श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ४०] कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका ह्रास...पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति १७९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नृपशून्या वसुमती न च धान्यधनावृता।<br>मण्डलानि भविष्यन्ति देशेषु नगरेषु च॥ ३० | पृथ्वी राजाओंसे शून्य हो जायगी तथा धन-धान्यसे परिपूर्ण नहीं रहेगी। देशों और नगरोंमें बहुत-से स्थान जनशून्य हो जायँगे॥ ३०॥ |
| अल्पोदका चाल्पफला भविष्यति वसुन्धरा।<br>गोप्तारश्चाप्यगोप्तारः सम्भविष्यन्त्यशासनाः॥ ३१ | पृथ्वी अल्प जलवाली तथा कम फल देनेवाली होगी। रक्षक ही भक्षक बन जायँगे एवं लोग स्वेच्छाचारी हो जायँगे॥ ३१॥ |
| हर्तारः परवित्तानां परदारप्रधर्षकाः।<br>कामात्मानो दुरात्मानो ह्यधमाः साहसप्रियाः॥ ३२<br><br>प्रनष्टचेष्टनाः पुंसो मुक्तकेशाश्च शूलिनः।<br>जनाः षोडशवर्षाश्च प्रजायन्ते युगक्षये॥ ३३ | युगान्त कलियुगमें सभी लोग दूसरोंके धनका हरण करनेवाले, परस्त्रीगमन करनेवाले, कामी, दुरात्मा, अधम, दुस्साहसी, उद्योगरहित, लज्जारहित, रोगी तथा सोलह वर्षकी परम आयुवाले होंगे॥ ३२-३३॥ |
| शुक्लदन्ताजिनाक्षाश्च मुण्डाः काषायवाससः।<br>शूद्रा धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते॥ ३४ | कलियुगके उपस्थित होनेपर शूद्रगण [निर्लज्जता-पूर्वक] दाँत दिखाते हुए गेरुआ वस्त्र तथा रुद्राक्ष धारणकर एवं मुण्डित सिरवाले होकर यतियोंके धर्मका आचरण करेंगे॥ ३४॥ |
| सस्यचौरा भविष्यन्ति दृढचैलाभिलाषिणः।<br>चौराश्चोरस्वहर्तारो हर्तुर्हर्ता तथापरः॥ ३५<br><br>योग्यकर्मण्युपरते लोके निष्क्रियतां गते।<br>कीटमूषकसर्पाश्च धर्षयिष्यन्ति मानवान्॥ ३६ | कलियुगमें लोग धान्यका हरण करनेवाले तथा अत्यन्त दुष्ट लोगोंके संगकी अभिलाषा करनेवाले होंगे। चोर चोरोंका धन चुरायेंगे और उनके भी धनको कोई दूसरा हरण कर ले जायगा। मनुष्यके विधिसम्मत कर्मसे विरत होकर निष्क्रिय होनेपर कीट, मूषक तथा सर्प मनुष्योंको पीड़ित करेंगे॥ ३५-३६॥ |
| सुभिक्षं क्षेममारोग्यं सामर्थ्यं दुर्लभं तदा।<br>कौशिकीं प्रतिपत्स्यन्ते देशान् क्षुद्भयपीडिताः॥ ३७<br><br>दुःखेनाभिप्लुतानां च परमायुः शतं तदा। | उस समय सुभिक्ष, कल्याण, नीरोगता, सामर्थ्य आदि दुर्लभ हो जायँगे। लोग क्षुधापीड़ित होकर अपने देशसे आकर कौशिकी नदीके तटपर बसेंगे। लोग दुःखित होकर सौ वर्षकी पूर्ण आयु व्यतीत करेंगे॥ ३७ १/२॥ |
| दृश्यन्ते न च दृश्यन्ते वेदाः कलियुगेऽखिलाः॥ ३८<br><br>उत्सीदन्ति तदा यज्ञा केवलाधर्मपीडिताः। | कलियुगमें सभी वेदोंका प्रचार-प्रसार कहीं दिखायी देगा और कहीं नहीं। समस्त यज्ञ अधर्मसे पीड़ित होकर विनष्ट हो जायँगे॥ ३८ १/२॥ |
| काषायिणोऽप्यनिर्ग्रन्थाः कापालीबहुलास्त्विह॥ ३९<br><br>वेदविक्रयिणश्चान्ये तीर्थविक्रयिणः परे।<br>वर्णाश्रमाणां ये चान्ये पाषण्डाः परिपन्थिनः॥ ४०<br><br>उत्पद्यन्ते तदा ते वै सम्प्राप्ते तु कलौ युगे। | संन्यासी शास्त्रज्ञानसे रहित होंगे तथा कापालिक बहुत-से होंगे। कुछ लोग वेद बेचेंगे, तो अन्य लोग तीर्थोंका विक्रय करेंगे। अन्य पाखण्डी लोग वर्णाश्रमधर्मके प्रतिकूल आचरण करेंगे। कलियुगके उपस्थित होनेपर इस प्रकारके लोग उत्पन्न होंगे॥ ३९-४० १/२॥ |
| अधीयन्ते तदा वेदान् शूद्रा धर्मार्थकोविदाः॥ ४१<br><br>यजन्ते चाश्वमेधेन राजानः शूद्रयोनयः।<br>स्त्रीबालगोवधं कृत्वा हत्वा चैव परस्परम्॥ ४२ | धर्म तथा अर्थके पण्डित बनकर शूद्रलोग वेदोंका अध्ययन करेंगे एवं शूद्र जातिके राजा अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करेंगे। उस समय सभी प्राणी स्त्रियों, बालकों |