श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ३९] सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन⋯विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन १७५
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| द्वापरे तु प्रवर्तन्ते रागो लोभो मदस्तथा।<br>वेदो व्यासैश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु ॥ ५६<br><br>एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतास्विह विधीयते।<br>सङ्क्षयादायुषश्चैव व्यस्यते द्वापरेषु सः ॥ ५७ | ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंका लगभग विनाश हो जाता है। लोगोंमें वासना, द्वेष, राग, लोभ तथा मद प्रवृत्त हो जाते हैं। द्वापर आदि कालोंमें व्यासोंके द्वारा एक वेद चार भागोंमें विभक्त किया जाता है। ऋक् आदि चार पादोंसे युक्त एक वेद-संहिताका इस भूलोकमें त्रेता आदि कालोंमें अध्ययन किया जाता है; वही वेद द्वापर आदि कालोंमें आयुसंख्याके कारण विभाजित कर दिया जाता है॥ ५५-५७॥ |
| ऋषिपुत्रैः पुनर्भेदा भिद्यन्ते दृष्टिविभ्रमैः।<br>मन्त्रब्राह्मणविन्यासैः स्वरवर्णविपर्ययैः ॥ ५८<br><br>संहिता ऋग्यजुःसाम्नां संहन्यन्ते मनीषिभिः।<br>सामान्या वैकृताश्चैव दृष्टिभिस्तैः पृथक्पृथक् ॥ ५९ | इसके आगे ऋषिपुत्रोंके द्वारा अपनी दृष्टिसे विभाजन पुनः किया जाता है। दृष्टिविभ्रम (अलग-अलग विचार रखनेवाले) मनीषियोंने समानरूपसे विभाजित की गयी ऋक्, यजुः तथा साम नामक संहिताओंको स्वर-वर्णोंके भेदसे मन्त्र और ब्राह्मणभागके स्वरूपमें पुनः अलग-अलग विभाजित किया॥ ५८-५९॥ |
| ब्राह्मणं कल्पसूत्राणि मन्त्रप्रवचनानि च।<br>अन्ये तु प्रस्थितास्तान् वै केचित्तान् प्रत्यवस्थिताः ॥ ६० | इस प्रकार मनीषियोंने ब्राह्मणभाग, कल्पसूत्र तथा मीमांसा-न्यायके सूत्रोंकी रचना की। कुछ मनीषी इतने विभाजनको पर्याप्त मानकर इसीपर स्थिरमति हो गये, किंतु अन्य मनीषी इस विभाजनको न्यून मानकर इसके विस्तारमें प्रवृत्त हुए॥ ६०॥ |
| इतिहासपुराणानि भिद्यन्ते कालगौरवात्।<br>ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा ॥ ६१<br><br>भविष्यं नारदीयं च मार्कण्डेयमतः परम्।<br>आग्नेयं ब्रह्मवैवर्तं लैङ्गं वाराहमेव च ॥ ६२<br><br>वामनाख्यं ततः कूर्मं मात्स्यं गारुडमेव च।<br>स्कान्दं तथा च ब्रह्माण्डं तेषां भेदः प्रकथ्यते ॥ ६३ | अनेक कल्पोंके भेदसे इतिहास, पुराण आदिके भी विशिष्ट भेद होते हैं। ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, भागवतपुराण, भविष्यपुराण, नारदपुराण, मार्कण्डेयपुराण, अग्निपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, लिङ्गपुराण, वाराहपुराण, वामनपुराण, कूर्मपुराण, मत्स्यपुराण, गरुड़पुराण, स्कन्दपुराण तथा ब्रह्माण्डपुराण—ये उन पुराणोंके भेद कहे जाते हैं। इनमें ग्यारहवाँ पवित्र लिङ्गपुराण द्वापरमें विभक्त किया गया है॥ ६१—६३ १/२ ॥ |
| लैङ्गमेकादशविधं प्रभिन्नं द्वापरे शुभम्।<br>मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः ॥ ६४<br><br>यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती।<br>पाराशरव्यासशङ्खलिखिता दक्षगौतमौ ॥ ६५<br><br>शातातपो वसिष्ठश्च एवमाद्यैः सहस्रशः। | मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, पराशर, व्यास, शंख, लिखित, दक्ष, गौतम, शातातप तथा वसिष्ठ आदि बहुत-से मुनि धर्मशास्त्रोंका विस्तार करनेवाले हैं॥ ६४—६५ १/२ ॥ |
| अवृष्टिर्मरणं चैव तथा व्याध्याद्युपद्रवाः ॥ ६६<br><br>वाङ्मनःकर्मजैर्दुःखैर्निर्वेदो जायते ततः।<br>निर्वेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षविचारणा ॥ ६७ | अवृष्टि, अकालमरण, रोग, विघ्न एवं मन-वचन-कर्मजनित दुःखोंसे निर्वेद उत्पन्न होता है। निर्वेदसे उन प्रजाओंके मनमें दुःखोंसे छूटनेका विचार |