भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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२०२ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुरा वः कथितं सर्वं मयाण्डस्य यथा कृतिः।<br>भुवनानां स्वरूपं च ब्रह्माण्डे कथयाम्यहम्॥ ७<br>पृथिवी चान्तरिक्षं च स्वर्महर्जन एव च।<br>तपः सत्यं च सप्तैते लोकास्त्वण्डोद्भवाः शुभाः॥ ८<br>अधस्तादत्र चैतेषां द्विजाः सप्त तलानि तु।<br>महातलादयस्तेषां अधस्तान्ररकाः क्रमात्॥ ९पहले जैसा मैंने आपलोगोंसे कहा है—अण्डके आकार और ब्रह्माण्ड तथा भुवनोंके स्वरूपको बता रहा हूँ। पृथिवी, अन्तरिक्ष, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य—ये सात शुभ लोक अण्डसे प्रादुर्भूत हुए हैं। हे ब्राह्मणो! उनके नीचे महातल आदि सात तल हैं। उनके भी नीचे क्रमसे नरक स्थित हैं॥ ७-९॥
महातलं हेमतलं सर्वरत्नोपशोभितम्।<br>प्रासादैश्च विचित्रैश्च भवस्यायतनैस्तथा॥ १०<br>अनन्तेन च संयुक्तं मुचुकुन्देन धीमता।<br>नृपेण बलिना चैव पातालस्वर्गवासिना॥ ११महातल स्वर्णका बना हुआ है और यह सभी रत्नोंसे सुशोभित है। यह अद्भुत प्रासादों तथा शिवके मन्दिरोंसे युक्त है। यह अनन्त (शेषनाग), बुद्धिमान् मुचुकुन्द और पाताल तथा स्वर्गवासी राजा बलिसे युक्त है॥ १०-११॥
शैलं रसातलं विप्राः शार्कं हि तलातलम्।<br>पीतं सुतलमित्युक्तं वितलं विद्रुमप्रभम्॥ १२<br>सितं हि अतलं तच्च तलं यच्च सितेतरम्।<br>क्षमायास्तु यावद्विस्तारो ह्यधस्तेषां च सुव्रताः॥ १३<br>तलानां चैव सर्वेषां तावत्संख्या समाहिता।<br>सहस्त्रयोजनं व्योम दशसाहस्त्रमेव च॥ १४<br>लक्षं सप्तसहस्त्रं हि तलानां सघनस्य तु।<br>व्योम्नः प्रमाणं मूलं तु त्रिंशत्साहस्त्रकेण तु॥ १५हे विप्रो! रसातल चट्टानोंसे युक्त है, तलातल बालुकामय है, सुतल पीले वर्णका कहा गया है और वितल विद्रुम (मूँगे)-की प्रभावाला है। अतलं श्वेतवर्णका है और तल कालेवर्णका है। हे सुव्रतो! उन नीचेके तलोंका विस्तार पृथ्वीके समान है। सभी तलोंकी जो समाहित संख्या है, उन सभीके अन्तर्वर्ती आकाश ग्यारह हजार योजनके विस्तारवाले हैं। सभी तलोंके मेघाच्छादित अन्तरिक्षभागको तीस हजार योजनवाला माना गया है तथा इन सभी तलोंका भौगोलिक विस्तार एक लाख सात हजार योजन है॥ १२-१५॥
सुवर्णेन मुनिश्रेष्ठास्तथा वासुकिना शुभम्।<br>रसातलमिति ख्यातं तथान्यैश्च निषेवितम्॥ १६<br>विरोचनहिरण्याक्षनरकाद्यैश्च सेवितम्।<br>तलातलमिति ख्यातं सर्वशोभासमन्वितम्॥ १७हे मुनिश्रेष्ठो! शुभ रसातल सुवर्ण, वासुकि तथा अन्य नागोंसे युक्त कहा गया है। सब प्रकारकी शोभासे समन्वित तलातल विरोचन, हिरण्याक्ष, नरक आदिसे सेवित है॥ १६-१७॥
वैनावकादिभिश्चैव कालनेमिपुरोगमैः।<br>पूर्वदेवैः समाकीर्णं सुतलं च तथापरैः॥ १८<br>वितलं दानवाद्यैश्च तारकाग्निमुखैस्तथा।<br>महान्तकाद्यैर्नागैश्च प्रह्लादेनासुरेण च॥ १९सुतल वैनावक आदि देवों तथा कालनेमि आदि अन्य प्रमुख दैत्योंसे परिपूरित है। वितल तारकाग्नि आदि प्रधान दानवों, महान्तक आदि नागों तथा असुर प्रह्लादसे समन्वित है॥ १८-१९॥
अतलं चात्र विख्यातं कम्बलाश्वनिषेवितम्।<br>महाकुम्भेन वीरेण हयग्रीवेण धीमता॥ २०<br>शङ्कुकर्णेन सम्भिन्नं तथा नमुचिपूर्वकैः।<br>तथान्यैर्विविधैर्वीरैस्तलं चैव सुशोभितम्॥ २१अतल कम्बल तथा अश्वतर, वीर महाकुम्भ और बुद्धिमान् हयग्रीवके अधिकारमें कहा गया है। इसी प्रकार शोभासम्पन्न तल शंकुकर्ण, नमुचि आदि विविध वीरोंसे सुशोभित है॥ २०-२१॥