श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| विचारणाच्च वैराग्यं वैराग्याद्दोषदर्शनम्।<br>दोषाणां दर्शनाच्चैव द्वापरे ज्ञानसम्भवः ॥ ६८ | पैदा होता है। उस विचारसे वैराग्य तथा वैराग्यसे सांसारिक क्रियाकलापोंमें दोष दिखायी देने लगते हैं और उन दोषोंके दर्शनसे द्वापरमें ज्ञान उत्पन्न हो जाता है॥ ६६—६८॥ | | एषा रजस्तमोयुक्ता वृत्तिर्वै द्वापरे स्मृता।<br>आद्ये कृते तु धर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रवर्तते ॥ ६९<br>द्वापरे व्याकुलीभूत्वा प्रणश्यति कलौ युगे॥ ७० | द्वापरमें रजोगुण तथा तमोगुणसे युक्त इस प्रकारकी वृत्ति कही गयी है। आदि सत्ययुगमें एकमात्र धर्म ही सर्वत्र रहता है, वह त्रेतामें प्रेरणासे प्रवृत्त होता है वह धर्म द्वापरमें व्याकुल होकर स्थित रहता है तथा फिर कलियुगमें नष्ट हो जाता है॥ ६९-७०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे 'चतुर्युगधर्माणां वर्णनं' नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'चतुर्युगधर्मवर्णन' नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३९॥
चालीसावाँ अध्याय
कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास तथा स्वल्प भी धर्माचरणका महत्फल एवं कलियुगके अन्तमें पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति
| शक्र उवाच | इन्द्र बोले— |
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| तिष्ये मायामसूयां च वधं चैव तपस्विनाम्।<br>साधयन्ति नरास्तत्र तमसा व्याकुलेन्द्रियाः ॥ १ | [हे शिलाद!] कलियुगमें तमोगुणसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले मनुष्य माया रचेंगे, दूसरोंका दोष देखेंगे तथा तपस्वियोंका वध करेंगे॥ १॥ |
| कलौ प्रमादको रोगः सततं क्षुद्भयानि च।<br>अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः ॥ २ | कलियुगमें प्रमाद, रोग, निरन्तर क्षुधाका भय, अनावृष्टिरूप घोर भय तथा देशोंका विपर्यय (विनाश)—ये सब होंगे॥ २॥ |
| न प्रामाण्यं श्रुतेरस्ति नृणां चाधर्मसेवनम्।<br>अधार्मिकास्त्वनाचारा महाकोपाल्पचेतसः ॥ ३ | लोग वेदोंकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं करेंगे तथा अधर्मका आचरण करेंगे। मनुष्य धर्मच्युत होकर अनाचारमें रत रहेंगे और महान् क्रोधी तथा मन्द बुद्धिवाले होंगे॥ ३॥ |
| अनृतं ब्रुवते लुब्धास्तिष्ये जाताश्च दुष्प्रजाः।<br>दुरिष्टैर्दुरधीतैश्च दुराचारैर्दुरागमैः॥ ४<br>विप्राणां कर्मदोषेण प्रजानां जायते भयम्।<br>नाधीयन्ते तदा वेदान्न यजन्ति द्विजातयः ॥ ५ | कलियुगमें प्रजाएँ मिथ्या भाषण करेंगी, लोभ-परायण होंगी तथा मलिन आचार-विचारवाली होंगी। ब्राह्मणोंके दूषित यज्ञ, दूषित पठन, दूषित आचार एवं दूषित शास्त्रोंके सेवनरूपी कर्मदोषसे प्रजाओंमें भय उत्पन्न होगा। द्विजातिगण न तो वेदोंका अध्ययन करेंगे और न तो यज्ञ-अनुष्ठान करेंगे॥ ४-५॥ |
| उत्सीदन्ति नराश्चैव क्षत्रियाश्च विशः क्रमात्।<br>शूद्राणां मन्त्रयोगेन सम्बन्धो ब्राह्मणैः सह ॥ ६<br>भवतीह कलौ तस्मिन् शयनासनभोजनैः।<br>राजानः शूद्रभूयिष्ठा ब्राह्मणान् बाधयन्ति ते ॥ ७ | क्षत्रिय, वैश्य आदि सभी मनुष्य क्रमशः विनष्ट हो जायँगे। कलियुगमें ब्राह्मण लोग शूद्रोंको मन्त्रोपदेश देंगे तथा उनके साथ शयन, आसन, भोजन आदिका व्यवहार |