भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 205
अध्याय ४६ ]भुवनसन्निवेशमें सात द्वीपों तथा सात समुद्रोंका वर्णन२०३

| तलेषु तेषु सर्वेषु चाम्बया परमेश्वरः।<br>स्कन्देन नन्दिना सार्धं गणपैः सर्वतो वृतः॥ २२<br><br>तलानां चैव सर्वेषामूर्ध्वतः सप्त सत्तमाः।<br>क्ष्मातलानि धरा चापि सप्तधा कथयामि वः॥ २३ | उन सभी तलोंमें परमेश्वर शिव अम्बा (पार्वती), स्कन्द (कार्तिकेय), नन्दी तथा अन्य गणेश्वरोंके द्वारा सभी ओरसे घिरे हुए विद्यमान रहते हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो! इन सभी तलोंके ऊपर सात पृथ्वीतल हैं, पृथ्वी भी सात खण्डोंमें विभक्त है; मैं आपलोगोंसे इसका वर्णन कर रहा हूँ॥ २२-२३ ॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पातालवर्णनं नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पातालवर्णन' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥


छियालीसवाँ अध्याय

भुवनसन्निवेशमें सात द्वीपों तथा सात समुद्रोंका वर्णन एवं सर्वत्र भगवान् शिवकी व्यापकता, स्वायम्भुव मन्वन्तरके प्रियव्रतादि राजवंशोंका वर्णन, जम्बूद्वीप, कुशद्वीप तथा क्रौञ्चद्वीपके राजाओंका वर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले—
सप्तद्वीपा तथा पृथ्वी नदीपर्वतसङ्कुला।<br>समुद्रैः सप्तभिश्चैव सर्वतः समलङ्कृता॥ १[हे ऋषियो!] पृथ्वी सात द्वीपोंसे युक्त है, नदियों तथा पर्वतोंसे भरी पड़ी है और सात समुद्रोंसे सभी ओरसे भलीभाँति अलंकृत है॥ १॥
जम्बूः प्लक्षः शाल्मलिश्च कुशः क्रौञ्चस्तथैव च।<br>शाकः पुष्करनामा च द्वीपास्त्वभ्यन्तरे क्रमात्॥ २जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक तथा पुष्कर नामवाले—ये [सात] द्वीप क्रमसे इसके भीतर अवस्थित हैं॥ २॥
सप्तद्वीपेषु सर्वेषु साम्बः सर्वगणैर्वृतः।<br>नानावेषधरो भूत्वा सान्निध्यं कुरुते हरः॥ ३इन समस्त सातों द्वीपोंमें उमासहित भगवान् शिव सभी गणोंसे घिरे हुए तथा अनेक प्रकारके वेष धारण करके निवास करते हैं॥ ३॥
क्षारोदेक्षुरसोदश्च सुरोदश्च घृतोदधिः।<br>दध्यर्णवश्च क्षीरोदः स्वादूदश्चाप्यनुक्रमात्॥ ४क्षारोद, इक्षुरसोद, सुरोद, घृतोदधि, दध्यर्णव, क्षीरोद, स्वादूद—ये [सात समुद्र] क्रमसे हैं। इन सभी समुद्रोंमें जलरूपी श्रीसम्पन्न भगवान् शिव अपने गणोंके साथ लहररूपी भुजाओंसे क्रीड़ा करते हैं॥ ४-५॥
समुद्रेष्विह सर्वेषु सर्वदा सगणः शिवः।<br>जलरूपी भवः श्रीमान् क्रीडते चोर्मिबाहुभिः॥ ५
क्षीरार्णवामृतमिव सदा क्षीरार्णवे हरिः।<br>शेते शिवज्ञानधिया साक्षाद्वै योगनिद्रया॥ ६क्षीरसागर अमृतके समान है। भगवान् विष्णु उस क्षीरसागरमें शिवज्ञानका चिन्तन करते हुए साक्षात् योगनिद्राके साथ सदा शयन करते हैं। जब भगवान् जागते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् जागता है और जब वे सोते हैं, तब यह चराचर जगत् उनमें विलीन होकर सोता है॥ ६-७॥
यदा प्रबुद्धो भगवान् प्रबुद्धमखिलं जगत्।<br>यदा सुप्तस्तदा सुप्तं तन्मयं च चराचरम्॥ ७
तेनैव सृष्टमखिलं धृतं रक्षितमेव च।<br>संहतं देवदेवस्य प्रसादात्परमेष्ठिनः॥ ८परमेष्ठी देवदेव शिवकी कृपासे उन्हीं विष्णुके द्वारा सम्पूर्ण जगत्का सृजन, धारण, रक्षण तथा संहार किया जाता है॥ ८॥
सुषेणा इति विख्याता यजन्ते पुरुषर्षभम्।<br>अनिरुद्धं मुनिश्रेष्ठाः शङ्खचक्रगदाधरम्॥ ९हे मुनिश्रेष्ठो! सुषेणा—इस नामसे प्रसिद्ध लोग