भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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| २०४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले पुरुषश्रेष्ठ [भगवान्] अनिरुद्धका पूजन करते हैं॥ ९॥
ये चानिरुद्धं पुरुषं ध्यायन्त्यात्मविदां वराः।<br>नारायणसमाः सर्वे सर्वसम्पत्समन्विताः॥ १०<br>सनन्दनश्च भगवान् सनकश्च सनातनः।<br>बालखिल्याश्च सिद्धाश्च मित्रावरुणकौ तथा॥ ११<br>यजन्ति सततं तत्र विश्वस्य प्रभवं हरिम्।हे आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ [मुनियो!]! जो लोग अनिरुद्ध पुरुषका ध्यान करते हैं, वे सब नारायणतुल्य हैं और सभी सम्पत्तियोंसे सम्पन्न रहते हैं। भगवान् सनन्दन, सनक, सनातन, बालखिल्यगण, सिद्धगण एवं मित्रावरुण वहाँ विश्वकी उत्पत्ति करनेवाले प्रभु श्रीहरिकी सदा पूजा करते हैं॥ १०-११ १/२॥
सप्तद्वीपेषु तिष्ठन्ति नानाशृङ्गाः महोदयाः॥ १२<br>आसमुद्रायताः केचिद् गिरयो गह्वरैस्तथा।<br>धरायाः पतयश्चासन् बहवः कालगौरवात्॥ १३<br>सामर्थ्यात्परमेशानाः क्रौञ्चारेर्जनकात्प्रभोः।सातों द्वीपोंमें अनेक शिखरोंवाले ऊँचे-ऊँचे पर्वत हैं। कुछ पर्वत गुफाओंसहित समुद्रतक फैले हुए हैं। काल-गौरवसे वहाँ बहुत-से भूपति (राजा) हुए, जो क्रौंचके शत्रु कार्तिकेयके पिता प्रभु शिवकी कृपासे परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न थे॥ १२-१३ १/२॥
मन्वन्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेष्विह॥ १४<br>प्रवक्ष्यामि धरेशान् वो वक्ष्ये स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु अतीतानागतेषु च॥ १५<br>तुल्याभिमानिनश्चैव सर्वे तुल्यप्रयोजनाः।<br>स्वायम्भुवस्य च मनोः पौत्रास्त्वासन्महाबलाः॥ १६<br>प्रियव्रतात्मजा वीरास्ते दशैह प्रकीर्तिताः।<br>आग्नीध्रश्चाग्निबाहुश्च मेधा मेधातिथिर्वसुः॥ १७[हे ऋषियो!] अब मैं स्वायम्भुव मन्वन्तरसे प्रारम्भ करके भूत तथा भविष्यत्कालके सभी मन्वन्तरोंके राजाओंका वर्णन आपलोगोंसे करूँगा। भूत एवं भविष्यत्कालके सभी मन्वन्तरोंमें सभी राजा तुल्य अभिमानवाले तथा तुल्य प्रयोजनवाले थे। स्वायम्भुव मनुके [सभी] पौत्र महाबली थे। प्रियव्रतके दस वीर पुत्र थे। वे इस प्रकार कहे गये हैं—आग्नीध्र, अग्निबाहु, मेधा, मेधातिथि, वसु, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, हव्य, सवन और पुत्र॥ १४-१७ १/२॥
ज्योतिष्मान् द्युतिमान् हव्यः सवनः पुत्र एव च।<br>प्रियव्रतोऽभ्यषिञ्चत्तान् सप्त सप्तसु पार्थिवान्॥ १८<br>जम्बूद्वीपेश्वरं चक्रे आग्नीध्रं सुमहाबलम्।<br>प्लक्षद्वीपेश्वरश्चापि तेन मेधातिथिः कृतः॥ १९<br>शाल्मलेशञ्च वपुष्मन्तं राजानमभिषिक्तवान्।<br>ज्योतिष्मन्तं कुशद्वीपे राजानं कृतवान्नृपः॥ २०<br>द्युतिमन्तं च राजानं क्रौञ्चद्वीपे समादिशत्।<br>शाकद्वीपेश्वरं चापि हव्यं चक्रे प्रियव्रतः॥ २१<br>पुष्कराधिपतिं चक्रे सवनं चापि सुव्रताः।प्रियव्रतने उनमेंसे सात पुत्रोंको सात द्वीपोंमें राजाके रूपमें अभिषिक्त कर दिया। उन्होंने महान् बलशाली आग्नीध्रको जम्बूद्वीपका राजा बनाया। उनके द्वारा मेधातिथि प्लक्षद्वीपके राजा बनाये गये। उन राजा प्रियव्रतने वपुष्मान्‌को शाल्मलिद्वीपके राजाके रूपमें अभिषिक्त किया और ज्योतिष्मान्‌को कुशद्वीपका राजा बनाया। प्रियव्रतने द्युतिमान्‌को क्रौंचद्वीपका राजा बनाया, हव्यको शाकद्वीपका राजा बनाया और हे सुव्रतो! सवनको पुष्करद्वीपका राजा बनाया॥ १८-२१ १/२॥
पुष्करे सवनस्यापि महावीतः सुतोऽभवत्॥ २२<br>धातकी चैव द्वावेतौ पुत्रौ पुत्रवतां वरौ।<br>महावीतं स्मृतं वर्षं तस्य नाम्ना महात्मनः॥ २३<br>नाम्ना तु धातकेश्र्चैव धातकीखण्डमुच्यते।पुष्करद्वीपमें सवनके यहाँ महावीत तथा धातकी नामक पुत्र हुए। ये दोनों पुत्र पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ हुए। उस महात्मा महावीतके नामसे महावीतवर्ष कहा गया है और धातकीके नामसे धातकीखण्ड कहा गया है।
हव्योऽप्यजनयत्पुत्राञ्छाकद्वीपेश्वरः प्रभुः॥ २४शाकद्वीपके