५<br><br>तस्य देवस्य रुद्रस्य शरीरं वै जगत्त्रयम्।<br>तस्मात्प्रणम्य तं वक्ष्ये जगतां निर्णयं शुभम्॥ ६ | उन्हींकी मायासे मोहित होकर अज्ञानी लोग सर्वात्मरूप, महात्मा, महादेव तथा महेश्वरको नहीं जानते हैं। उन भगवान् रुद्रका शरीर ही तीनों लोक है, अतः उन्हें प्रणाम करके मैं जगत्के शुभ विस्तारका वर्णन करूँगा॥ ५-६॥ |
* शिवमन्त्रकी दीक्षा प्राप्तकर विधिपूर्वक जप करनेके लिये यह वचन है। नामजपकी महिमाके अनुसार श्रद्धापूर्वक नामजप भी किया जा सकता है।